A Dark Secret155 / 536

A Dark Secret – Chapter 155

7 min read November 6, 2026

और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर वो भाव नहीं था जो डर का होता है। उसके चेहरे पर वो भाव था जो आदमी के चेहरे पर आता है जब उसे लगता है कि कहानी अब शुरू हो रही है।

"अर्जुन," उसने धीरे कहा। "ये तेरे चाचा का काम नहीं है।"

"मुझे पता है।"

"फिर?"

मैंने गाड़ी स्टार्ट की।

"फिर ये साफ़ है कि वो जानते हैं हम क्या ढूँढ रहे हैं।" मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। "और ये भी साफ़ है कि उन्हें डर है — डर नहीं होता तो वो चुपचाप आते और ले जाते। जो चिट्ठी छोड़ता है, वो डरता है।"

नैना ने कैमरा नीचे रखा।

"और एक बात।" मैंने सड़क की तरफ़ देखते हुए कहा। "सफ़ेद कुर्ते वाला उस पीपल के नीचे खड़ा था।"

नैना रुकी।

"तूने देखा?"

"मैंने देखा।"

"और तूने उसे जाने दिया?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"गाड़ी तेरी है," मैंने कहा। "मैं अकेला दौड़ जाता तो तू पीछे रह जाती। और उस आदमी ने मुझे इसीलिए देखा था कि मैं अकेला हूँ। उसे यही चाहिए था।"

नैना कुछ देर मुझे देखती रही।

फिर उसने सिर हिलाया।

"तू डरा हुआ है?"

मैंने सोचा।

"हाँ," मैंने कहा। "पर डरा हुआ आदमी वही चीज़ कर सकता है जो बहादुर करता है। बस उसे ज़्यादा देर लगती है।"

नैना मुस्कुराई।

"तो हम अब क्या करें?"

मैंने जेब से वो पीला लिफ़ाफ़ा निकाला और उसे एक बार फिर पढ़ा।

और फिर मैंने वो किया जो मुझे करना चाहिए था — मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।

अंदर एक पर्ची थी।

और पर्ची पर हाथ से लिखा था, वही टेढ़े अक्षर, वही जल्दी, वही कोई इंतज़ार न करने वाली स्याही।

कल यूनियन की मीटिंग में आना। तेरे पापा का हिसाब वहीं बंद होगा।

मैंने उसे नैना को दिया।

वो पढ़कर रुक गई।

"अर्जुन।"

"हाँ?"

"ये धमकी नहीं है।"

"नहीं है।"

"ये न्योता है।"

मैंने सड़क की तरफ़ देखा।

"हाँ," मैंने कहा। "और न्योता उसी को दिया जाता है जिसे वो अंदर आने देना चाहते हैं।"

हवा ने धूल उड़ाई और सड़क पर कुछ सूखे पत्ते नाचे।

और मेरे कानों में एक आवाज़ बज रही थी — भोला की आवाज़ — "उनकी ज़ुबान एक आवाज़ करती है, और उनकी जेब दूसरी।"

मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई।

कल यूनियन की मीटिंग है।

और आज मुझे एक ऐसी आवाज़ ढूँढनी है जो दो आवाज़ें करती है।

॥

रात के दस बजकर चालीस मिनट पर हम पुराने पुल के नीचे पहुँचे।

नैना की छोटी गाड़ी हमने पुल से करीब आधा किलोमीटर पहले, उस अधूरी ईंट की दीवार के पीछे खड़ी कर दी थी, जहाँ झाड़ियाँ इतनी घनी थीं कि दिन में भी कोई नहीं देख सकता। उसके बाद हम पैदल उतरे। सूखी नदी का पाट, ठंडी रेत, और पत्थर — कुछ इतने बड़े कि उनके पीछे एक आदमी पूरा छिप जाए, और कुछ इतने छोटे कि चलते वक़्त टखने के नीचे चटक जाएँ।

नैना के हाथ में उसका पुराना कैमरा था, गले में पट्टा, और कंधे पर वही फटा बैग जिससे चार्जर की तार लटकती रहती है। मेरे हाथ में पापा का औज़ार थैला था, और उसमें रिंच के साथ एक टॉर्च, जिसके मुँह पर मैंने अपनी बनियान का कोना लपेट दिया था — रोशनी चाहिए थी, पर ऐसी कि दूर से दीया लगे, टॉर्च नहीं।

"अर्जुन।" नैना ने धीरे कहा। "मेरे पैर में कुछ चुभा।"

"पत्थर होगा।"

"पत्थर नहीं। काँच।"

मैंने टॉर्च की पतली रोशनी नीचे की।

रेत में काँच के टुकड़े बिखरे थे, हरे और भूरे, जैसे किसी ने बोतलें तोड़कर यहाँ फेंक दी हों, और उनके बीच एक पुरानी चप्पल का टुकड़ा भी पड़ा था।

"ये जगह पहले भी इस्तेमाल हुई है," मैंने कहा। "बोतलें यहीं तोड़ी जाती हैं। शीशे से लोग दूर रहते हैं, और जो दूर रहते हैं वो कुछ नहीं देखते।"

नैना ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू इतनी जल्दी सब कैसे जोड़ लेता है?"

"मैं जोड़ता नहीं," मैंने कहा। "मैं सुनता हूँ। बोतल टूटने की आवाज़ में भी एक बात होती है — काँच अगर सूखी रेत पर गिरे तो आवाज़ छोटी होती है, कीचड़ पर गिरे तो भारी। यहाँ आवाज़ छोटी है। मतलब यहाँ सूखा मौसम है, पानी नहीं। मतलब ये जगह बारहों महीने चलती है।"

नैना कुछ बोलने को हुई, फिर रुक गई, और फिर बोली, "तू डरावना है, पता है?"

"मैं मैकेनिक हूँ," मैंने कहा। "हम सब ऐसे ही होते हैं। बस हमारी बातें गाड़ियों के बारे में होती हैं, इसलिए लोग सुनते नहीं।"

हम पुल के नीचे तीसरे खंभे के पास बैठ गए। ऊपर पुल की टूटी रेलिंग से हवा गुज़रती थी और एक लंबी सीटी जैसी आवाज़ करती थी। नदी में पानी दस साल से नहीं था, पर नीचे की ज़मीन में अब भी नमी थी, और उसी नमी के साथ एक पुरानी महक आती थी — लोहा, घास और डीज़ल।

डीज़ल।

यहाँ हवा में डीज़ल पहले से था। बहुत पुराना नहीं। ताज़ा।

"देख," मैंने नैना की कलाई पकड़कर धीरे कहा। "ये महक दीवार से आ रही है, हवा से नहीं।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि जो भी यहाँ आता है, वो यहीं कुछ छोड़ता है। फेंकता नहीं, छोड़ता है।"

हम चुप हो गए।

और फिर मैंने वो किया जो मैं हमेशा करता हूँ — आँख बंद कर ली।

कान खुल गए।

रात की आवाज़ें अपनी-अपनी जगह पर थीं। दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था, पर भौंकने की गति धीमी थी, मतलब वो किसी जान-पहचान वाले को देख रहा था, अजनबी को नहीं। पुल के ऊपर ट्रक गुज़रा, भारी, पीछे लोहे का सामान, क्योंकि उसकी झंकार हर गड्ढे पर एक जैसी नहीं थी। और नीचे, नदी के पाट में, कहीं एक धातु की चादर हवा में हिल रही थी — टिन की, जो किसी पुराने ढाँचे से बँधी थी।

और उसके नीचे, बहुत धीरे, एक और आवाज़।

टपक।

फिर रुक।

फिर टपक।

मैंने आँख खोली।

"नैना, यहाँ पानी नहीं टपक रहा।"

"तो?"

"तेल टपक रहा है।"

मैं उठा और उसी आवाज़ की तरफ़ बढ़ा। तीसरे खंभे के पीछे, रेत में आधा धँसा, एक पुराना लोहे का ड्रम पड़ा था, और उसके ऊपर एक टंकी का मुँह खुला था। टंकी पुरानी थी, जंग खाई हुई, और उसके नीचे की ज़मीन काली थी — जैसे सालों से वहीं से तेल टपकता रहा हो।

मैंने हाथ लगाया।

उँगली चिकनी हुई, और उस चिकनाई के साथ वही गंध आई जो सड़क पर हर ट्रक छोड़ता है।

"यही भोला वाली टंकी है," मैंने कहा। "यहाँ रात में डीज़ल उलीचा जाता है।"

नैना ने कैमरा उठाया, फिर नीचे किया।

"अंधेरे में कुछ नहीं आएगा। पर कोशिश करती हूँ।"

हम फिर अपनी जगह पर बैठ गए।

और इंतज़ार शुरू हुआ।

इंतज़ार में सबसे बुरी चीज़ डर नहीं होता, यह मैंने उस रात सीखा। सबसे बुरी चीज़ होती है मच्छर। नैना ने पहले अपनी बाँह पर थप्पड़ मारा, फिर गर्दन पर, और फिर मेरे कंधे पर।

"ये मेरा कान है," मैंने धीरे कहा।

"ये भी कान है?" उसने हथेली दिखाई।

मैं हँसा नहीं, पर अंदर हँसी आई। और मुझे लगा कि अगर इस वक़्त हँसी नहीं आती, तो मैं वो करता जो करने की मनाही है — उठकर चला जाता।

ग्यारह बजकर पाँच मिनट।

फिर ग्यारह बजकर बारह मिनट।

फिर इंजन की आवाज़।

बहुत दूर से नहीं। यहाँ से करीब आधा किलोमीटर पीछे, कच्ची सड़क से। इंजन की आवाज़ भारी थी, पर ट्रक जितनी भारी नहीं। ये कोई छोटी टंकी वाली गाड़ी थी — पुरानी, और उसकी फैन बेल्ट से एक हल्की चीख निकल रही थी, जो हर बार पानी के पास आकर तेज़ हो जाती है।

"उनकी गाड़ी है," मैंने कहा।

"कैसे पता?"

"बेल्ट सूखी है। मतलब उन्होंने कभी पानी नहीं डाला। ऐसा आदमी गाड़ी से प्यार नहीं करता, बस इस्तेमाल करता है।"

गाड़ी रुकी। इंजन बंद हुआ। दरवाज़ा खुला, ज़ोर से, और फिर दो पैर उतरे। एक हल्का, एक भारी।

रोशनी नहीं जलाई गई। बस एक पतली छड़ीनुमा टॉर्च जली, जिसकी रोशनी सफ़ेद नहीं, पीली थी, और वो भी नीचे ज़मीन पर ही रखी जा रही थी।

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