A Dark Secret – Chapter 137
"तेरी चाची ने सुबह झूठ बोला था, अर्जुन।" उसने चश्मा ऊपर धकेला। "और जो आदमी सुबह झूठ बोलता है, वो रात की बात पूरी नहीं बताता।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बस्ती के ऊपर आसमान कभी पूरा काला नहीं होता — कुछ न कुछ पीला रह जाता है, किसी न किसी बत्ती का।
"कल सुबह आठ बजे," मैंने कहा।
"क्या?"
"तू आठ बजे ढाबे पर हो। बेंच ठीक करते वक़्त तू वहीं बैठ।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब रुक्मा दीदी ड्राइवरों के सामने बोलेंगी," मैंने कहा, "तब वहाँ कैमरा होना चाहिए। और काग़ज़। और एक आदमी जो झूठ को पकड़ सके।"
"और तू क्या करेगा?"
"मैं चाय पिऊँगा," मैंने कहा। "दीदी ने कहा है, मेरी चाय कॉपी में लिखी जाएगी। सो मुझे पूरा हक़ है।"
वो हँसी। पहली बार उस रात में किसी ने हँसा।
और फिर हँसी रुक गई, क्योंकि मैंने अपनी जेब से वो नई पर्ची निकाली और उसे दोबारा देखा।
"नैना," मैंने कहा, "अगर ये पर्ची किसी ने अभी लिखी है, तो उसने रकम भी अभी तय की है।"
"हाँ।"
"चार लाख उन्नीस हज़ार। वही रकम जो पापा के हादसे पर थी।"
"हाँ।"
"इसका मतलब वो किसी और को नहीं, उसी तरह का हादसा दोबारा बना रहे हैं।"
नैना ने पर्ची मेरे हाथ से ली, उसे अपनी आँखों के पास की, और फिर बहुत धीरे से बोली।
"अर्जुन, गाड़ी का नंबर चार दो छह एक है।"
"हाँ।"
"ये नंबर मैंने कहीं देखा है।"
मेरी साँस रुकी।
"कहाँ?"
"याद नहीं आ रहा।" उसने आँखें बंद कीं। "पर देखा है। किसी काग़ज़ पर। हमारे पास।"
"तेरे तेरह काग़ज़ों पर?"
"शायद।" उसने आँखें खोलीं। "या जो काग़ज़ अभी हमारे पास नहीं है, उस पर।"
ढाबे के अंदर से रुक्मा दीदी की आवाज़ आई — "अर्जुन! चाय ठंडी हो रही है!"
मैंने पर्ची जेब में रखी और अंदर चला गया।
पर दरवाज़े पर मैंने एक पल रुककर पीछे देखा। बाईस नंबर टोल की तरफ़। वहाँ रात में कुछ नहीं दिखता, पर आवाज़ें सब दिख जाती हैं। एक ट्रक का इंजन, एक हॉर्न, कोई चीखती हुई ब्रेक।
सब ठीक था। सब सामान्य था।
और यही सबसे डरावना था — कि अगला सत्ताईस अभी आया नहीं था, और उसका हिसाब पहले से लिखा जा चुका था।
॥
ढाबे के अंदर से रुक्मा दीदी की आवाज़ आई — "अर्जुन! चाय ठंडी हो रही है!"
पर मैं दरवाज़े पर ही खड़ा रहा।
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"तेरे तेरह काग़ज़ों पर नहीं है," मैंने धीरे से कहा।
"क्या?"
"वो नंबर। चार दो छह एक। तेरे तेरह काग़ज़ों पर नहीं है।" मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा। "क्योंकि तेरे काग़ज़ सारे पुराने हादसों के हैं। और ये नंबर एक ऐसे काग़ज़ पर है जो अभी किसी और के पास है।"
नैना की आँखें बदलीं।
"रजिस्टर," वो फुसफुसाई।
"रजिस्टर," मैंने कहा।
और फिर मैं दौड़ा।
पीछे से रुक्मा दीदी की आवाज़ आई — "अरे! चाय का पैसा—"
"कल दे दूँगा, दीदी!"
"कॉपी में लिखवा लूँगी!"
मैंने हाथ हिलाया और सड़क पकड़ ली।
रात के ग्यारह बज चुके थे। ट्रांसपोर्ट नगरी में इस वक़्त भी उतनी ही चहल है जितनी दोपहर में, बस आवाज़ का मिज़ाज बदल जाता है। दिन में यहाँ हॉर्न हैं, शोर है, गालियाँ हैं। रात में सिर्फ़ इंजन हैं — दूर से आते हुए, पास आकर भारी होते हुए, और फिर गुज़र जाते हुए।
मैं ढाबे से निकलकर पतली गली में घुसा। जूते कीचड़ में धँसते गए। एक जगह पानी की टंकी का नल खुला छूटा था और सड़क पर पतली धार बह रही थी, जिसमें किसी ने कपड़े धोए थे। साबुन की महक आ रही थी।
कंधा बस्ती तक पहुँचने में मुझे आठ मिनट लगे।
आठ मिनट में मैंने सिर्फ़ दो बातें सोचीं।
पहली — कि पापा का रजिस्टर दस साल से उसी घर में था जिसकी छत पर मैं सोता था। मेरे सिर के नीचे, दो हाथ की दूरी पर। मैं वहाँ पच्चीस दिन से सो रहा था और मुझे कुछ पता नहीं था।
दूसरी — कि चाचा उस रात खाली हाथ नहीं लौटे थे। नैना ने कहा था और नैना की बात मुझे चुभ रही थी, क्योंकि गली में दौड़ते वक़्त इंसान के पास सच से भागने की जगह नहीं होती।
घर का दरवाज़ा खुला था।
दरवाज़ा नहीं — दरवाज़े की कुंडी लगी थी, पर ऊपर की खिड़की खुली थी और उससे पीली रोशनी गली में गिर रही थी। नीचे आँगन में चाची की लालटेन रखी थी, जिसकी बत्ती बहुत धीमी जल रही थी, जैसे वो खुद थक गई हो।
मैं सीढ़ी से ऊपर चढ़ा।
छत पर हवा थी और हवा में वही पुरानी गंध थी — नौसादर, तेल और टिन की छत की गर्मी।
अलमारी खुली पड़ी थी। पेंदा खोखला, जैसा मैंने छोड़ा था। अंदर से जो निकाला था, वो सब मेरी बनियान में था, मेरे सीने पर।
मैं अलमारी के सामने घुटनों के बल बैठ गया।
और मैंने वो किया जो मुझे उस वक़्त करना चाहिए था — मैंने पेंदे के नीचे की लकड़ी देखी।
जो लकड़ी मैंने पहले खोली थी, वो ऊपर की थी। उसके नीचे उतनी जगह थी जितनी एक रिकॉर्डर और एक टिन के लिए काफ़ी थी।
पर उस लकड़ी के नीचे भी एक लकड़ी थी।
और वो हिल रही थी।
मैंने उँगली से दबाया। एक कोना ऊपर उठा।
मैं वहीं बैठा रह गया।
नीचे से चाची की आवाज़ आई। "अर्जुन?"
"हाँ, चाची।"
"तू अकेला है?"
"हाँ।"
कुछ देर चुप्पी रही। फिर सीढ़ी पर चप्पल की आवाज़ आई — धीमी, धीमी, जैसे हर क़दम से पहले सोचा जा रहा हो कि उठाना है या नहीं।
चाची छत के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं।
उनके हाथ में एक चप्पल थी।
एक ही।
वो मर्दों की चप्पल थी, चाचा की, और उसकी एड़ी टूटी हुई थी। चाची उसे ऐसे पकड़े हुए थीं जैसे किसी का हाथ पकड़ा हो।
मैंने उनके चेहरे की तरफ़ देखा।
वही डर था। वही डर जो पहले दिन उनके चेहरे पर था, जब वो दरवाज़ा खोलकर मुझे देखकर डर गई थीं, जब उन्होंने कहा था कि रामलाल ने जाने से पहले कुछ कहा था।
पर इस बार उनकी आवाज़ में वो काँप नहीं था जो सुबह था। सुबह उनकी आवाज़ बीच से टूट रही थी, जैसे कोई झूठ बोलते-बोलते रुक जाए। अब टूट नहीं रही थी।
अब वो सिर्फ़ डरी हुई थीं, झूठी नहीं।
"चाची," मैंने कहा, "चाचा कहाँ हैं?"
उन्होंने चप्पल को सीने से लगा लिया।
"नहीं आए," उन्होंने कहा।
"कब से?"
"कल दोपहर से। कहकर गए थे कि थाने जाकर बयान सुधारकर दो बजे तक लौट आएँगे। दो बजे फ़ोन किया, बंद था। चार बजे किया, बंद था। शाम को मैंने दुकान पर जाकर देखा, ताला लगा था।" उन्होंने साँस ली। "आज सुबह दो आदमी आए।"
मेरा हाथ अलमारी के पेंदे पर जम गया।
"कैसे आदमी?"
"एक पतला, शीशे वाला। एक मोटा।" उन्होंने नीचे देखा। "मैंने दरवाज़ा नहीं खोला। कुंडी से सटकर बोली, कहिए क्या है। उन्होंने सिर्फ़ एक बात पूछी।"
"क्या?"
"रजिस्टर कहाँ है।"
छत पर एक पल के लिए सब आवाज़ें रुक गईं। दूर किसी गाड़ी का हॉर्न बजा और फिर चुप हो गया।
"बस इतना?" मैंने पूछा।
"बस इतना। नाम नहीं पूछा, किराया नहीं पूछा, रामलाल की कुशल नहीं पूछी।" चाची ने चप्पल को और कसकर पकड़ा। "मैंने कहा, कौन सा रजिस्टर, यहाँ कोई रजिस्टर नहीं। तो पतले ने कहा — वो रजिस्टर जो उसका आदमी लेने आया था।"
"कौन सा आदमी?"
"मैंने कुछ नहीं कहा," चाची ने कहा। "मैं डर गई, अर्जुन। बोल दिया कि यहाँ कोई नहीं आया, कोई रजिस्टर नहीं। फिर मोटे ने कहा — जब मिल जाए तो बता देना। और वो दोनों जीप में बैठकर चले गए।"
"नंबर?"
"गाड़ी पीछे से थी। नंबर नहीं दिखा।"
मैंने गहरी साँस ली।
"चाची," मैंने कहा, "पिछले हफ़्ते छत पर कौन चढ़ा था?"
उन्होंने तुरंत जवाब नहीं दिया।
"चाची।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno