A Dark Secret – Chapter 150
"उस रात, चाचा। जिस रात मेरे पापा का ट्रक पलटा। तुम कहाँ थे?"
कुर्सी पीछे सरकी। लोहे की टाँगें सीमेंट पर रगड़ खाकर चीं… चीं… कर गईं, और वो आवाज़ मेरे कान में ऐसे बैठ गई जैसे किसी ने कील ठोंक दी हो।
चाचा खड़े हो गए।
उनकी कमर पहले टेढ़ी हुई, फिर सीधी हुई, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा जिसका कब्ज़ा ढीला हो गया हो।
"तू मुझसे पूछ रहा है?"
मैं घुटनों के बल बैठा ही रहा। मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू? मुझसे?" चाचा की आवाज़ ऊपर चली गई। "मैं तेरे पापा का भाई हूँ। सगा भाई। तू उस दिन पैदा भी नहीं हुआ था जब मैंने उनके लिए पहली बार ट्रक का पहिया खोला था।"
चूल्हे की आग धीमी पड़ गई थी।
"तेरे पापा के जाने के बाद किसने तुझे बुलाया? किसने कहा कि आ जा, चाचा के पास रह?" चाचा का हाथ अब गर्दन के पीछे नहीं था, वो हवा में था, मेरी तरफ़ उठा हुआ। "इस छत पर तू सोता है। मेरे घर में तेरा कमरा है। मेरी थाली से तू खाता है। और आज तू मुझसे पूछ रहा है कि उस रात मैं कहाँ था?"
"चाचा —"
"नहीं, तू बोल!" उन्होंने कुर्सी की पीठ पकड़ी और ज़ोर से हिलाई। "बोल! तुझे किसने कहा? वो रिपोर्टर औरत है ना? जो रोज़ ढाबे पर आती है, पतली, चश्मा लटकता रहता है? उसने तेरे दिमाग़ में ज़हर भर दिया है?"
मैंने उनकी आवाज़ सुनी।
मैं जानता हूँ, ये सुनने में अजीब लगेगा। जब कोई इंसान चिल्ला रहा हो, तो उसमें सुनने वाली क्या बात? चीख तो चीख होती है।
पर मेरे कान ने सड़क पर बैठकर यही सीखा था — शोर के नीचे वाला हिस्सा सुनना।
चाचा चिल्ला रहे थे, पर उनकी आवाज़ के नीचे एक हल्की सी लकीर चल रही थी। जैसे किसी पुराने तार में करंट भाग रहा हो और तार काँप रहा हो। "भाई" शब्द जब उन्होंने बोला, तो वो सीधा निकला, मज़बूत। पर "मैं तेरे पापा का" तक आते-आते आवाज़ का आख़िरी हिस्सा फिसल गया।
फिसलना।
झूठ बोलते वक़्त आवाज़ नीचे नहीं गिरती, वो फिसलती है। जैसे चिकनी सड़क पर पहिया।
"चाचा," मैंने धीरे से कहा, "तुमने अभी दो बार कहा कि बस खराब हुई थी।"
"तो?"
"पहली बार तुमने कहा — बस खराब हो गई थी। दूसरी बार — बस खराब हुई थी।"
चाचा रुके।
"इससे क्या?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस। जब कोई एक ही बात दो बार बोलता है और दोनों बार शब्द बदल जाते हैं, तो मतलब वो बात उसे याद करनी पड़ रही है। जो सच होता है, वो याद नहीं करना पड़ता, चाचा। वो बस मुँह से निकल जाता है।"
कमरा चुप हो गया।
बाहर गली में वो ट्रक फिर खाँसा। तीन बार। वही ट्रक जो पिछली रात भी खाँसा था। घर के पीछे कोई टीवी चल रहा था और उसमें कोई औरत बहुत तेज़ हँस रही थी। मुझे लगा कि उस औरत की हँसी इस कमरे से बाहर के किसी दूसरे शहर से आ रही है।
चाची ने तवा उठाया।
"महेंद्र," उसने कहा, "बैठ जाओ। लड़का पूछ रहा है, तो —"
"तू चुप रह!"
चाचा की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मेरे कान में झन्नाटा बज गया।
और चाची — चाची ने तवा वापस नीचे रख दिया। उसकी उँगलियाँ तवे को छोड़कर पल्लू पकड़ने लगीं। वो पीछे हटी, एक कदम, दो कदम, और दरवाज़े की तरफ़ ऐसे खिसकी जैसे कोई उसे देख ही न रहा हो।
मैंने ये पहली बार देखा था।
आठ साल में पहली बार। चाचा ने आज तक चाची पर आवाज़ नहीं उठाई थी। यहाँ तक कि जब उनका काम बिगड़ा, जब कर्ज़ चढ़ा, जब गैराज में ताले पड़े, तब भी वो आँगन में नंगे पाँव घूमते रहे, पर चाची पर नहीं चिल्लाए।
आज चिल्लाए।
और मुझे पता था कि आदमी तब चिल्लाता है जब उसके अंदर कोई चीज़ बहुत ज़ोर से चीख रही हो और बाहर न आ रही हो।
चाचा ने अपना हाथ नीचे किया।
"मैं उस रात स्टैंड पर था," उन्होंने कहा। इस बार आवाज़ धीमी थी। बहुत धीमी। "बस खराब हो गई थी। बैठा रहा। मैकेनिक नहीं आया। फिर मैं मंदिर गया।"
"कौन से मंदिर, चाचा?"
"वही। जो पुल के उस पार है। सीमेंट वाला।"
"वहाँ मगर सुबह खुलता है," मैंने कहा। "मैंने खुद वहाँ एक बार शाम को सोते हुए साधु को देखा था, वो कह रहा था कि शाम छह बजे बंद।"
चाचा ने देखा मेरी तरफ़।
उनकी आँखों में पहले गुस्सा था, फिर उसके पीछे कुछ और, और फिर — मैं ऐसा कैसे कहूँ — फिर वो चला गया। जैसे कोई पानी की सतह पर आई लहर आए और मिट जाए।
"तू मुझे जाल में फँसा रहा है," उन्होंने धीरे से कहा। "अपने चाचा को।"
"मैं जाल नहीं बिछा रहा।"
"तो तू क्यों —"
"क्योंकि मेरे पापा की गर्दन दबी थी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ उल्टी धीमी हो गई। मुझे पता था ये मेरी आदत है और ये मेरी सबसे बड़ी गलती भी है, पर आज मैं रोक नहीं पा रहा था। "रजिस्टर में लिखा है, चाचा। पापा ने खुद लिखा है। उस रात ट्रक के नीचे कोई आदमी खड़ा था। मिट्टी भरे जूते पहनकर।"
चाचा की साँस रुक गई।
"और उस रात बारिश नहीं हुई थी," मैंने कहा। "बारिश नहीं हुई थी, चाचा। फिर किसकी मिट्टी?"
चाची ने पल्लू मुँह पर ले लिया।
चाचा मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो दीवार पर लगे उस पुराने कैलेंडर की तरफ़ देख रहे थे जिसका पन्ना तीन साल से नहीं बदला था। मुझे लगा कि वो उसी पन्ने पर बैठकर कुछ सोच रहे हैं, जैसे वहाँ कोई दरवाज़ा हो जिससे भागा जा सकता हो।
फिर उन्होंने अपना रुमाल जेब से निकाला। वो रुमाल तेल में सना हुआ था। और मैंने उसे देख लिया।
उसी रुमाल के किनारे पर वही ज़ंग की लकीर थी। बिल्कुल वैसी, जैसी चाचा ने एक हफ़्ते पहले मुझे दिया था, जब उन्होंने कहा था — फेंक दे।
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि अब मुझे लग रहा था कि मैं जितना खोदूँगा, उतना ही वो अपने आप को गड्ढे में धकेलता जाएगा।
और मैं नहीं चाहता था कि मेरा चाचा मेरे सामने गड्ढे में गिरे।
चाचा ने रुमाल मुँह पर लगाया। एक लंबी साँस ली। फिर हाथ नीचे किया। और अचानक उनकी आँखें भर आईं।
बिना आवाज़।
एक आदमी जब रोता है और आवाज़ नहीं करता, तो उसका चेहरा अजीब होता है। ऐसा लगता है कि चेहरे की सारी हड्डियाँ अंदर की तरफ़ धँस रही हैं।
"मैं उस रात की बात नहीं बोल सकता," चाचा ने कहा।
"चाचा —"
"नहीं बोल सकता, अर्जुन।" उनकी आवाज़ फट गई। "समझ ले कि मैं नहीं बोल सकता।"
"क्यों?"
"क्योंकि मेरे सिर पर तेरी चाची है।" उन्होंने चाची की तरफ़ देखा, और चाची ने आँखें नीची कर लीं। "और मेरी बिटिया है। जो आज रात अंदर कमरे में सो रही है और सुबह स्कूल जाएगी। और अगर मैं मुँह खोलूँगा, तो जो मुँह खुलता है ना —"
वो रुक गए।
उन्होंने होंठ भींचे।
"जो मुँह खुलता है," उन्होंने फिर कहा, "वो सिर्फ़ हवा नहीं खींचता। वो अपने साथ बहुत कुछ खींच लाता है। और वो बहुत कुछ… मेरे घर से वसूल भी तो लेगा।"
मैंने उनके जूतों की तरफ़ देखा।
गीले थे। तले पर काली, चिकनी, तेल जैसी मिट्टी। और उस मिट्टी में सफ़ेद, बारीक रेत के दाने चिपके थे। मैंने वही मिट्टी उस दिन अपने नाखूनों के नीचे देखी थी, जब मैं मोती के पलटे ट्रक के नीचे नाली के पास बैठा था।
वही मिट्टी।
और वो सड़क से नहीं आ सकती थी। वो मिट्टी सिर्फ़ उसी जगह है, उसी मोड़ पर, जहाँ पानी साल भर रुका रहता है और जहाँ किसी ने एक बार बोरियाँ गिरा दी थीं जो सड़कर उस मिट्टी में घुल गईं।
स्टैंड से मंदिर तक के रास्ते में वो मिट्टी कहीं नहीं आती।
मैंने उनके हाथों की तरफ़ देखा।
वो हाथ जो आज सुबह मेरे कंधे पर था, वो हाथ जो रविवार को मेरी थाली से रोटी तोड़कर खाता था — वो हाथ अब काँप रहा था। बहुत हल्का। इतना हल्का कि चाची को नहीं दिख रहा था। पर मैं देख रहा था। उँगलियों का सिरा कागज़ के कोने की तरह काँप रहा था।
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