A Dark Secret – Chapter 117
फिर ऊपर गाड़ी का दरवाज़ा खुला।
मैं रुक गया। पीछे मुड़ा। पुल की रेलिंग से कोई झुककर नीचे देख रहा था, और फिर एक आवाज़ आई — पान की पीक थूकने की, जो नीचे रेत पर गिरी।
"नीचे कोई नहीं," ऊपर से एक आवाज़ आई, दबी हुई, फ़ोन में बोलती हुई। "बारह बजे आएँगे। तब तक कुछ नहीं।"
मैंने आँख बंद की।
गाड़ी का इंजन अभी भी चल रहा था। उसकी आवाज़ में वो तीन चीज़ें थीं जो मैं बरसों से सुनता आया हूँ — धातु की हल्की घिसाई, हवा का पतला रिसाव, और वो हिस्सा जो बाकी सबको सिर्फ़ शोर लगता है। इस गाड़ी का पंप पुराना था। और उसका पंखा ढीला। ऐसी गाड़ी पूरी रात नहीं खड़ी रह सकती। इसे लौटना ही पड़ेगा।
दरवाज़ा बंद हुआ। गाड़ी घिसककर आगे गई और फिर उसकी आवाज़ पुल के मोड़ पर दब गई।
"चल," मैंने कहा।
हम रेत में से निकले। टीटू ने अब चलने से इनकार कर दिया। उसके होंठ फटे थे और आवाज़ गले में अटक रही थी।
"भैया, मैं नहीं चल पा रहा। तुम मुझे यहीं छोड़ दो। वो मुझे ढूँढ लेंगे तो सिर्फ़ मैं रहूँगा।"
"अच्छी बात है," मैंने कहा। "फिर तू यहीं बैठ। सुबह मैं आकर तेरी हड्डियाँ इकट्ठी करूँगा।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर हँसा। हँसी में दाँत दिखे, खून लगा हुआ। फिर वो चला।
जुगनू उसका हाथ पकड़कर आगे बढ़ गया और बोला, "मेरे पीछे पाँव रखना, बाबा। मैं इस रेत में बिना काँटे के चल सकता हूँ। साल भर से चल रहा हूँ।"
नैना मेरे बगल में चल रही थी।
"अर्जुन," उसने धीरे से कहा, "इस गाड़ी वाले ने कहा बारह बजे आएँगे। हमारे पास पचास मिनट हैं।"
"अरे नहीं," मैंने कहा। "हमारे पास पूरी रात है। और वो लोग बारह बजे यहाँ आएँगे, जहाँ हम एक मिनट पहले तक थे। मुझे यही पसंद है।"
हम नदी के किनारे-किनारे चले और ढाबे के पीछे की चारदीवारी तक पहुँचे। रुक्मा दीदी का आँगन। ज़मीन पर काँच बिछा था और उनका ट्रक उसी काँच के ऊपर खड़ा था, जैसे कोई चौकीदार दरवाज़े पर बैठा हो।
दीदी दरवाज़े पर खुद खड़ी थीं। उनके हाथ में लोहे का लंबा चमच था और सिर पर फटा हुआ शॉल।
"कौन?" उनकी आवाज़ इतनी ऊँची थी कि आँगन की चारदीवारी से टकराकर लौटी।
"दीदी, मैं।"
वो दो क़दम आगे आईं, टॉर्च मेरे चेहरे पर डाली, फिर टीटू पर पड़ी।
और उनका चमच धीरे से नीचे झुक गया।
"अरे राम," उन्होंने कहा। "ये किसने किया?"
"दीदी, अंदर चलिए," मैंने कहा। "और किसी को कुछ मत बताइए। जुगनू, दरवाज़ा बंद कर।"
अंदर पीली बत्ती जल रही थी। दीदी ने टीटू को बेंच पर बैठाया, उसके पैर गर्म पानी में डाले, और उसके होंठ पर पानी की पट्टी रखी। टीटू पहले तो काँपता रहा, फिर अचानक उसकी आँखें भर आईं और वो छोटे बच्चे की तरह सुबकने लगा।
दीदी ने उसके सिर पर हाथ रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"कल तेरे पीछे दो आदमी आए थे," उन्होंने बिल्कुल सपाट आवाज़ में कहा। "पूछ रहे थे — अर्जुन नाम का लड़का यहाँ चाय पीता है? मैंने कहा, यहाँ रोज़ सौ लड़के चाय पीते हैं, नाम-वाम नहीं पूछती। फिर उन्होंने मेज़ पर एक बंद लिफ़ाफ़ा रख दिया और चले गए।"
"कितना था?"
"पता नहीं। मैंने खोला नहीं।" उन्होंने जेब से एक बंद लिफ़ाफ़ा निकालकर अपनी कड़ाही के पीछे रख दिया। "और मेरे ढाबे पर लिफ़ाफ़े खोलने का रिवाज़ नहीं। खाना खाओ। दोनों।"
"दीदी, टीटू को—"
"टीटू मेरे पास रहेगा।" उनका चमच हवा में लहराया। "मेरी बेंच के नीचे सोएगा, मेरी चारदीवारी के अंदर। कोई ढूँढने आया तो पहले मुझसे पूछेगा। मैं पचास साल से इसी चूल्हे के सामने खड़ी हूँ, मुझे कोई चुप नहीं करा सकता।"
टीटू ने एक बार मेरी तरफ़ देखा, जैसे पूछ रहा हो — भैया, ये औरत सच कह रही है?
मैंने सिर हिलाया। ज़िंदगी में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिनके आगे झूठ अपने आप रुक जाता है। रुक्मा दीदी की आवाज़ वैसी ही थी।
हमने जल्दी से दो रोटियाँ खाईं। दीदी ने मुझे नैना की तरफ़ इशारा करके धीरे से कहा, "ये लड़की भूखी है, इसको भी खिला। काग़ज़ के पीछे भागने से पेट नहीं भरता।"
और फिर मैं और नैना दीदी की उस कमरे वाली खिड़की से बाहर निकले, ट्रक के पीछे से, और गली के मोड़ से कबाड़ बाज़ार की तरफ़ बढ़े।
कबीर की दुकान का शटर आधा था। अंदर पीली रोशनी थी। वो बैठा था, सामने काग़ज़ फैले हुए, और हाथ में नीली स्याही वाला पेन।
"इस वक़्त कौन आता है," उसने बिना ऊपर देखे कहा। "जानता हूँ कोई न कोई आएगा। तुम्हारे आने की आवाज़ अलग है।"
"कैसी आवाज़?"
"तेरी गाड़ी की बेयरिंग में एक गोली चटकी है," उसने कहा। "और तेरे पाँव रेत में पड़े थे, इसलिए तेरी चप्पल से सूखी रेत झर रही है। यहाँ कबाड़ बाज़ार में रात को सिर्फ़ चोर और सपेरे आते हैं। तू सपेरा नहीं लगता।"
मैंने जेब से वो काग़ज़ निकाला और उसकी मेज़ पर रख दिया।
कबीर ने पेन नीचे रखा। काग़ज़ को दोनों हाथों से उठाया, किनारे पर उँगली घुमाई, और फिर उसके चेहरे का रंग बदल गया।
वो उठा, अपनी अलमारी से एक छोटा डिब्बा लाया, उसमें से एक बड़ा सस्ता कैलकुलेटर निकाला — वो जिसके बटन ज़ोर से दबाने पड़ते हैं, ठक-ठक की आवाज़ करते हैं।
"बोल," मैंने कहा।
"रुक।"
उसने पहले नंबर दबाए। दो लाख दस हज़ार। फिर जोड़ा। एक लाख पचास हज़ार। फिर जोड़ा। चार सौ उन्नीस हज़ार।
कैलकुलेटर की स्क्रीन पर नंबर आया और कबीर ने उसे नीली स्याही से अपनी कॉपी पर उतार दिया।
"सात लाख उन्नत्तर हज़ार," उसने कहा।
कमरे में एक पल के लिए सिर्फ़ कैलकुलेटर के बटनों की आवाज़ बची रह गई।
"ये क्या है?" नैना ने पूछा।
"ये एक महीने का हिसाब है," कबीर ने कहा।
"कैसे पता?" मैंने पूछा।
"क्योंकि सत्ताईस इस पन्ने पर एक ही बार लिखा है," उसने उँगली रखकर दिखाया। "अगर ये साल भर का हिसाब होता, तो सत्ताईस बारह बार आता। महीने में एक बार आता है, साल में बारह। यहाँ एक है। यानी ये सिर्फ़ एक महीने का पन्ना है। और इसमें तीन गाड़ियाँ हैं।"
"और बाकी पंद्रह गाड़ियाँ?" मैंने कहा।
कबीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"कौन सी पंद्रह?"
"महीने में अठारह गाड़ियाँ बिना रसीद निकलती हैं। तूने खुद बताया था।"
वो खामोश हो गया। फिर उसने कैलकुलेटर पर फिर से बटन दबाए। ठक। ठक। ठक।
"अगर इन तीन का सात लाख उन्नत्तर हज़ार है," उसने धीरे से कहा, "तो अठारह का हिसाब पंद्रह लाख के पार जाता है। एक महीने का। सिर्फ़ बीमा और काग़ज़ का। तेल-डीज़ल अलग।"
"पंद्रह लाख महीने का," नैना ने कहा, और उसकी आवाज़ सूख गई।
"छत्तीस महीने में," कबीर ने कहा, "पाँच करोड़ से ऊपर। और ये तीन साल की बात है। इससे पहले का हिसाब में नहीं जोड़ रहा, क्योंकि उसके पन्ने मेरे पास नहीं हैं।"
"पाँच करोड़," नैना ने दोहराया।
"तीन साल," कबीर ने कहा। "हर महीने सत्ताईस। और तीन साल में एक भी गाड़ी का मालिक यहाँ खड़ा होकर नहीं आया कि भाई साहब, मेरा माल कहाँ गया?"
मैं बैठ गया। दुकान के बाहर कबाड़ बाज़ार में हवा से कोई टिन का टुकड़ा खड़खड़ाया।
और फिर मैंने वो पूछा, जो मेरे अंदर काफ़ी देर से खुजला रहा था।
"कबीर, तू ये सब इतनी आसानी से कैसे जोड़ लेता है?"
उसके हाथ रुके।
"मतलब?"
"मतलब ये कि मैंने तुझे ये पन्ना दो मिनट पहले दिया। तूने काग़ज़ को दो बार देखा, कैलकुलेटर निकाला, और तीन लाइन में तूने ये बता दिया कि ये सिर्फ़ एक महीने का हिसाब है, अठारह गाड़ियाँ हैं, और तीन साल में पाँच करोड़ बनते हैं। एक पंचर वाला आदमी इतना तेज़ कैसे जोड़ता है?"
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