A Dark Secret168 / 536

A Dark Secret – Chapter 168

7 min read November 6, 2026

टीटू ने सिर हिलाया। वो मुड़ा, दो कदम चला, और फिर रुक गया।

वो पलटा, हमारे पास वापस आया, और अपनी आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि मुझे सुनने के लिए एक कदम आगे झुकना पड़ा।

"एक बात और," उसने कहा।

"बोलो।"

"कल रात ग्यारह बजे के करीब, मैं काउंटर पर अपना हिसाब जोड़ रहा था। मुझे लगा कि सब जा चुके हैं। फिर मैंने पीछे के दरवाज़े की आवाज़ सुनी।" उसने गला साफ़ किया। "अमरीक साहब निकले। भाई साहब के कमरे से। उनके हाथ में लिफ़ाफ़ा था — वही मोटा। और वो चलते वक़्त अपना रुमाल निकालकर मुँह पोंछ रहे थे, जबकि वो पसीने में नहीं थे।"

मेरी उँगलियाँ रसीद पर जम गईं।

"तुमने किसी को बताया?" मैंने पूछा।

"किसको बताता?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, सिर्फ़ एक सूखा सच। "पापा जब मरे थे, तब भी किसी ने नहीं पूछा था।"

वो पलटा।

फिर आख़िरी बार रुका, और मुझे लगा कि जो अब बोलेगा, वो पूरे दिन का सबसे भारी वाक्य होगा।

"अर्जुन भैया," उसने कहा, "अमरीक साहब बाहर से नेता हैं। सभा में खड़े होकर कहते हैं कि हम किसी से नहीं डरते।"

वो रुका, साँस ली।

"अंदर से वो भाई साहब के आदमी हैं। ग्यारह साल से यही देख रहा हूँ। जब भी हड़ताल का ऐलान होता है, उससे पहले वो भाई साहब के कमरे से निकलते हैं। हर बार। बिना चूके।"

टीटू चला गया। उसकी चप्पल की आवाज़ धूल में धीरे-धीरे दूर गई।

मैं वहीं खड़ा रहा।

भोला ने केतली उठाई और बिना कुछ कहे फाटक की तरफ़ चला गया। नैना ने अपना पेन जेब में डाला और रसीदें थैले में वापस रखकर मेरी तरफ़ बढ़ा दीं।

"अर्जुन," उसने कहा, "तुम ठीक हो?"

मैं ठीक नहीं था।

क्योंकि उस वक़्त मेरा दिमाग़ एक ही जगह जम गया था। टोल के पीछे वाला बड़ा फाटक। उसके ऊपर सफ़ेद पत्थर का बोर्ड। बोर्ड पर नीचे दो शब्द मिटे हुए, जिन्हें अगर कोई नाखून से खुरचे तो शायद पढ़ा जा सके।

और उस बोर्ड के नीचे लगा वो नीला गोल निशान, जो मुझे अब तक हर काग़ज़ पर मिल रहा था।

मैंने धीरे से कहा, "टीटू ने अभी जो कहा, वो तुमने सुना?"

"सुना।"

"अमरीक सिंह हर हड़ताल से पहले भाई साहब के कमरे से निकलते हैं। यानी हड़ताल का ऐलान वो करते हैं, और हड़ताल का हिसाब भाई साहब रखते हैं।" मैंने रसीदों वाला थैला सीने से लगाया। "नैना, ये एक आदमी का धंधा नहीं है। ये एक दफ़्तर है। एक कमरा, एक नेता, एक मुनीम, एक टोल क्लर्क, एक पंप।"

"और एक आदमी जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं है," नैना ने कहा।

"वो भी है," मैंने कहा। "पर पहले वो है जिसका नाम हर काग़ज़ पर है और मिटाया हुआ है।"

नैना ने मेरी नज़र का रास्ता पकड़ लिया। दोनों ने टोल के पीछे वाला फाटक देखा। फिर उसके पीछे, अंधेरे में, वो लंबी टीन की छत। वो पुरानी ईंटों की पतली दीवारें। बायें हाथ का बड़ा लोहे का फाटक, दायें हाथ का छोटा दरवाज़ा।

वो दरवाज़ा। जिसके अंदर हरी लोहे की अलमारी है, जिसका बाहर वाला ताला नकली है और अंदर वाला असली। जिसके अंदर एक काली डायरी है जो अभी तक नहीं मिली।

और ठीक उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ कि मेरे चाचा, अपनी गीली काले जूतों वाली जोड़ी पहनकर, इसी वक़्त किसी गली से निकलकर उसी दरवाज़े की तरफ़ बढ़ रहे होंगे, और उनके हाथ में कुछ नहीं है। न रजिस्टर, न काग़ज़, न गवाही। सिर्फ़ ग्यारह साल का एक बोझ और एक घिसी हुई हिम्मत।

मैंने कलाई पर हाथ रखा। घड़ी ठिक-ठिक कर रही थी, आठ मिनट आगे, और उसकी आवाज़ में आज पहली बार एक ऐसी चीज़ थी जो मुझे पसंद नहीं आई।

मैंने नैना की तरफ़ देखा।

"पहले उस दरवाज़े तक चलते हैं," मैंने कहा। "क्योंकि अगर मेरे चाचा ने वहाँ जाकर कुछ ऐसा बोल दिया जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए, तो वो अंदर कभी बाहर नहीं आएँगे।"

नैना ने अपना कैमरा बैग से निकाला और उसकी पट्टी से अपनी कलाई पर कस दिया।

"अर्जुन," उसने कहा, "एक बात पहले साफ़ कर लूँ। मैं अंदर जाऊँगी, पर मैं तुम्हें बचाने के लिए नहीं जाऊँगी। मैं अपने पापा के काग़ज़ के लिए जाऊँगी।"

"मैं भी तुम्हें बचाने के लिए नहीं जा रहा," मैंने कहा। "मैं अपने चाचा के लिए जा रहा हूँ। और कुछ हद तक अपने पापा के लिए।"

वो हँसी। "तो चलो, दोनों अपना-अपना काम करते हैं।"

हम फाटक से बाहर निकले। धूल में हमारे जूतों के निशान बनते गए — मेरे बड़े, उसके छोटे, और बीच में एक पतला नंगे पाँव वाला निशान, जुगनू का, जो अभी भी चाचा के पीछे किसी गली में था।

मैंने चलते-चलते अपनी कॉपी निकाली और पन्ने पर लिखा।

एक ही तीस लीटर। तीन बार कमाया। टोल, दफ़्तर, बीमा।

फिर मैंने नीचे जोड़ा।

और जो आदमी हड़ताल का नाम लेकर भाई साहब के कमरे से निकलता है, वो हड़ताल का नेता नहीं है। वो हड़ताल का काग़ज़ है।

मैंने पेन बंद किया।

सामने, अंधेरे में, ठाकुर ट्रांसपोर्ट का दरवाज़ा था। बंद। दोनों पल्ले। और उसके ऊपर एक छोटा बल्ब जल रहा था, जो हवा में हिल रहा था, जैसे कोई उँगली से इशारा कर रहा हो — आ जाओ, देख लो, किसको बुलाया है तुमने।

मैंने कदम बढ़ाया।

और तभी भीतर से एक आवाज़ आई — किसी स्टील के बर्तन के गिरने की, फिर चारपाई की चरमराहट, फिर किसी आदमी की वो खाँसी जो बूढ़े आदमी की होती है, जो सुबह से नहीं खाँसा और अब खाँस रहा है।

मैंने नैना की कलाई पकड़ी।

"रुको," मैंने कहा।

"क्या हुआ?"

"उनके अंदर कोई है।" मैंने आँख बंद की और सुना। "और वो अकेला नहीं है। दो लोग हैं। एक खाँस रहा है, और दूसरा — दूसरा चाय का कप रख रहा है।"

मैंने आँख खोली।

"नैना, मेरे चाचा यहाँ पहुँच चुके हैं।"

॥

मैंने कदम बढ़ाया ही था कि गली के मोड़ से एक परछाई निकली।

पहले मुझे लगा कोई मज़दूर होगा। फिर वो परछाई छोटे बल्ब के नीचे आई और मैंने वो कंधे पहचाने। वो कंधे जो हमेशा सीधे रहते थे, आज अंदर की तरफ़ धँसे हुए थे। चाल में वो बेतरतीबी थी जो आदमी के पैरों में तभी आती है जब वो जानता है कि जा कहाँ रहा है और लौटेगा या नहीं।

चाचा।

उन्होंने काले गीले जूते पहने हुए थे। वही जोड़ी। और वो ज़मीन पर चिपकते हुए चुपचुप आवाज़ कर रहे थे — चप-चप, चप-चप। मुझे लगा कोई दूर से सुन रहा है और गिन रहा है कि ये आदमी कितने कदम चला।

नैना ने मेरी बाँह दबाई।

"तुम्हारे चाचा," उसने फुसफुसाया।

"हाँ," मैंने कहा। "और देखो, उनके हाथ में कुछ नहीं है। न रजिस्टर, न काग़ज़। बस—"

"बस क्या?"

"बस वो चीज़ जो आदमी अपने सीने में लेकर चलता है और जिसका कोई वज़न नहीं दिखता।"

चाचा ठाकुर ट्रांसपोर्ट के छोटे दरवाज़े तक पहुँचे। उन्होंने एक बार पीछे देखा — मैं और नैना टायरों के ढेर के पीछे दब गए — फिर दरवाज़े पर हाथ रखा। दरवाज़ा खुला था, सिर्फ़ खुला नहीं, खुला छोड़ दिया गया था। जैसे कोई जानता हो कि आज कोई आने वाला है और उसे खटखटाने की ज़रूरत नहीं।

चाचा अंदर गए। दरवाज़ा बंद हुआ, पर पूरा नहीं। एक उँगली जितनी दरार रह गई और उस दरार से पीली रोशनी की एक पतली लकीर बाहर धूल पर गिरने लगी।

"पीछे से," मैंने कहा।

हम अंधेरे में दायें मुड़े। ईंटों का ढेर, फिर टूटी दीवार, फिर गोदाम की वो पीछे वाली दीवार जिस पर ज़ंग लगे लोहे की सलाखों वाली एक छोटी खिड़की थी। खिड़की का एक शीशा चटका था और उस पर किसी ने बहुत पहले टेप चिपकाया था जो अब सूखकर भूरा हो गया था।

नैना पहले चढ़ी। उसका बैग कंधे से फिसला, चार्जर की तार किसी कील में उलझी, वो एक बार झुकी, चश्मा नाक से सरका और उसने सवाल पूछने वाली आदत से ही उसे ऊपर धकेल दिया। फिर मैं चढ़ा।

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