A Dark Secret – Chapter 145
मैंने रजिस्टर उठाया और उसे बनियान में फिर से लपेटने लगा।
और जब मैं लपेट रहा था, तब मेरी उँगली उस नई स्याही वाली लाइन पर फिर से गई।
अर्जुन यादव। कंधा बस्ती। काम बंद।
नीचे वो छोटा नीला गोल।
मैंने अपनी बँधी हथेली देखी।
फिर रजिस्टर की तरफ़ देखा।
और बहुत धीरे से, इतना धीरे कि जुगनू ने भी मुश्किल से सुना, मैंने कहा —
"अब ये रजिस्टर मेरा है। और जिसने इसे आज तक भरा है, उससे मैं पूछूँगा कि मेरा नाम उसकी कॉपी में कब चढ़ा।"
॥
शाम को धूल थोड़ी बैठ गई थी, पर कबाड़ बाज़ार की आवाज़ नहीं बैठी थी।
लोहे के पुराने पुर्ज़ों की टकराहट, किसी बैलगाड़ी की अधूरी घंटी, और दूर कहीं किसी ट्रक का इंजन जो स्टार्ट होकर बंद हो रहा था — जैसे कोई बूढ़ा आदमी खाँसकर चुप हो जाता है।
मैं गाड़ी महल की उस तंग गली में चल रहा था, बगल में मेरा बँधा हाथ, और सीने से चिपकी हुई बनियान।
बनियान के अंदर पापा का रजिस्टर था।
हर कदम पर वो मेरी पसलियों से टकराता था, और मुझे लगता था कि कोई मेरे सीने पर हाथ रखकर धीरे-धीरे गिन रहा है — एक, दो, तीन।
मेरी हथेली में कपड़ा था, जिस पर रुक्मा दीदी ने गाँठ कसी थी। कपड़ा सूख चुका था और खींचने पर चुभता था।
दर्द अच्छा लग रहा था। दर्द का मतलब होता है कि हाथ अभी मेरा है।
कबीर की दुकान पर टिन का शटर आधा उठा था।
अंदर पीली रोशनी थी, और वो रोशनी में हिसाब के काग़ज़ पर सिर झुकाए बैठा था। दो पेन उसकी शर्ट की जेब में — नीली स्याही, काली स्याही। एक कान के पीछे।
और सामने मेज़ पर वो बड़ा सस्ता कैलकुलेटर, जिसके बटन ज़ोर से दबाने पड़ते थे और जो ठक-ठक करता था।
दुकान की घड़ी दीवार पर लटकी थी।
दस बजकर सत्ताईस मिनट।
वही पुरानी रुकी हुई घड़ी। पिछली बार मैंने इसे देखकर कहा था कि ये तेरा राज़ है, कबीर। उसने कुछ नहीं कहा था, बस मुस्कुरा दिया था।
आज वो भी मुस्कुराया नहीं।
मैंने दुकान के सामने खड़े होकर एक पल सड़क देखी। कोई पीछे नहीं था। कोई बोलेरो नहीं, कोई फटी मफ़लर नहीं।
पर सुबह से मेरे कान एक ही आवाज़ पर टिके हुए थे — वो मीठी आवाज़, जो बोलेरो से आकर मुझे बेटा कह गई थी और चाचा लाने का झूठ बोल गई थी।
मैंने शटर के नीचे से सिर झुकाकर अंदर पैर रखा।
"कबीर।"
उसने सिर नहीं उठाया।
"दो मिनट," उसने कहा। "इकतालीस पंक्तियों का जोड़ रहा हूँ। एक रुपया भी इधर-उधर नहीं होना चाहिए।"
"कबीर।"
"दो मिनट, अर्जुन।"
मैंने बनियान के अंदर से रजिस्टर निकाला।
काली जिल्द। घिसे कोने। जिल्द पर चिपकी वो पुरानी तस्वीर — पीला ट्रक, चार आदमी, और एक चेहरा जिसे ब्लेड से खुरचकर सफ़ेद कर दिया गया था।
मैंने उसे मेज़ पर रख दिया।
ठक।
कबीर का हाथ रुक गया।
उसने धीरे से सिर उठाया। पहले मेरा चेहरा देखा, फिर मेरा बँधा हाथ, फिर मेज़ पर पड़ी चीज़।
और जैसे ही उसकी नज़र जिल्द पर गई, उसका पूरा शरीर एक झटके में सीधा हो गया — जैसे किसी ने उसकी कुर्सी के नीचे तार खींच दिया हो।
"ये…" उसकी आवाज़ फट गई। उसने गला साफ़ किया। "ये वही है?"
"ये वही है," मैंने कहा।
उसने कैलकुलेटर उठाने के लिए हाथ बढ़ाया — आदत से, बस कुछ पकड़ने के लिए।
और कैलकुलेटर उसके हाथ से गिर गया।
नीचे पत्थर के फ़र्श पर। ढक्कन खुलकर अलग गया, बैटरी निकलकर काउंटर के नीचे लुढ़क गई, और बटनों से एक आवाज़ निकली जैसे किसी ने छोटी हड्डी तोड़ दी हो।
मैंने कबीर को देखा।
इस आदमी के हाथ से चीज़ें नहीं गिरतीं। ये वो आदमी है जो तांबे की वॉशर भी रुमाल में लपेटकर जेब में रखता है। जो कैलकुलेटर पर हर आंकड़ा तीन बार दबाता है।
आज उसका कैलकुलेटर गिरा।
"कबीर," मैंने कहा।
वो नीचे नहीं झुका। बैटरी काउंटर के नीचे चली गई और वो उसे उठाने नहीं गया।
वो बस रजिस्टर को देखता रहा।
"कबीर, तेरा कैलकुलेटर—"
"रहने दे।"
उसने रजिस्टर खींचा।
धीरे, दोनों हाथों से, जैसे कोई मरी हुई चीज़ उठाता है।
और फिर उसने पन्ना पलटा।
पहला। दूसरा। तीसरा।
उसकी उँगली उन लाइनों पर रुकती जाती थी, जिनमें गाड़ी नंबर थे, तारीख़ें थीं, बीमा की रकमें थीं, और आगे-आगे छोटे-छोटे अक्षर — ठा, दे, ऊपर से।
फिर उसने जिल्द पर चिपकी तस्वीर देखी।
और फिर वो चौथा चेहरा — जिसकी जगह सिर्फ़ एक सफ़ेद, खुरचा हुआ धब्बा था।
उसने अपनी उँगली उस सफ़ेद धब्बे पर रखी।
बहुत हल्के से।
मैंने देखा कि उसके होंठ हिल रहे हैं, पर आवाज़ नहीं आ रही। जैसे वो किसी चीज़ को पढ़ रहा हो जो काग़ज़ पर नहीं, उसके अंदर लिखी हो।
कुछ देर बाद उसने रजिस्टर बंद किया।
धीरे से, जैसे किसी को नींद से जगाने से डर रहा हो।
और उसके बाद दुकान में इतनी चुप्पी हो गई कि मुझे अपनी साँस तेज़ सुनाई दी।
"अर्जुन," उसने कहा। आवाज़ बहुत सपाट थी। "इस काग़ज़ में जो लिखा है, इसके लिए लोग मरते हैं।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मरते हैं, अर्जुन।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "केवल काग़ज़ी बात नहीं कर रहा। मेरे सामने मरे हैं। दस साल में, इसी शहर में, इसी बाज़ार में। और वो मरे भी तो रसीद पर लिखा गया — हादसा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तुझे कुछ नहीं पता।" उसकी आवाज़ पहली बार तेज़ हुई। फिर अचानक वो नीचे हो गई, इतनी नीची कि मुझे उसकी बात सुनने के लिए झुकना पड़ा।
"ये कोई रसीद नहीं है। ये हिसाब है। और जिसके हाथ में ये हिसाब है, वो उस शहर का मालिक है। तू समझ रहा है ना? ये काग़ज़ किसी को नहीं दिखेगा। किसी को। पुलिस को भी नहीं। रिपोर्टर को भी नहीं।"
"नैना—"
"नैना को भी नहीं," उसने काट दिया। "नैना अपनी लड़ाई लड़ रही है और वो अपने पापा के लिए लड़ रही है। हर आदमी जब अपने मरे हुए के लिए लड़ता है, तो बीच में जो दूसरा खड़ा हो, वो कुछ समय बाद ख़र्च हो जाता है। तू उसके ख़र्चे में मत चढ़।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"कबीर," मैंने कहा, "तू डर गया है।"
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।
वो कुर्सी से उठकर दुकान के दरवाज़े तक गया, बाहर गली में देखा — दायें, फिर बायें — और फिर शटर को थोड़ा और नीचे खींच दिया, इतना कि अब बाहर से सिर्फ़ हमारी टाँगें दिखेंगी।
वापस आकर वो मेज़ के सामने खड़ा रहा।
"तू इसे किसी को नहीं दिखाएगा," उसने कहा।
"कबीर—"
"मैं तेरे पापा का नाम लेकर कहता हूँ।"
और वो चुप हो गया।
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतर गया।
क्योंकि इस शहर में लोग बहुत कुछ कहते हैं। झूठ बोलते हैं, ठीक है। धमकाते हैं, ठीक है। पर कोई मरे हुए आदमी का नाम लेकर झूठ नहीं बोलता। ख़ासकर वो आदमी जो खुद अपने बाप के नाम से डरता हो।
"तूने मेरे पापा को देखा भी नहीं कभी," मैंने धीरे से कहा।
"फिर भी उनका नाम ले रहा हूँ," कबीर ने कहा। "और मैं उनका नाम बेकार नहीं लेता।"
वो वापस कुर्सी पर बैठ गया।
बैटरी काउंटर के नीचे पड़ी थी। उसने उसे नहीं उठाया। कैलकुलेटर का ढक्कन ज़मीन पर उलटा पड़ा था, और उस पर मेरी नज़र जा रही थी।
मुझे हँसी आनी चाहिए थी। ये आदमी, जो हर काम के पैसे तीन बार जोड़ता है, आज अपना ही कैलकुलेटर गिरा बैठा और उठाना भूल गया।
पर हँसी नहीं आई।
"तेरे पापा के रजिस्टर में," कबीर ने अचानक कहा, "मैंने एक लाइन पढ़ी है जो मुझे छू गई।"
"कौन सी?"
"मेरी अम्मा की दवा के पैसे।" उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर नहीं देखा। "तेरे पापा ने किसी आदमी की दवा के पैसे का ज़िक्र लिखा है और आगे लिखा है — इस महीने नहीं भेज पाया, अगले महीने भेजूँगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno