A Dark Secret – Chapter 108
"कितनी देर?"
"पता नहीं। मैं बच्चे को दूध पिलाने लगी और सो गई। सुबह उठी तो दरवाज़े पर नया ताला लगा था।"
"पतला आदमी जब निकला, तब उसके हाथ में बैग था?"
औरत ने सोचा।
"हाँ," उसने कहा। "बैग पहले से ज़्यादा भारी लग रहा था। वो इसे दोनों हाथों से पकड़े था। और मोटे आदमी ने उसे कहा था — जल्दी कर, सुबह तक सब ख़त्म होना चाहिए।"
मेरी साँस रुक गई।
"दीदी," मैंने कहा। "आपने उनकी आवाज़ सुनी? मोटे की आवाज़ कैसी थी?"
"भारी। जैसे कुएँ में से आती हो। और वो हँसा नहीं, बस बोला।"
"और पतले की?"
"पतली, सूखी। जैसे काग़ज़ फाड़ने की आवाज़।"
मैंने आँखें बंद कीं। मैं उस आवाज़ को अपने अंदर उतार रहा था।
"आपका नाम क्या है, दीदी?"
"मीरा।" उसने बच्चे को झुलाया। "मीरा देवी। मैं यहीं पीछे रहती हूँ।"
"मीरा दीदी, अगर कल कोई पूछे —"
"मैं कुछ नहीं बोलूँगी," उसने तुरंत कहा। "मेरे पति नहीं हैं। ये बच्चा है। मुझे कोई मुसीबत नहीं चाहिए।"
"मैं आपको मुसीबत में नहीं डालूँगा," मैंने कहा। "पर अगर आपको याद रहे, तो मुझे बताइएगा। मैं रतन सिंह चौक के पास रहता हूँ, कंधा बस्ती में।"
मीरा दीदी ने मेरी तरफ़ एक लंबी नज़र डाली। फिर वो मुड़ीं और लालटेन लेकर अपने दरवाज़े की तरफ़ चली गई। जाते-जाते रुकी।
"लड़के," उसने कहा। "जो चीज़ें जलाई जाती हैं, वो जल्दी पूरी नहीं जलतीं। कुछ कोना बच ही जाता है।"
मैं खिड़की से अंदर लौटा।
अंदर आकर मैंने एक बार फिर फ़र्श पर नज़र दौड़ाई। अब मुझे तीन अलग-अलग आवाज़ें याद थीं — मीरा दीदी की थकी आवाज़, मोटे आदमी की भारी आवाज़, और पतले की सूखी आवाज़ जो काग़ज़ फाड़ने जैसी लगती है।
THREE sounds. यही मुझे चाहिए था।
मैंने जले हुए ढेर के पास जाकर घुटने टेके। खुदाई नहीं की, पर हाथ से पन्ने उलटे। नीचे के पन्ने और भी जले थे, ऊपर के भी। पर बीच में, दो पन्नों के बीच, एक पन्ना ऐसा था जो सिर्फ़ एक किनारे से जला था।
मैंने उसे उठाया।
ऊपर पर एक तारीख़ थी — सताईस। नीचे दो लाइनें, जिनमें सिर्फ़ रकमें बची थीं — बीस हज़ार, पच्चीस हज़ार। और एक लाइन ऐसी थी जिसमें पूरा नाम जल गया था, सिर्फ़ उसका पहला अक्षर बचा था। "म"।
"अर्जुन।" नैना खिड़की से झाँक रही थी। "गाड़ी।"
मैंने सुना।
बाहर गली के मोड़ पर कोई गाड़ी रुकी थी। इंजन का धीमा, धीमा स्वर — चार सिलेंडर वाली, पुरानी। फिर दरवाज़े खुलने की आवाज़, दो दरवाज़े। फिर पैरों की आवाज़ — भारी छर्रों वाले जूते, जो सड़क पर नहीं, कंकड़ पर पड़ रहे थे।
फिर एक आवाज़ आई।
"कौन सा दरवाज़ा?"
वो आवाज़ सरकारी थी। जिस आवाज़ में हर शब्द पहले से लिखा हुआ लगता है, जैसे किसी काग़ज़ पर पढ़कर बोला जा रहा हो।
मैं एक पल में दीवार से चिपक गया। मेरी जेब में लगा काला माइक अपनी जगह पर था, पर बैटरी दो घंटे की थी और वो दो घंटे कब के ख़त्म हो चुके थे। मैंने एक बार उसे छुआ और समझ गया — बंद है।
अब सिर्फ़ मेरे कान थे।
"साहब, यही है," दूसरी आवाज़ आई। छोटी, चापलूस। "ये कोठरी है। पर ताला लगा है।"
"ताला?" वो सरकारी आवाज़ हँसी। "ताला लगा है तो खोलो। क्या पुलिस को चाबी चाहिए?"
"साहब, अंदर से बदबू आ रही है —"
"बदबू नहीं," आवाज़ ने कहा। "काग़ज़ जले हैं।"
फिर कुछ देर चुप्पी रही। मैं सुन सकता था कि वो आदमी खिड़की की तरफ़ देख रहा है। मेरी साँस रुकी हुई थी। मैं और नैना, दोनों अंदर, दीवार से चिपके, और बाहर खिड़की के काँच पर एक आदमी की परछाई गिर रही थी।
"खिड़की का शीशा नहीं है," वो आवाज़ बोली। "किसने निकाला?"
"साहब, मुझे क्या पता —"
"तुम्हें हर बात का पता होना चाहिए, हवलदार। यही तुम्हारी नौकरी है।"
फिर वो आवाज़ कुछ देर चुप रही।
"साहब?" चापलूस आवाज़ ने पूछा।
और फिर वो सरकारी आवाज़ टूटी — नहीं, टूटी नहीं, बदली। वो अब किसी काग़ज़ को पढ़ने वाले की आवाज़ नहीं थी। वो हुक्म देने वाले की आवाज़ थी। और मुझे तुरंत समझ आ गया कि ये आदमी इस कोठरी के लिए नहीं आया। ये किसी और चीज़ के लिए आया है।
"हवलदार," उसने कहा। "यहाँ बाद में आएँगे। अभी यादव मोटर गैराज पर छापा मारो।"
मैंने अपनी आँखें खोलीं।
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। अंधेरे में भी मैं उसका चेहरा देख सकता था — चश्मा नाक पर, होंठ खुले, आँखों में वो डर जो अब किसी रिपोर्टर का डर नहीं था।
मैंने अपनी कलाई की घड़ी देखी।
पाँच मिनट आगे।
और मुझे लगा कि ये पाँच मिनट अब मेरे पास नहीं हैं। अब ये किसी और के पास हैं — उस आदमी के पास, जो बाहर खड़ा है और जिसने अभी-अभी एक नाम लिया है।
यादव मोटर गैराज।
चाचा का गैराज।
॥
मैंने नैना का हाथ पकड़ा और खिड़की की तरफ़ खींचा।
"अभी। बाहर।"
"अर्जुन, गाड़ी —"
"गाड़ी भूल जा।"
उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर उसकी आँखें वही हो गईं जो पहले दिन थीं — फटा बैग, टेढ़ा चश्मा, और एक सवाल। बस सवाल नहीं था उसमें। वो मुझ पर भरोसा कर रही थी, और मुझे ये भरोसा अच्छा नहीं लग रहा था। भरोसा अच्छा तब लगता है जब आपके पास समय हो।
मेरे पास समय नहीं था।
वो टूटी सलाख मैंने पहले ही ढीली कर दी थी। नैना पहले उतरी, मैं पीछे। उसके बगैर मैं नहीं उतरना चाहता था, क्योंकि अगर कोई पीछे से आ गया तो वो पहले मुझे मिलेगा। पर वो जानती थी। उसने पीछे मुड़कर देखा भी नहीं। बस कूदी और सुनहरी गली के अंधेरे में खड़ी हो गई।
मैं भी कूदा। मेरा घुटना ज़मीन से टकराया। एक झनझनाहट बाईं कलाई तक गई — पापा की घड़ी। मैंने संभाला। घड़ी नहीं गिरी। बस पाँच मिनट आगे चलने लगी। मुझे लगा आज वो दस मिनट आगे चल रही है।
हम भागे।
कबाड़ बाज़ार रात में कुछ और हो जाता है। दिन में यहाँ लोहे का शोर होता है — कुछ बेचने वाले, कुछ खरीदने वाले, कुछ तौलने वाले। रात में यहाँ सिर्फ़ साये रहते हैं। पुराने टायरों के ढेर, टूटे पलंगों के ढाँचे, गाड़ियों के कबाड़ में से उगी घास। और हर पचास कदम पर एक कुत्ता जो हमारी तरफ़ सिर्फ़ इसलिए देखता है कि हम उसकी जगह से गुज़र रहे हैं।
नैना मेरे पीछे दौड़ रही थी। उसकी साँस भारी हो रही थी। मैंने कदम धीमे किए।
"गैराज अभी खुला है?" उसने हाँफते हुए पूछा।
"चाचा रात में गैराज नहीं सोता। वो वहीं पड़ा रहता है। पीछे एक चारपाई है।"
"तो वो वहाँ होगा?"
"नहीं। वो कहीं और होगा।"
"कहाँ?"
"पता नहीं।" मैंने एक मोड़ पार किया। "पर जब पुलिस आती है, चाचा कहीं और ही होता है। ये उसकी आदत है।"
नैना ने कुछ नहीं कहा।
गली से बाहर निकले तो सड़क दिखी। सड़क के उस पार, दो इमारतों के बीच, यादव मोटर गैराज की लोहे की चादरें चमक रही थीं। वहाँ लाइट जल रही थी। रात के तीन बजे गैराज में लाइट जलने का मतलब होता है कि कोई है।
और लाइट के नीचे, गैराज के सामने, एक पुलिस की गाड़ी खड़ी थी।
सफ़ेद रंग की, नीली पट्टी, छत पर लाल बत्ती — जो अभी जल नहीं रही थी। बत्ती न जलने का मतलब — ये छापा नहीं है। ये कोई औपचारिक मुलाक़ात है। कोई जान-पहचान वाला आया है जिसे शोर नहीं करना।
पर गैराज के अंदर शोर था।
एक आवाज़ आ रही थी — भारी, बड़ी, जैसे मोटे शरीर वाला आदमी ज़ोर से बोल रहा हो। चाचा की आवाज़।
"साहब, ये क्या बात कर रहे हो! मेरा गैराज साफ़ है। तीस साल से साफ़ है।"
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