A Dark Secret – Chapter 157
"मतलब ये कि अभी हमें यहाँ नहीं रुकना। वो आदमी अगर वापस आया और उसे हमारी गाड़ी नज़र आई, तो सब ख़त्म।"
नीचे दोनों आदमी फिर लगे। पर अब जल्दी में। बोतलें भरने की आवाज़ें तेज़ हो गईं, एक बोतल गिरी और लुढ़की, और पतली आवाज़ ने गाली की जगह बस इतना कहा, "हट, हट, पैर से दूर।"
मैंने नैना का हाथ पकड़ा।
"अब?"
"अब।"
हम उठे।
और यहीं मेरी सबसे बड़ी गलती हुई।
मैं नदी के पाट में भागा नहीं, खिसका — क्योंकि रात में भागने की आवाज़ दूर तक जाती है और मुझे वो नहीं चाहिए था। और खिसकते वक़्त मेरे बायें पैर के नीचे कुछ आया, जो सूखी रेत जैसा नहीं था और पत्थर जैसा भी नहीं।
काग़ज़।
मैंने जैसे ही पैर आगे बढ़ाया, वो काग़ज़ मेरे टखने से चिपककर उड़ा और फिर रेत पर गिरा।
मैंने एक सेकंड के लिए रुककर उसे उठाया। पुरानी आदत है — जब मैकेनिक के पैर के नीचे काग़ज़ आता है, वो काग़ज़ का क़ीमत नहीं देखता, बस उठा लेता है।
और फिर हम भागे।
रेत में भागना आसान नहीं होता। कभी पैर धँसता है, कभी पत्थर फिसलता है। नैना की साँस तेज़ हो गई, और उसका बैग कंधे से खिसककर कोहनी पर आ गया, और चार्जर की तार लटककर उसके पैरों में आने लगी।
"रुक," उसने कहा। "चश्मा।"
मैंने पीछे देखा।
उसका चश्मा नाक से खिसककर होंठ पर आ गया था। उसने एक हाथ से कैमरा सीने से चिपकाया और दूसरे हाथ से चश्मा ऊपर धकेला — वही आदत, जो सवाल पूछते वक़्त भी करती है।
"तेरे हाथ में क्या है?" उसने भागते-भागते पूछा।
"काग़ज़।"
"काग़ज़?"
"हाँ। बाद में।"
हम ईंट की दीवार तक पहुँचे। मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला, नैना अंदर घुसी, और मैंने चाबी घुमाई। इंजन पहली बार में नहीं, दूसरी बार में जगा, और मैंने बिना लाइट जलाए गाड़ी सौ क़दम तक आगे बढ़ाई — सिर्फ़ डीज़ल की आवाज़ और सड़क। फिर लाइट जली।
और फिर नैना ने लंबी साँस छोड़ी, और कैमरे को गोद में रखकर बोली, "अगर वो गाड़ी हमें पीछे से आती दिखी होती —"
"दिखी नहीं।"
"अगर दिखी होती।"
"तो मैं गाड़ी रोकता," मैंने कहा, "और कहता कि रात में अकेली आवाज़ करने वाली चीज़ें बहुत होती हैं।"
नैना मेरी तरफ़ देखकर हँसी। और फिर उसने पूछा, "काग़ज़ दिखा।"
मैंने गाड़ी सड़क के किनारे लगाई।
रातरानी ढाबे का शटर नीचे था, पर पिछले रास्ते से अंदर रोशनी आ रही थी — रुक्मा दीदी जाग रही थी, क्योंकि वो कभी किसी के लिए नहीं सोती, और ख़ासकर उस रात तो बिलकुल नहीं।
मैंने पिछले दरवाज़े पर तीन बार थपका। शटर के पास से आवाज़ आई, "कौन?"
"मैं, दीदी।"
"और वही रिपोर्टर?"
"हाँ।"
ताला खुला, और रुक्मा दीदी ने लालटेन ऊपर उठाकर हम दोनों को सिर से पैर तक देखा।
"तेरे पैर से खून बह रहा है," वो शांति से बोली। "और तू रात ग्यारह बजे खड़ा मुस्कुरा रहा है।"
"दीदी —"
"अंदर आ। और तू भी।"
हम अंदर गए। वो बेंच पर चटाई बिछाकर हमारे लिए बैठी, और मेरे घुटने पर कपड़ा बाँधकर साथ में चाय रख दी, और फिर हाथ पर हाथ रखकर खड़ी हो गई, जिसका मतलब हर बार यही होता है — अब पूरी बात सुननी है।
मैंने जेब से काग़ज़ निकाला।
वो सिक्के जैसा छोटा नहीं था, मुड़ा हुआ था चार जगह से, और उसके किनारे फटे हुए थे। पानी नहीं लगा था, पर रेत से भरा था — उन बारीक दानों से जो सिर्फ़ सूखी नदी के पाट में होती है।
मैंने उसे लालटेन के नीचे सीधा किया।
ऊपर एक मुहर थी, धुँधली, जिसमें आधे अक्षर घिस गए थे, पर नीचे का हिस्सा साफ़ था — यूनियन की मुहर, वही जो हर रसीद पर लगती है।
उसके नीचे लिखा था — तीस लीटर।
और उसके नीचे कुछ और भी था, जो मैंने पहले नहीं देखा था क्योंकि काग़ज़ मुड़ा हुआ था और मुझे लगा था कि बस इतना ही है।
नीला गोल निशान।
वो वाला। वही जिसने पापा की डायरी में, चाचा की पीली पर्ची पर, कबीर के जला पन्ने पर और टोल की रसीद पर अपना गोल हिस्सा दबाया था। यहाँ वो पूरा नहीं था, आधा था, और आधा होने पर भी वो अपनी पहचान बता रहा था।
और नीचे, उस नीले गोल के बिल्कुल नीचे, किसी ने क़लम से हाथ की लिखाई में लिखा था, किसी ऐसे आदमी के हाथ से जो जल्दी में है और जल्दी में लिखे काग़ज़ भूल जाता है।
अमरीक सिंह, दो दिन का हिसाब।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा।
और मेरे कानों में वो दोनों आवाज़ें अभी भी चल रही थीं। पतली आवाज़ कह रही थी — अमरीक साहब का कोटा बीस लीटर, बाक़ी का हिसाब बाद में। और भारी आवाज़ पूछ रही थी — नीचे अमरीक साहब का खाना?
दोनों अलग-अलग बातें नहीं थीं। वो एक ही हिसाब के दो हिस्से थे। एक दिन का और दो दिन का।
और ये पर्ची उसी हिसाब का वो पन्ना थी जो उस रात उनके हाथ से गिर गया था।
नैना ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा, और उसकी साँस धीरे से रुकी।
"अर्जुन," उसने कहा। "ये पहला ठोस काग़ज़ है।"
"हाँ।"
"त्रेरह काग़ज़ मेरे पास हैं, पर कोई एक भी ऐसा नहीं है जिस पर किसी का नाम और किसी का हिसाब एक साथ हो। ये है। ये वो काग़ज़ है जो अदालत में रखा जाए तो वकील को दो दिन सोचने पड़ेंगे।"
"पर अभी किसी को नहीं पता चलना चाहिए," मैंने कहा।
नैना रुकी।
"क्यों?"
"क्योंकि जिस दिन उन्हें पता चलेगा कि ये काग़ज़ हमारे पास है, उस दिन वो डायरी का स्याही वाला पन्ना फाड़कर फेंक देंगे। और फिर अमरीक सिंह कहेगा कि मैं किसी मीटिंग में नहीं था, मैं छुट्टी पर था, ये मेरी मुहर नहीं है, कोई मेरे ख़िलाफ़ जाल बना रहा है।" मैंने काग़ज़ को कमरे की हवा में हल्का हिलाया। "काग़ज़ से बात तब बनती है जब गवाह हो। अकेला काग़ज़ कोई नहीं मानता।"
रुक्मा दीदी ने चाय मेरी तरफ़ सरकाई।
"तूने इस बार ठीक बोला," उसने कहा।
नैना ने अपना पुराना कैमरा खोला और उसमें की दो तस्वीरें देखने लगी।
एक में अंधेरा था और उस अंधेरे में दो पीली लकीरें। दूसरी में लोहे की टंकी और धुँधला सा एक आदमी — इतना धुँधला कि अदालत में रखने पर वकील हँस दे।
"अंधेरे में कुछ नहीं आया," उसने कहा। "पर मैं ग़लत नहीं थी — मैंने दोनों की आवाज़ रिकॉर्ड नहीं की, क्योंकि मेरे कैमरे में आवाज़ की सुविधा नहीं है। और ये सबसे बड़ी कमी है।"
"पर एक चीज़ है," मैंने कहा।
"क्या?"
"वो दोनों कल रात भी यहीं थे। वही गाड़ी है, वही फैन बेल्ट, वही पतली आवाज़। और उन्होंने कहा कि मीटिंग में साहब बोलेंगे। मतलब कल शाम मीटिंग में वो खुद होगा।"
रुक्मा दीदी ने अपनी कॉपी उठाई।
"मैं कल सुबह आठ बजे सात बेंचों के हिसाब से ड्राइवरों के सामने बोलूँगी," उसने कहा। "पर तेरी बात सुनकर लग रहा है कि मुझे कुछ और भी बोलना पड़ेगा।"
"अभी नहीं दीदी," मैंने कहा।
"मैं जानती हूँ। पहले काग़ज़, फिर गवाह, फिर आवाज़।" उसने कॉपी बंद की। "तू अब सो जा। सुबह तुझे ऐसी आवाज़ ढूँढनी है जो दो आवाज़ें करती है, और उसके लिए दिमाग़ चाहिए, आँख नहीं।"
मैं बेंच पर लेट गया।
छत का पुराना पंखा नहीं चल रहा था, इसलिए सिर्फ़ बाहर की आवाज़ें थीं। दूर टोल पर कोई गाड़ी रुकी और चली। किसी ड्राइवर ने हॉर्न दो बार बजाया — लंबा नहीं, छोटा — जो सिर्फ़ किसी को जगाने के लिए होता है, किसी को डराने के लिए नहीं।
मैंने काग़ज़ को अपनी जेब में तेल वाले रुमाल के साथ रखा, और उँगली एक बार पापा की घड़ी पर फेरी। वो हमेशा की तरह पाँच मिनट आगे थी। रात ग्यारह बजकर पचास मिनट।
और मेरे भीतर एक बात बैठ गई, जिसे मैं नैना को नहीं बोला।
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