A Dark Secret115 / 536

A Dark Secret – Chapter 115

7 min read November 6, 2026

चायवाले ने गिलास नीचे रखा। उसने अपनी कमीज़ के नीचे से एक रुमाल निकाला और मुँह पोंछा, जैसे कुछ भारी बोलने से पहले आदमी करता है।

"सफ़ेद गाड़ी आई थी," उसने कहा। "दो आदमी उतरे। एक मोटा, गले में चमकती ज़ंजीर। एक पतला, चश्मा, हाथ में छोटा बैग। उन्होंने दो चाय ली और पूछा कि पुराने पुल तक जाने का रास्ता कौन सा है।"

"क्यों पूछा?"

"मैंने भी पूछा।" चायवाले ने कंधे उठाए। "मोटे ने कहा, सामान उतारना है।"

"सामान?"

"उसका मुँह ऐसा था जैसे सामान कहते वक़्त वो कुछ और सोच रहा हो।" चायवाले ने मेरी तरफ़ देखा। "और पीछे की सीट पर एक लड़का बैठा था। पतला, चश्मा नहीं, सिर झुका हुआ। उसके हाथ सामने बँधे थे।"

मेरा पेट कड़ा हो गया।

"फिर?"

"फिर वो गई। पुराने पुल की तरफ़।" चायवाले ने एक पल रुककर कहा, "और लौटते वक़्त, करीब आधे घंटे बाद, वो फिर यहीं रुकी। मोटा उतरा, एक बोतल पानी लिया और बोला — बारह बजे आ जाऊँगा, तब तक कोई नहीं होगा वहाँ।"

मैंने नैना की तरफ़ देखा। नैना ने मेरी तरफ़ देखा।

"उस वक़्त एक लड़का पीछे बैठा था?" मैंने पूछा।

"नहीं। लौटते वक़्त पीछे कोई नहीं था।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

मैंने चायवाले को पैसे दिए, चाय नहीं पी, और गाड़ी की तरफ़ भागा। जुगनू मेरे पीछे दौड़ा और उसकी एड़ी से फिर खून की एक लकीर बन गई।

"भैया, वो लौटेंगे नहीं?"

"लौटेंगे," मैंने कहा। "वो बारह बजे लौटेंगे। इसका मतलब है कि वो उसे मार नहीं रहे। वो उसे छोड़कर जा रहे हैं, और बारह बजे उसे लेने आएँगे। हमें उससे पहले पहुँचना है।"

"क्यों लेने आएँगे?"

मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। "क्योंकि टीटू के पास कुछ है। और उन्हें लगता है कि वो अभी तक उन्हें नहीं मिला।"

नैना ने गाड़ी दौड़ाई।

पुराने पुल की सड़क टूटी हुई थी। आधा किलोमीटर पहले ही डामर खत्म हो जाता है और गिट्टी शुरू हो जाती है। गाड़ी उछलने लगी। जुगनू पीछे चुप हो गया, और उसका चुप होना मुझे सबसे ज़्यादा डरा रहा था।

मैं खिड़की से बाहर देख रहा था। शाम गहरी हो रही थी। दूर सूखी नदी का पाट पड़ा था, जिसमें सिर्फ़ सफ़ेद रेत और कुछ झाड़ियाँ थीं। पुल का ढाँचा अंधेरे में किसी पुरानी हड्डी की तरह दिख रहा था।

"वहीं रोक," मैंने कहा। "पुल के नीचे नहीं जाना। ऊपर रोक।"

नैना ने गाड़ी रोकी। मैंने दरवाज़ा खोला और बाहर कदम रखा।

हवा में सूखी रेत की गंध थी और कहीं से पानी की बदबू आ रही थी, जो नदी में नहीं, नाले में थी।

मैंने एक पल आँख बंद की।

पहले मुझे सिर्फ़ हवा सुनाई दी। हवा जो पुल की टूटी रेलिंग के बीच से गुज़रकर सीटी जैसी आवाज़ कर रही थी। फिर मुझे नीचे रेत पर कुछ खिसकने की आवाज़ आई, धीमी, जैसे कोई बैठे-बैठे करवट बदल रहा हो। फिर एक साँस। छोटी, फटी हुई, रुक-रुककर आती साँस।

मैंने आँख खोली।

"नीचे कोई है," मैंने कहा।

"कैसे पता?"

"साँस रो रहा है। जो आदमी डरता है, वो साँस रोककर सुनता है कि कोई आ रहा है या नहीं।"

मैं पुल के किनारे से नीचे उतरने लगा। रेत में पाँव धँसते थे। ऊपर से नैना की टॉर्च जल उठी और एक सफ़ेद रोशनी खंभों पर फिसलने लगी।

"टीटू," मैंने आवाज़ दी। "टीटू, मैं हूँ। अर्जुन।"

कोई जवाब नहीं।

"टीटू, अगर तू सुन रहा है तो बोल। मैं अकेला हूँ। तेरे पास आ रहा हूँ।"

फिर एक आवाज़ आई, दबी हुई, जैसे गले से निकल ही नहीं रही हो।

"मत आओ।"

मैं रुका नहीं। मैं चौथे खंभे की तरफ़ बढ़ा, क्योंकि उसी खंभे के पीछे हर आदमी छिपता है, जहाँ ऊपर से नहीं दिखता और सड़क से भी नहीं दिखता।

वहाँ टीटू बैठा था।

उसके हाथ सामने जूट की रस्सी से बँधे थे। पैरों की एड़ी पर भी एक रस्सी का फंदा था। उसकी कमीज़ का एक बटन टूटा हुआ था और होंठ फटे हुए। वो बैठा रो रहा था, पर बिना आवाज़ के। वो रोना जो आदमी तब रोता है जब उसे लगता है कि अब कोई नहीं देख रहा।

मैं उसके पास घुटनों के बल बैठा।

"देख मुझे। मैं अर्जुन हूँ। कल टोल के पीछे तूने मुझे रसीद दी थी।"

उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ पहचाना। फिर उसका शरीर एक झटके में काँपा और वो मेरे कंधे पर गिर पड़ा।

"उन्होंने कहा," वो हाँफते हुए बोला, "उन्होंने कहा कि मुझे मार डालेंगे और नाले में फेंक देंगे। उन्होंने कहा कि मेरी दीदी को भी पता नहीं चलेगा। भैया, मेरी दीदी की किताबों के पैसे मैंने किसी से नहीं माँगे, मैंने नहीं माँगे—"

"रुक।" मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा। "साँस ले। धीरे।"

नैना ऊपर से उतर आई थी। उसने टॉर्च नीचे रखी और अपनी बोतल खोली। जुगनू भी आ गया था और वो टीटू के पैरों के पास बैठकर रस्सी खोलने लगा, पर उसके हाथ काँप रहे थे।

"मैं खोलता हूँ," मैंने कहा। "जुगनू, तू उसका सिर पकड़।"

मैंने औज़ार थैले से पापा का बनाया पुलर निकाला, उसकी नोक रस्सी के फंदे में डाली और एक झटके में खोल दिया। पापा कहते थे, जूट की रस्सी को कभी चाकू से मत काटो, फंदा खोलो, क्योंकि फंदा मतलब आदमी का डर, और डर खुलता है तो आदमी फिर साँस लेने लगता है।

टीटू ने लंबी साँस ली। उसने पानी पिया, और आधा पानी उसकी कमीज़ पर गिर गया।

"वो दोनों कौन थे?" मैंने पूछा।

"एक मोटा, गले में सोने की ज़ंजीर। एक पतला, चश्मे वाला, बैग लिए।" टीटू की आवाज़ फिर भर्राई। "मोटे ने मुझे तीन बार थप्पड़ मारा। उसने पूछा— काली डायरी कहाँ है।"

मेरी साँस रुक गई।

"तूने क्या कहा?"

"मैंने कहा, मुझे नहीं पता।"

"और?"

"और उसने कहा कि झूठ मत बोल, तेरे काउंटर पर महीने में एक बार वो काग़ज़ आते हैं, वो तेरे हाथ से गुज़रते हैं।" टीटू ने मेरी कमीज़ पकड़ी। "भैया, मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। मैंने डायरी का नाम नहीं लिया।"

"पर तूने मुझे बनवारी लाल का नाम लिया था," मैंने धीरे से कहा। "कल टोल के पीछे।"

टीटू ने नज़र नीचे कर ली।

"क्योंकि आप वो आदमी हो जो पूछने आया था, और वो लोग वो थे जो माँगने आए थे। पूछने वाले से डर नहीं लगता। माँगने वाले से लगता है।"

मैं कुछ देर उसे देखता रहा। ये लड़का ग्यारह साल से टोल पर हिसाब जोड़ रहा है। उसने ज़िंदगी का सबसे साफ़ जुमला बोल दिया था और उसे पता भी नहीं।

"अब सुन," मैंने कहा। "उन्होंने डायरी के बारे में पूछा। इसका मतलब उन्हें पता है कि डायरी कहाँ है।"

"नहीं," टीटू ने कहा।

"क्या मतलब नहीं?"

"मतलब, उन्हें नहीं पता था कि डायरी कहाँ है। वो मुझसे पूछ रहे थे।" टीटू ने एक पल रुककर मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो डरे हुए आदमी में कभी-कभी आ जाती है — जीतने वाली चीज़, बहुत छोटी सी। "क्योंकि असली डायरी बनवारी भैया के पास नहीं थी। वो मेरे पास थी। और मैंने उसमें से एक पन्ना फाड़ लिया था।"

मैं सीधा हो गया।

"कब?"

"दो महीने पहले। जब बनवारी भैया ने मुझे डायरी दी थी, उस रात। उन्होंने कहा था कि इसे किसी को नहीं देना, अगर मैं न रहूँ तो इसे उसी आदमी को देना जो पीले ट्रक के नीचे सुनता है।" उसने निगाह ऊपर की। "आप।"

"तूने मुझे दो महीने पहले क्यों नहीं दिया?"

"क्योंकि बनवारी भैया अभी ज़िंदा थे," टीटू ने कहा, और उसकी आवाज़ पतली हो गई। "और मुझे लगा वो लौट आएँगे।"

मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी सबसे बड़ी बात यही होती है — आदमी सच नहीं छिपाता, वो बस उम्मीद करता रह जाता है।

"पन्ना कहाँ है?"

टीटू ने अपनी कमीज़ के नीचे हाथ डाला। उसकी कमर पर एक पतला सूती धागा बँधा था, और उस धागे में एक काग़ज़ मुड़ा हुआ फँसा था, तीन तहों में। वो उसे निकालते वक़्त काँप रहा था, और काग़ज़ उसके पसीने से गीला हो गया था।

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