A Dark Secret – Chapter 106
नैना ने अपने फटे बैग से एक छोटी डायरी निकाली और उसमें कुछ लिख लिया। उसकी कलम रात में भी चल रही थी।
"मैं कल सुबह आठ बजे तुम्हारे पास होऊँगी," उसने कहा। "और अर्जुन —"
"हाँ?"
"मेरी गाड़ी का एक पहिया हवा कम है। ग्यारह बजे तक नहीं डाली तो वो सड़क पर बैठ जाएगा।"
मैं हँसा। पहली बार उस रात हँसा। और मुझे लगा कि हँसी अब भी मेरे भीतर बची हुई है, कहीं कोने में, ट्रक के पीछे की तरह।
"कल सुबह तुम्हारी गाड़ी ठीक होगी," मैंने कहा। "और कल सुबह नौ बजे हम उस फाटक पर होंगे।"
मैंने कॉपी को बगल में दबाया और गोदाम की तरफ़ आख़िरी बार देखा।
पीली रोशनी अब भी जली थी। अंदर किसी की आवाज़ आ रही थी, बहुत धीमी — वही मोटी आवाज़, वही पतली आवाज़। गिनती चल रही थी।
और मुझे लगा कि उस गोदाम के अंदर, किसी रजिस्टर के किसी पन्ने पर, मेरे पापा का नाम लिखा हुआ है — और मैं अब तक उसे ढूँढ रहा था, बिना ये जाने कि मुझे क्या ढूँढना है।
मैंने अपनी कलाई की घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। मैंने उसे ठीक नहीं किया।
और फिर मैंने मुड़कर चलना शुरू किया, और मेरे कदम उस सड़क पर पड़ रहे थे जो सीधी टोल से गुज़रती थी — जहाँ से मैंने आज रात आते वक़्त भी कुछ नहीं सुना था, क्योंकि मैं उस वक़्त सिर्फ़ एक आवाज़ सुनने आया था, और अब एक नाम भी सुनकर जाना पड़ रहा था।
॥
मैं सड़क के बीच में रुक गया।
"तीन अलग साल," मैंने कहा। "हर बार सत्ताईस।"
नैना मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। उसने मेरा चेहरा देखा और कुछ नहीं पूछा। वो औरतें नहीं होतीं जो हर सन्नाटे को सवाल से भर दें। वो जानती थी कि अभी मेरे अंदर कुछ टूटा है और उसे जुड़ने में वक़्त लगेगा।
मैंने गोदाम की तरफ़ देखा। पीली रोशनी अब भी जल रही थी। अंदर कोई गिन रहा था — धीमी आवाज़, फिर पतली आवाज़, फिर धीमी। जैसे कोई मुन्शी रात भर हिसाब जोड़े और हिसाब कभी पूरा न हो।
"अर्जुन।"
"मुझे वो काली डायरी चाहिए," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ बहुत धीमी निकली। जब मुझे गुस्सा आता है तो ऐसा ही होता है। पहले आवाज़ नीचे जाती है, फिर बाकी सब।
"मुझे वो डायरी हर हाल में चाहिए, नैना। जिसमें मेरे पापा का नाम तीन बार लिखा है। हर बार सत्ताईस तारीख़। रकम के साथ। और आगे कोई नाम मिटाया हुआ।"
"कबीर ने कहा, वो काग़ज़ बनवारी लाल के पास है।"
"और बनवारी लाल डेढ़ दिन से गायब है।" मैंने कॉपी बगल में दबाई। "डेढ़ दिन से गायब आदमी का कमरा भी अब खाली नहीं रहेगा, नैना। कोई न कोई वहाँ पहुँच चुका होगा। जिसे जो चीज़ चाहिए थी, वो उठाकर ले गया होगा।"
नैना ने अपना चश्मा ऊपर धकेला। उसकी उँगली काँप रही थी, पर आवाज़ नहीं।
"तो हम अभी चलते हैं," उसने कहा। "अभी, इसी रात। सुबह तक जो बचा है, वो भी नहीं बचेगा।"
"बनवारी लाल का कमरा कहाँ है?"
"कबाड़ बाज़ार के पीछे। पीतल वालों की गली छोड़कर, आख़िरी मोड़ पर। मुझे पता है। मैं वहाँ एक बार गई थी, तीन महीने पहले, जब मैं उसकी घड़ी का पट्टा देखने आई थी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "वो आदमी अपनी घड़ी के पट्टे पर दो जगह से सिलाई करवाता है, अर्जुन। ग्यारह साल से एक ही घड़ी। ऐसा आदमी गायब नहीं होता।"
"गायब नहीं हुआ," मैंने कहा। "गायब किया गया है।"
हम नैना की गाड़ी की तरफ़ चले।
गाड़ी वहीं खड़ी थी, धूल में, एक पहिया थोड़ा बैठा हुआ। जब उसने इंजन चालू किया तो गाड़ी ने वैसा ही किया जैसा ऐसी गाड़ियाँ करती हैं — पहले एक बार झिझकी, फिर एक लंबी खाँसी, फिर चल पड़ी।
"इसका पहिया?" मैंने पूछा।
"ग्यारह बजे तक नहीं डाली हवा तो सड़क पर बैठ जाएगी। अभी भी आधी रात है, किसी पंप पर जा भी नहीं सकते।"
"रात भर चलेगी?"
"तेज़ नहीं चलाऊँगी।"
"तो ठीक है।" मैंने शीशा थोड़ा नीचे किया। "कम से कम गाड़ी मेरी कॉपी जितनी बुरी हालत में नहीं है।"
नैना हँसी। छोटी हँसी, जो रात में बहुत ज़ोर से सुनाई देती है। फिर वो चुप हो गई और गाड़ी को सड़क पर ले आई।
रास्ते में शहर बदलता गया।
पहले टोल की रोशनी, फिर खुली सड़क, फिर ढाबों की पीली बत्तियाँ, जिनके नीचे कोई नहीं बैठा था। फिर कबाड़ बाज़ार की गली। यहाँ रात और भी अंधेरी है, क्योंकि यहाँ दिन में भी लोहे की गंध और रात में सिर्फ़ लोहे की गंध रहती है। सड़क के दोनों तरफ़ टूटे पुर्ज़ों के ढेर, जंग लगे पहिये, पुराने ड्रम, बंद दुकानों के शटर जिन पर बारिश ने लकीरें खींच दी थीं।
गाड़ी की आवाज़ यहाँ बदल गई। टीन की छतों से टकराकर लौटती थी। मुझे लगा जैसे गली खुद बोल रही हो — ऐसे बोल रही हो जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में कुछ बड़बड़ा रहा हो।
"यहीं रुको," नैना ने कहा। "आगे गली पतली है।"
हमने गाड़ी एक बंद दुकान के सामने खड़ी की। उतरकर मैंने कान खड़े किए।
यहाँ चार आवाज़ें थीं। दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा था, बिना ज़ोर के, जैसे आदत से। एक नल टपक रहा था। किसी टिन की छत हवा में हिल रही थी। और चौथी आवाज़ — एक पतली सी सरसराहट, जो किसी जले हुए काग़ज़ की होती है जब हवा उसमें फँस जाए।
मैंने नैना की तरफ़ देखा। उसने भी सुना था।
"आगे," मैंने कहा।
गली के आख़िरी मोड़ पर एक कोठरी थी। पक्की, पुरानी, टीन की छत, दरवाज़ा लकड़ी का और उस पर एक बड़ा ताला। ताले पर ज़ंग नहीं थी। ताला नया था। चमकीला।
दरवाज़े के नीचे की दरार से धुआँ नहीं आ रहा था, पर बदबू आ रही थी। जले काग़ज़ की वो अलग बदबू, जो किसी और चीज़ से नहीं मिलती। जले काग़ज़, जला लकड़ी का फ़र्श, और उसमें मिली थोड़ी सी स्याही की गंध।
मैंने दरवाज़े को हल्का धक्का दिया। बंद।
"ताला लगा है," नैना ने धीरे से कहा।
"लगा है।"
"अर्जुन, इसका मतलब —"
"मतलब ये है कि जिसे यहाँ से कुछ चाहिए था, उसने बाहर से ताला भी लगा दिया।" मैंने कोठरी की दीवार पर हाथ फेरा। "ताकि अंदर की बदबू बाहर वालों को ज़्यादा न दिखे।"
मैं खिड़की की तरफ़ गया। छोटी खिड़की थी, लोहे की दो सलाखें, और बीच का शीशा एक कोने से चटका हुआ। शीशे पर धूल की परत थी, पर एक जगह पर धूल हटी हुई थी — जैसे किसी ने कुछ देर पहले अंदर झाँका हो और अपनी हथेली से साफ़ करके देखा हो।
मैंने उसी जगह से अंदर देखा।
फ़र्श पर काग़ज़ बिखरे थे। सैकड़ों नहीं, पर इतने कि लगे कोई किसी की जल्दी में उठाया हुआ ढेर गिरा गया हो। कुछ पन्ने स्याह थे, कुछ आधे जले, कुछ पर पैर का निशान। कोने में एक चूल्हा था, जिसमें राख थी — अब ठंडी। और उसी कोने में काग़ज़ का एक हिस्सा जला हुआ था, फ़र्श तक जला हुआ, जैसे वहाँ कोई काग़ज़ों का ढेर सुलगाया गया हो और बीच में छोड़ दिया गया हो।
अंदर फ़र्श पर, बिखरे काग़ज़ों के बीच, एक पुरानी चारपाई थी, जिसकी रस्सियाँ ढीली थीं। और चारपाई के पास एक छोटी मेज़। मेज़ पर एक उल्टा गिलास और एक अलमारी जैसी टिन की पेटी, जिसका ढक्कन खुला था।
"नैना," मैंने कहा। "खिड़की का काँच चटका है। बीच की सलाख ऊपर से ढीली है।"
"मत करो।"
"मैं कुछ नहीं लूँगा।"
"अर्जुन —"
"मैं सिर्फ़ एक काग़ज़ उठाऊँगा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "जिस पर मेरे पापा का नाम है। वो काग़ज़ मेरा है, नैना। किसी ने उसे मेरे पापा से छीना है, बेचा है, मिटाया है और अब जला रहा है। मैं उसे चुरा नहीं रहा। मैं उसे वापस उठा रहा हूँ।"
नैना ने एक गहरी साँस ली, फिर अपना बैग कंधे से उतारा और उसमें से एक पतली लोहे की छड़ निकाली। कैमरे का पुराना स्टैंड था, जिसका सिरा उसने पहले ही तोड़ रखा था।
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