A Dark Secret – Chapter 169
दोनों ने खिड़की के दोनों तरफ़ सिर रखा।
अंदर का नज़ारा मैंने पहले भी देखा था, दस बजे वाले कमरे में। आज भी वही था। लंबी मेज़, ऊपर काग़ज़ों का ढेर, मेज़ के एक कोने पर काला फ़ोन, दूसरे कोने पर सफ़ेद फ़ोन उलटा पड़ा हुआ। पीछे वो हरी लोहे की अलमारी — ऊपर तीन खाने, नीचे दो दरवाज़े, और जहाँ हाथ लगता था वहाँ पुताई घिसी हुई। छत पर एक पंखा घूम रहा था, और उसका एक ब्लेड थोड़ा मुड़ा हुआ था, इसलिए हर चक्कर पर वो एक हल्की सी फुँकार छोड़ता था — जैसे साँस ले रहा हो।
मेज़ पर चाय का एक स्टील का गिलास था। और कमरे में इलायची की महक तैर रही थी, इतनी कि मुझे खिड़की के बाहर खड़े होकर भी लगा कि मैं उसी में बैठा हूँ।
उस कुर्सी पर वो बैठा था।
सफ़ेद कुर्ता-पाजामा। चश्मा जेब में, इसलिए चेहरा नंगा दिख रहा था और नंगा चेहरा इंसान को थोड़ा बूढ़ा दिखाता है। सोने की अंगूठी काग़ज़ों पर टिकी थी। उसके सामने एक मोटी सिली हुई फाइल थी, और उस फाइल के नीचे से एक मुड़ा हुआ पीला नोट आधा बाहर झाँक रहा था।
और उस कमरे के कोने में एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। झुका हुआ, पतला, हड्डियों वाला, जिसके हाथ में एक छोटी कॉपी थी और जिसकी साँस में वही आवाज़ थी जो खिड़की के बाहर मुझे सुनाई दी थी। उसने चाय का गिलास मेज़ पर रखा, खाँसा, और फिर चुपचाप पीछे के दरवाज़े से बाहर चला गया।
तो अंदर अब सिर्फ़ एक आदमी बचा था — वो। और बाहर आ रहा था दूसरा — मेरा चाचा।
देवा ने सिर उठाया। और उसकी आवाज़ वैसी ही निकली जैसी पहले निकली थी। मीठी। बहुत मीठी। इतनी मीठी कि आदमी को लगे कि कमरे में शहद का डिब्बा खुल गया है और वो किसी चीज़ पर नहीं, बस सुंदरता पर लगाया गया है।
"महेंद्र भाई!"
कुर्सी पीछे सरकी। फिर पैरों की आवाज़ आई, फिर कंधे पर हाथ रखने की वो नरम आवाज़ जो कपड़े पर पड़ती है।
"आइए, आइए। बैठिए ना। क्या हाल है? अरे, इतनी दूर से पैदल? आपने बोला होता तो गाड़ी भेज देता।"
चाचा कुछ बोले नहीं।
"बैठिए," देवा ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मना करने पर भी आदमी को बैठा देती है। "बैठिए महेंद्र भाई। चाय आई है। अरे, गिलास गरम है, संभालकर।"
कुर्सी की चरमराहट आई। चाचा बैठ गए।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसने अपना पुराना कैमरा पहले ही गोद में रख लिया था, लेंस खिड़की की सलाखों के बीच से अंदर था। मैंने अपना पुराना फ़ोन जेब से निकाला। स्क्रीन पर एक बाल जितनी दरार थी और उसके किनारे धूल जमी थी। मैंने रिकॉर्ड का बटन दबाया। लाल बत्ती जली। मेरा अँगूठा काँप रहा था।
फिर चाचा की आवाज़ आई।
और वो आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी घर में होती थी। वो टूटी हुई थी, धीमी थी, और उसमें वो काँप था जो आदमी के हाथ में नहीं, जीभ में आता है।
"भाई साहब," चाचा ने कहा, "मैं आपसे कुछ कहने आया हूँ। और आज मैं ये कहने आया हूँ क्योंकि सुबह से मेरे सीने में एक पत्थर पड़ा है। जब मैं सोता हूँ तो वो पत्थर मेरे साथ होता है, जब मैं उठता हूँ तो मेरे साथ उठता है। ग्यारह साल से—"
"महेंद्र भाई।"
देवा की आवाज़ ने बीच में ही रास्ता रोक लिया। न गुस्से से, न ज़ोर से। बस एक नरम दीवार की तरह, जिससे टकराकर आदमी के शब्द रुक जाते हैं।
"महेंद्र भाई, आप चाय पीजिए।"
"भाई साहब, वो रात—"
"चाय पीजिए," देवा ने फिर कहा, और इस बार उसी मिठास में एक चीज़ और आ गई थी, जो शहद नहीं थी। "पुरानी बात नहीं। अब रजिस्टर की बात होगी।"
कमरा एक पल के लिए चुप हुआ। और उस चुप्पी में मुझे पंखे की फुँकार, और दीवार पर टिकी घड़ी की टिक-टिक, और खिड़की के बाहर किसी दूर ट्रक के हॉर्न तक सब साफ़ सुनाई दिया।
"रजिस्टर," चाचा ने धीमे से कहा।
"हाँ, रजिस्टर। जो आपके भाई ने उस रात लेकर निकला था। जिसे ले जाकर मुझे देना था। और जो—" देवा कुर्सी में पीछे झुका, और कुर्सी की लकड़ी में एक लंबी चरमराहट आई "—जो अब आपके भतीजे के पास है।"
मेरी उँगली फ़ोन पर और कस गई।
"मैंने सुना है," देवा ने कहा, "कि लड़का कानों से बड़ा होशियार है। आवाज़ सुनकर गाड़ियों का हिसाब बताता है। क्या बात है महेंद्र भाई, रघुवीर का बेटा रघुवीर से भी आगे निकलेगा?"
"भाई साहब, लड़का बस—"
"लड़का बस कुछ नहीं, महेंद्र भाई। लड़का अब रजिस्टर वाला है, और रजिस्टर वाला इंसान बस कुछ नहीं रहता।"
इसी वक़्त पीछे के दरवाज़े से पैरों की आवाज़ आई। भारी जूते। फिर एक आवाज़, जो कमरे में आते ही जगह भर देती है, जैसे चारपाई पर मोटी रज़ाई डाल दी जाए।
"भाई साहब।"
अमरीक सिंह।
मैंने आँखें बंद की। मैंने उसकी आवाज़ पहचानी — वही आवाज़ जो सभा में इतनी गूँजती थी कि छोटे ढाबे में भी भाषण जैसी लगती थी। पर अब यहाँ, इस कमरे में, वो गूँज नहीं थी। यहाँ वही आवाज़ सिकुड़ी हुई थी, जैसे नेता अपना झंडा लपेटकर किसी के घर के दालान में खड़ा हो।
"आ गए," देवा ने कहा, बहुत प्यार से। "आइए अमरीक भाई, आइए। बैठिए।"
कुर्सी घसकी। काग़ज़ की आवाज़ आई — जैसे कोई लिफ़ाफ़ा उठाया गया हो और फिर मेज़ पर फेंका गया हो। मोटा लिफ़ाफ़ा। बहुत मोटा। उसके अंदर पड़े काग़ज़ों ने एक ऐसी आवाज़ की जैसे किसी ने मोटी किताब एक ही हाथ से बंद कर दी हो।
"ये आपका बिल," देवा ने कहा। "हड़ताल खत्म करवाने का।"
कुछ पल की चुप्पी।
"भाई साहब," अमरीक ने धीमे से कहा, "बस एक दिन का हुक्म दिया था। सुबह से गाड़ियाँ खड़ी हैं, ड्राइवर बैठे हैं, बच्चों की रोटी—"
"अमरीक भाई, मैंने एक दिन का कहा था, और आपने एक दिन कर दिया। इसीलिए ये बिल है। जो हुक्म करता है, वो बिल भी भरता है।"
"भाई साहब, ये सब ठीक है, पर सुबह जो काग़ज़ वालों ने फोन किया—"
"फोन क्या कह रहा था?"
अमरीक ने आवाज़ नीची की, और मुझे सिर्फ़ टुकड़े सुनाई दिए।
"ऊपर से… नाम… नाम न लिखा जाए… ब्यूरो…" फिर उसकी आवाज़ फिर ऊपर आई। "भाई साहब, अगर नाम आ गया तो सबसे पहले मेरा नाम आएगा। मैं यूनियन का अध्यक्ष हूँ, मेरे पीछे सात सौ आदमी हैं, और मेरे पीछे—"
"और आपके पीछे क्या है, अमरीक भाई?"
देवा ने यह बहुत नरमी से पूछा था। इतनी नरमी से कि कमरे की हवा भारी हो गई।
"आपके पीछे सिर्फ़ मैं हूँ। और मेरे पीछे—" देवा रुका, चाय का घूँट लिया, और गिलास रखने की आवाज़ आई "—मेरे पीछे कोई और है। और वो कोई और कैमरे के सामने नहीं आता। इसलिए नाम नहीं आएगा। ये मैंने खुद देखा है। ये फोन मेरे आदमी ने नहीं किया था, अमरीक भाई। ये फोन ऊपर से आया था, और ऊपर वाले को ये भी पता है कि अगर नाम आया तो सबसे पहले किसका नाम आएगा।"
मैंने आँखें खोलीं।
नैना की उँगली कैमरे के बटन पर थी और वो हिल नहीं रही थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसके चश्मे के पीछे उसकी आँखें सिर्फ़ अंदर थीं, उस मेज़ पर, उस फाइल पर, उस पीले नोट पर जो फाइल के नीचे से झाँक रहा था।
अंदर चाचा की आवाज़ फिर उठी। इस बार वो टूटी नहीं थी, वो बस बहुत थकी हुई थी।
"भाई साहब, मैं एक बात कहूँ?"
"कहिए महेंद्र भाई।"
"उस रात मैंने लाइन बदली थी।"
कमरा रुक गया।
"मैंने कहा था ना कि पुरानी बात नहीं," देवा ने धीरे से कहा।
"मैंने लाइन बदली थी," चाचा ने कहा, जैसे उन्होंने मुझे सुन लिया हो, "पर केबल मैंने नहीं काटी। भाई साहब, आप जानते हैं मैंने नहीं काटी। उस रात मैं सिर्फ़—"
"महेंद्र भाई।"
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