A Dark Secret148 / 536

A Dark Secret – Chapter 148

7 min read November 6, 2026

फिर गाड़ी मुड़ी और मैं सड़क की तरफ़ बढ़ गया।

शाम पाँच बजे के करीब थी। सड़क पर धूल थी, ट्रकों की लाइन थी, और हर ट्रक से एक अलग आवाज़ आ रही थी। एक में बेयरिंग घरघरा रही थी, तो दूसरे का पंखा ढीला था, और तीसरे की पीछे की पत्ती ठक-ठक कर रही थी, जैसे कोई दरवाज़ा हवा में खुल-बंद हो रहा हो।

मैं इन सब के बीच से गुज़रता रहा।

और मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी।

चाचा।

महेंद्र चाचा।

जिसने मुझे दिल्ली बुलाया। जिसने मुझे अपनी छत पर जगह दी। जिसने दोपहर में मेरी हथेली पर दो नोट रखे थे और कहा था — कम है, पर शुरुआत है।

और जिसका नाम पापा के रजिस्टर में था।

पैंतीस पन्ने पीछे, हाशिये में, एक छोटी सी लाइन — "दवा के पैसे, महेंद्र से एक हज़ार पाँच सौ, लौटाए नहीं।" मैंने उस लाइन को पढ़ा था और उसे पलट दिया था, क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा था कि ये कोई और महेंद्र होगा।

और चाची के घर के आँगन में जिस अलमारी का ताला खुला मिला था और जिसका पेंदा खोखला था — उसी अलमारी के नीचे पापा का रजिस्टर था।

चाचा का कहना था कि वो अलमारी उसकी ही नहीं।

और चाचा के बयान में ये बात थी कि मैंने ही काग़ज़ जलाए।

मैंने कदम तेज़ किए।

कंधा बस्ती जाते वक़्त रास्ते में झंडू भाई की चाय की दुकान पड़ती है। वहाँ से चाय की भाप उठ रही थी और दो ड्राइवर बेंच पर बैठकर रोटी तोड़ रहे थे।

मैं रुका।

"एक चाय," मैंने कहा।

झंडू भाई ने मुझे देखा और पहचान गया।

"या तेरी ही गाड़ी वाला?" उसने पूछा। "सुबह तेरे चाचा आए थे। तीन चाय पी गए। बोले मेरे भतीजे को पता नहीं कहाँ भटक गया।"

मेरा हाथ गिलास पर रुक गया।

"कब आए थे?"

"दस बजे के आसपास। बैठे रहे, फिर उठे और बोले — छत का ताला देखना है। बस, चले गए। भई, उसके चेहरे पर हवा जैसी थी। उड़ी हुई।"

चाय गर्म थी।

मैंने एक घूँट भरा और वहीं खड़े-खड़े पूरा पी गया।

"चाचा ने कुछ और कहा?"

झंडू भाई ने कपड़े से हाथ पोंछे।

"बोले — अगर मेरा भतीजा आए तो कहना कि मैं ठीक हूँ।" उसने उँगली उठाई। "अरे, सुन — ठीक हूँ, ये बोलने की क्या ज़रूरत थी? आदमी ठीक तभी कहता है जब ठीक न हो।"

मैंने गिलास रख दिया।

"पैसे," मैंने कहा।

"चाचा ने दे दिए थे।"

मैं वहाँ से चल दिया।

कंधा बस्ती की गली में घुसते वक़्त हवा बदल गई। ऊपर की तरफ़ हवा नहीं थी, बस नाली की महक थी जो हर टीन की छत को छूकर आती थी।

चाचा का घर तीसरे मोड़ पर है।

अब तक जब भी मैं आया, दरवाज़े से तीन आवाज़ें आती थीं — चाची की चूड़ियाँ, चूल्हे की फुँकार, और पीछे से आते हुए चाचा के बैठने की आवाज़, जो पुरानी चारपाई के कारण अलग सुनाई देती थी।

आज कुछ नहीं।

दरवाज़ा खुला था।

और चाची सीमा दरवाज़े की देहली पर बैठी थी।

उसने साड़ी ओढ़ रखी थी और सामने, ठीक देहली के बाहर, ज़मीन पर दो चप्पलें रखी थीं।

चाचा की चप्पलें।

बड़ी। भूरी। एक तरफ़ की एड़ी थोड़ी घिसी हुई, क्योंकि चाचा दाएँ पैर के बल ज़्यादा चलता है।

मैं रुका।

"चाची।"

उसने सिर उठाया।

दो दिन में चेहरा उतर गया था। आँखें अंदर धँसी हुई थीं और होंठ सूखे थे।

"ये क्या है?" मैंने चप्पलों की तरफ़ इशारा किया।

"जब वो बाहर जाते हैं," चाची ने धीरे से कहा, "तो चप्पल यहीं रख जाते हैं। वापस आते वक़्त पहनते हैं।" उसकी आवाज़ रुकी। "अगर चप्पल यहाँ है, तो बाहर नहीं हैं। अगर चप्पल नहीं है, तो…"

वो बोल नहीं पाई।

मैं उसके पास बैठ गया।

दोनों जानते थे कि ये तर्क काम का नहीं है। कोई आदमी घर से निकलते वक़्त बताकर नहीं जाता कि उसे पकड़ लो। पर चाची यही करना चाहती थी। जब आदमी के पास कुछ और नहीं बचता, तो वो चप्पलों से ही हिसाब लगाने लगता है।

"कुछ खाया?" मैंने पूछा।

"तेरे चाचा कुछ नहीं ले गए," उसने कहा, जैसे मैंने सवाल ही नहीं पूछा हो। "न थैला, न कपड़े। बस वही बनियान पहने निकले, जो तुम्हारे पापा की थी। मैंने कहा था कि बनियान फटी है, छोड़ दो। वो नहीं माने। बोले — भईया की है। भईया का कुछ तो साथ रहे।"

मेरे गले में रजिस्टर और भारी हो गया।

"चाची," मैंने धीरे से पूछा, "उस रात जब वो लौटे थे — कितनी देर रहे?"

"थोड़ी देर।"

"कितनी?"

"जितनी में एक आदमी छत पर चढ़े, अलमारी खोले, कुछ देखे, और नीचे उतर आए।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पंद्रह मिनट। बीस भी नहीं।"

"और वो जाते वक़्त क्या बोले?"

"बोले — मैं किसी से मिलकर आता हूँ।"

"किसी से?"

"नाम नहीं लिया।" चाची की आवाज़ काँपी। "और एक बात बोले थे जो मुझे लगातार सुनाई दे रही है। बोले — सीमा, अगर मैं लौटूँ तो बहुत से सवालों का जवाब देना पड़ेगा।"

मैं चुप बैठा रहा।

टीन की छत पर कोई चीज़ गिरी, या शायद कोई चिड़िया बैठी और उड़ गई। एक पल के लिए दोनों की साँसें सुनाई दीं।

फिर चाची ने मेरी तरफ़ देखा और वो सवाल पूछा जो वो दो दिन से पूछना चाहती थी।

"अर्जुन, जो आदमी सुबह आए थे — पतले चश्मे वाले और मोटे — वो कह रहे थे कि वही रजिस्टर। कौन सा रजिस्टर?"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

मैं उससे झूठ नहीं बोल सकता था, और सच जिस तरह से उसके सामने रखता, उससे उसकी रात कट जाती।

"चाची," मैंने कहा, "जिस रजिस्टर की बात वो कर रहे थे, वो पापा का था।"

उसका हाथ मेरी बाँह पर आया।

"पापा का?"

"अभी मेरे पास है।"

"और उसमें क्या है?"

"हिसाब।" मैंने कहा। "पुराना हिसाब। और चाची — उसमें चाचा का नाम भी है।"

उसका हाथ मेरी बाँह पर ठंडा पड़ गया।

मैंने देखा कि उसके चेहरे पर पहले डर आया, फिर राहत, और फिर वो राहत से भी बड़ा एक और डर, जो सिर्फ़ उन लोगों के चेहरे पर आता है जो बरसों से किसी बात का इंतज़ार कर रहे हों और अब वो आने वाली हो।

"मुझे पता था," उसने धीरे से कहा।

"क्या पता था?"

"कुछ तो किया है उसने।" उसने मेरी बाँह छोड़ दी और अपने घुटनों को अपनी तरफ़ खींच लिया, जैसे ठंड लग रही हो। "इन ग्यारह सालों में एक बार भी महेंद्र ने तुम्हारे पापा की बात पर पूरी नज़र से नहीं देखा। जब भी नाम आता, वो घूम जाता, या पानी माँगता, या बोलता कि अब क्या फ़ायदा। और एक और बात — जिस दिन तुम्हारे पापा का तेरहवाँ हुआ था, उस रात वो बाहर गए थे और सुबह बहुत देर से लौटे, और उनके हाथ में बंद लिफ़ाफ़ा था। मैंने पूछा क्या है। उन्होंने कहा — कुछ नहीं। किसी और की ज़िंदगी।"

"और वो लिफ़ाफ़ा?"

"पता नहीं।" उसने आँखें बंद कीं। "उसके बाद मैंने उनसे कभी वो लिफ़ाफ़ा नहीं देखा और न पूछा।"

हम चुप बैठे रहे।

फिर मैंने उसके हाथ पर हाथ रखा।

"मैं चाचा का इंतज़ार करूँगा।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"अर्जुन," उसने कहा, "गुस्से में कुछ मत करना। मैंने तुम्हारे चाचा को जितना देखा है, उससे ज़्यादा तुम्हारे पापा को देखा है। और मैं कह रही हूँ — जिस रात वो गए, उस रात वो डरे हुए थे। डरा हुआ आदमी कुछ भी कर सकता है। और बाद में वो अपने डर को बहाने बनाकर उसी के साथ जीने लगता है।"

मैंने सिर हिलाया।

"मैं सिर्फ़ एक सवाल पूछूँगा," मैंने कहा।

चाची उठी और अंदर चली गई।

मैं आँगन में गया।

आँगन में ज़मीन पर जली माचिस की एक तीली पड़ी थी। दो ही कदम आगे एक लाल धागे का टुकड़ा था, जो पूरे आँगन की मिट्टी में अकेला खड़ा था। मैंने उसे नहीं उठाया।

मैंने आँगन के कोने में रखी पुरानी बेंच पर बैठकर रजिस्टर अपनी बनियान से खोला।

और फिर मैंने काग़ज़ के उसी पन्ने को देखा।

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