A Dark Secret – Chapter 146
मुझे कुछ समझ नहीं आया।
"तेरे पापा किसी की दवा के पैसे भेजते थे?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर जब से वो लाइन पढ़ी है, मेरे हाथ से कोई चीज़ नहीं टिक रही।"
वो अपने दोनों पेन उठाकर जेब में रखने लगा और फिर वापस मेज़ पर रख दिए, जैसे उन्हें भूलना चाहता हो।
उसी वक़्त बाहर गली में चप्पलों की तेज़ आवाज़ आई।
दौड़ता हुआ कोई आ रहा था। पतली टाँगें, हवा में बाल, और साँस फूटने से पहले ही बोलना शुरू।
जुगनू शटर के नीचे से सरककर घुसा और सीधे मेरे सामने खड़ा हो गया।
उसका मुँह लाल था, माथे पर पसीना, और आँखों में वो चमक कि उसने कुछ ऐसा देखा है जो वो ज़िंदगी भर नहीं भूलेगा।
"भैया!" उसने चिल्लाकर कहा। "भैया, तूने मिस कर दिया! तू पूरा मिस कर दिया!"
"साँस ले," मैंने कहा। "पहले साँस ले।"
"साँस क्या लूँ भैया, मैं तो दौड़कर आया हूँ ढाबे से! सफ़ेद कुर्ते वाला आया था!"
मेरा पूरा शरीर एक झटके में सीधा हो गया।
कबीर की कुर्सी पीछे सरकी।
"कौन सफ़ेद कुर्ते वाला?" कबीर ने पूछा।
"वही जिसने गैराज पर ताला लगाया था भैया! वही! जिसके हाथ में चाबियों का गुच्छा था, जिसने फोटो खींची थी!"
"क्या हुआ?" मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"वो ढाबे पर आया। सीधा दीदी के सामने जाकर खड़ा हो गया। बड़ी शराफ़त से बोला — दीदी, अर्जुन भैया कहाँ हैं? भाई साहब ने बुलाया है।"
"और दीदी ने?"
जुगनू ने हाथ हवा में घुमाया।
"भैया, दीदी उस वक़्त कड़ाही में पकौड़े डाल रही थीं। लोहे का वो लंबा चमच हाथ में। और जब वो बोला कि भाई साहब ने बुलाया है — भैया, दीदी ने कड़ाही से चमच निकाला और सीधा उसकी तरफ़ बढ़ गईं।"
मैंने कबीर की तरफ़ देखा। कबीर का मुँह बंद था।
"और दीदी ने कहा," जुगनू ने दोनों हाथ ऊपर करके, रुक्मा दीदी की आवाज़ की नक़ल करते हुए, "कह भाई साहब को, उनका आदमी मेरे ढाबे पर आकर मेरे लड़के को नहीं पकड़ेगा। जा, अभी जा।"
"और वो गया?" मैंने पूछा।
जुगनू ने मुँह खोलकर हँसा, जैसे यह उसकी ज़िंदगी का सबसे अच्छा मज़ाक हो।
"भैया, वो भागा। ढाबे से बाहर भागा, अड्डे के बीच से भागा, और दीदी उसके पीछे-पीछे चमच लेकर दौड़ीं।"
"कितनी दूर तक?"
"पूरे बाज़ार में भैया! पूरे बाज़ार में! ड्राइवर रोटी छोड़कर खड़े होकर देख रहे थे, तीन ट्रक वाले हँस-हँसकर बेंच पीट रहे थे। और आख़िर में —" जुगनू ने एक पल रुककर साँस ली, जैसे अब अपनी सबसे बड़ी बात कहने जा रहा हो, "— आख़िर में उसकी एक चप्पल छूट गई भैया।"
मैं चुप रहा।
"एक चप्पल?"
"हाँ! उलटी पड़ी रह गई नाली के पास! और वो झुककर उठाने नहीं आया! दीदी ने दो कदम और बढ़ाए तो वो नंगे पाँव गाड़ी तक भागा और बोलेरो में बैठ गया।"
कबीर पीछे से बोला, "बोलेरो?"
"हाँ भैया, बोलेरो! भूरी बोलेरो, फटी मफ़लर वाली!"
मेरे और कबीर की नज़रें मिलीं।
एक ही वक़्त में दोनों को वही आवाज़ याद आ गई। वो फटी मफ़लर, वो बेयरिंग की घरघराहट, और गियर बदलते वक़्त की वो एक चटक।
"अर्जुन," कबीर ने धीरे से कहा।
"रहने दे," मैंने कहा। "मुझे पता है।"
जुगनू मेरे आगे-पीछे घूमने लगा।
"भैया, दीदी ने मुझे भेजा है। कहा कि जाकर अर्जुन को कहना —"
"क्या कहना?"
उसने आँखें मूँदकर, जैसे कोई रटा हुआ पाठ सुना रहा हो, बोला, "कहना कि आज से उसका बिस्तर ढाबे पर लगेगा। वो उस कमरे में नहीं सोएगा जहाँ उसकी चीज़ें रखी हैं। और कहना कि रजिस्टर का बंदोबस्त वो खुद कर ले, हम ढाबे वाले हिसाब नहीं रखते।"
"और?"
"और —" जुगनू ने एक आँख खोलकर मुझे देखा, "— और कहना कि उसकी चाय का हिसाब आज से दीदी की कॉपी में चढ़ेगा। मुफ़्त की चाय पर तेरा हक़ नहीं बनता।"
मैं हँस पड़ा।
सच में, एक पल के लिए, मैं भूल गया कि मेरी हथेली कटी है और सीने पर एक ऐसी किताब लटकी है जिसके लिए लोग मरते हैं।
पर हँसी के बाद गले में कुछ अटक गया।
मैंने जुगनू की तरफ़ देखा।
"दीदी ने ये सब उस आदमी के सामने किया?"
"हाँ।"
"अकेले?"
"एक हाथ में चमच, भैया।"
और मुझे रुक्मा दीदी दिखाई देने लगीं — अड़तालीस साल, भरी हुई, कमर पर चाबियों का गुच्छा, और कड़ाही से उठता हुआ धुआँ।
मैंने जुगनू के सिर पर हाथ रखा।
"तू जाकर दीदी से कह दे," मैंने कहा, "कि मैं आ रहा हूँ। और कहना कि चाय में इलायची डाल दे, आज दो कटोरे पीने हैं।"
जुगनू दौड़ गया।
वो जाते वक़्त शटर के नीचे से झाँका और चिल्लाया, "और भैया! वो चप्पल मैंने उठा ली है! दिखाऊँ?"
"रख दे उसे," मैंने कहा। "वो चप्पल हमारा सबूत है।"
"अरे वाह!" वो ख़ुशी से चिल्लाया और भाग गया।
शटर फिर से चुप हो गया।
मैं कबीर की तरफ़ मुड़ा।
वो रजिस्टर खोलकर उसके पन्ने गिन रहा था। धीरे-धीरे, उँगली से, बिना आवाज़ किए।
"कबीर।"
"एक मिनट।"
"कबीर, वो चार कदम पर रह गया। दीदी के ढाबे पर, दिन के उजाले में, सबके सामने। अगर वो थोड़ी देर और रुक जाता—"
"तो क्या?" उसने सिर उठाया। "तो वो दीदी को कुछ कर देता? नहीं करता। वो ऐसे कामों में अपने हाथ नहीं लगाता, अर्जुन। वो आदमी बस देखने आता है और गिनने आता है। कौन कहाँ खड़ा है। किसके पास क्या है। कौन किससे मिलता है।"
"और वो हमें गिन रहा है।"
"हाँ।" उसने पन्ना पलटा। "और आज उसने गिन लिया कि ढाबे पर एक औरत है जो उसके भाई साहब का नाम सुनकर चमच उठा लेती है। ये बात वो अपने भाई साहब को ज़रूर बताएगा।"
मैंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, "तो ढाबे पर भी किसी को तैयार रखना पड़ेगा।"
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में एक अजीब सी बात आई — जैसे मैंने वो कह दिया हो जो वो कहना चाहता था पर नहीं कह सकता था।
"तू नहीं मानेगा," उसने कहा। "तू चाहे जो हो जाए, नहीं मानेगा।"
"नहीं मानूँगा।"
"इसीलिए तेरे पापा ने ये रजिस्टर छिपाकर रखा था।"
मैं चुप हो गया।
उसने आगे कहा, "वो भी नहीं मानते थे, है ना?"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "मैंने उन्हें सिर्फ़ सोलह साल तक देखा है। उसके बाद सिर्फ़ याद है। और याद में आदमी अपनी मर्ज़ी का चेहरा बना लेता है।"
कबीर कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा।
फिर उसने उँगली रजिस्टर पर रखी और पन्ने गिनने लगा।
पन्ना। पन्ना। पन्ना।
उसका मुँह धीरे-धीरे हिल रहा था, जैसे वो गिनती कर रहा हो।
अचानक उसकी उँगली रुकी।
और बिना नज़र उठाए, बहुत आम आवाज़ में, जैसे पूछ रहा हो कि चाय में कितनी शक्कर डालूँ, उसने कहा —
"ये नीला गोल निशान तुझे और कहाँ मिला?"
मेरी साँस एक पल के लिए रुकी।
"क्या?"
"ये नीला गोल।" उसने उँगली उस छोटे, फीके, धुँधले निशान पर रखी। "ये मुझे यहाँ दिख रहा है। सत्ताईस तारीख़ के नीचे। पर ये पहली बार नहीं दिख रहा है। मुझे लगता है मैंने ये निशान तेरे हाथ में कोई काग़ज़ देखा है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"अर्जुन।"
"कबीर," मैंने कहा, "पहले तू बता, तेरा कैलकुलेटर क्यों गिरा।"
उसकी उँगली रजिस्टर पर जम गई।
"क्या?"
"मैंने तुझे पाँच साल में एक बार भी चीज़ गिराते नहीं देखा। तू वो आदमी है जो रसीद उलटी पकड़कर भी एक बार टेबल पर नहीं रखता। आज तेरे हाथ से कैलकुलेटर गिरा। उठाने भी नहीं गया। बैटरी अभी भी नीचे पड़ी है।" मैंने काउंटर के नीचे इशारा किया। "तो मैं अपने सवाल का जवाब तुझे देने से पहले जानना चाहता हूँ — कबीर, तू क्या छिपा रहा है?"
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