The Token System – Chapter 95
"तो कर।" उसने अपनी शर्ट ठीक की। "तेरे पास दो दिन हैं। परसों तेरे घर लड़के वाले आएँगे। उसके बाद शादी। उसके बाद…" उसने हाथ जेब में डाला, "फिर इस काग़ज़ का क्या होगा, वो तेरे पास ही रहेगा।"
वो मुड़ा और चला गया। चौड़ा, भारी, ज़मीन पर पैर पटकता हुआ। बंसी ने लंबी साँस छोड़ी।
"तूने ठीक किया," बंसी ने कहा।
"क्या ठीक किया? उसने तो सब साफ़ बता दिया। काग़ज़ भवानी के नाम पर है।"
"हाँ।" बंसी ने प्याली उठाई। "और यही बात उसे भी खटक रही है। जो आदमी अपनी जीत का सबूत अपने हाथ में रखे, वो बताने नहीं आता कि कमज़ोरी क्या है।"
मैंने टोकन उठाया। पोटली में लपेट दिया।
"तू एक काम बता," बंसी ने कहा। "तहसील में रामदीन ने कुछ और बताया था? पैसा चार जगह बँटता है — ये तो तूने कहा। चौथी जगह कौन?"
"अभी नहीं पता।"
"तो चल। वहीं चलते हैं।"
तहसील दफ़्तार सुबह दस बजे ही भर जाता है। हम पहुँचे तो दरवाज़े पर ही धक्का-मुक्की चल रही थी। अंदर काउंटरों पर फ़ाइलों के ढेर पड़े थे, ऊँचे, टेढ़े। तीन खिड़कियों के आगे दो लाइनें लगी थीं और एक बंद। पंखे छत पर घूम रहे थे, पर हवा काग़ज़ों की थी, बस काग़ज़ों की।
बंसी दरवाज़े के पास खड़ा रहा। "मैं बाहर रहता हूँ। इनका क्लर्क मुझे देखकर बहाने बनाता है।"
"ठीक है।"
मैं अंदर गया। पीली फ़ाइलों का ढेर एक काउंटर पर इतना ऊँचा था कि पीछे बैठा आदमी दिखता ही नहीं था। मैंने एक कोने में बूढ़े आदमी को देखा — फटी धोती, कुर्ता बिना बटन का, हाथ में एक पुरानी फ़ाइल जिसके किनारे चिपक गए थे। वो एक खिड़की पर जाता, कुछ कहता, फिर दूसरी पर, फिर तीसरी पर। तीनों जगह से उसे वही जवाब मिलता — "वहाँ जाओ", "ये खिड़की नहीं", "काग़ज़ अधूरा है।"
वो चौथी बार लौटा तो उसकी आँखें लाल थीं। मैंने उसे रोका।
"क्या चाहिए?"
"बेटा, मेरी पेंशन रुक गई है। तीन महीने से। बोलते हैं नाम की स्पेलिंग ग़लत है।" उसने फ़ाइल खोली। उँगली से एक जगह दबाई। "ये देख — यहाँ लिखा है रामकिशन। और काग़ज़ में राम किशन, दो शब्द। इतनी सी बात। तीन महीने से मैं इनके पीछे पड़ा हूँ।"
"कौन सी खिड़की पर गए थे?"
"तीसरी। वो चश्मे वाला बैठा है।"
मैंने तीसरी खिड़की की तरफ़ देखा। भीड़ के पीछे एक आदमी बैठा था — पतला, चालीस के ऊपर, आधा चश्मा माथे पर चढ़ा हुआ। वो सामने वाले की फ़ाइल उठाता, उसमें कुछ लिखता, और फिर उसे बगल की तरफ़ सरका देता — जहाँ काग़ज़ों का दूसरा ढेर था।
बंसी दरवाज़े से अंदर झाँका। मैंने उसे इशारा किया। वो आया।
"देख रहा है?" मैंने फुसफुसाकर कहा।
बंसी ने ध्यान से देखा। फिर उसका चेहरा थोड़ा सिकुड़ा।
"ये वही है," बंसी ने कहा। "ये क्लर्क भवानी के यहाँ भी आता है। महीने में दो बार। शाम को, पिछले दरवाज़े से।"
मैंने बूढ़े का हाथ पकड़ा। "चलो। तीसरी खिड़की पर चलते हैं।"
"बेटा, मैं तीन बार जा चुका हूँ—"
"चौथी बार मैं चलूँगा।"
हम खिड़की पर पहुँचे। क्लर्क ने सामने वाले का काम निपटाया, फिर सिर उठाया। मुझे देखा, फिर बूढ़े को देखा, और उसका माथा सिकोड़ा।
"अरे, तुम अभी आए थे।"
"ये मेरे साथ है," मैंने कहा। "इसकी पेंशन की फ़ाइल चाहिए। रामकिशन।"
क्लर्क ने अपना चश्मा आँखों पर उतारा। फिर ढेर में उँगली चलाई। "ये तो… नहीं है। ये फ़ाइल तो यहाँ नहीं है। कहीं और गई है।"
"कहाँ गई?"
"पता नहीं। किसी दूसरे काउंटर पर होगी। दोबारा आना।"
"तीसरी बार आए हैं ये।"
"तो चौथी बार आ जाएँ।"
मैंने उसकी मेज़ पर हाथ रख दिया। मेज़ के नीचे, दाईं तरफ़, एक दराज़ थी। आधी खुली। उसमें काग़ज़ों की गड्डी थी। मैं झुका, और उस आदमी के हाथ से पहले मैंने दराज़ खींच ली।
"अरे—"
अंदर एक फ़ाइल थी। पुरानी, किनारे से टेप लगी। ऊपर लिखा था — रामकिशन। मैंने खोली। पहले पन्ने पर नाम साफ़ लिखा था — रामकिशन, पूरा। कोई स्पेलिंग नहीं बदली थी। पेंशन की रसीदें नीचे लगी थीं, तीन महीने की, हस्ताक्षर बाकी।
मैंने फ़ाइल बूढ़े की तरफ़ बढ़ाई। "ये रही।"
बूढ़ा फ़ाइल पकड़कर वहीं खड़ा रह गया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। "ये… ये तो यहीं थी।"
"हाँ," मैंने कहा। "यहीं थी।" और मैंने क्लर्क की तरफ़ देखा।
क्लर्क का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसने आस-पास देखा, फिर धीरे से बोला, "तू कौन है? तुझे नहीं पता तू कहाँ आ गया है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "मैं तुझे भी पता हूँ। तू भवानी के यहाँ जाता है, महीने में दो बार, पिछले दरवाज़े से।"
वो खड़ा हो गया। "तू बाहर चल। अभी। वरना मैं सिक्योरिटी बुलाता हूँ।"
मैंने बूढ़े का हाथ पकड़ा। "चलिए, बाहर। काग़ज़ आपके हाथ में है। अब ये इसे वापस नहीं ले सकता।"
बूढ़ा चल पड़ा, पर दो कदम चलकर रुका। फ़ाइल को सीने से लगाया। फिर वो फूट-फूटकर रोने लगा। भीड़ में कुछ लोग रुके। कोई आगे आया, कोई पीछे हटा। बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ा और फ़ाइल बूढ़ी उँगलियों से दबाकर बोला, "बेटा, मेरी ज़मीन के काग़ज़ भी किसी ने बदल दिए थे। दो साल से केस चल रहा है। मेरे बाप की ज़मीन थी, बेचने के लिए नहीं, अपनी खेती के लिए। वो ज़मीन अब किसी और के नाम पर है। और सुन — जब मैं वकील के पास गया, तो उसने कहा कि काग़ज़ पर जो आदमी का नाम है, उससे बात कर।"
"किसका नाम?"
"ठाकुर भवानी सिंह।"
मैं रुक गया। "भवानी?"
"हाँ। पर बात ये है —" बूढ़े ने अपनी फ़ाइल के पन्ने पलटे, "— जो मेरी ज़मीन का काग़ज़ है, वो अभी मेरे वकील के पास है। मैं तुझे दिखा नहीं पाया। पर उसमें एक बात थी जो मुझे आज तक समझ नहीं आई। काग़ज़ के किनारे पर, हाशिये में, कुछ लिखा है। मैं पढ़ नहीं पाया। तेरे काम का हो तो चल, दिखा दूँ।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने हामी में सिर हिलाया।
पुराने बाज़ार के कोने पर छोटा सा वकील का दफ़्तर था — एक कमरा, दो कुर्सियाँ, दीवार पर हल्का रोशनदान। बूढ़े ने अपना नाम बताया और वकील ने बिना ज़्यादा पूछे फ़ाइल निकाल दी। शायद बूढ़ा यहाँ का पुराना आदमी था, या वकील को भी पता था कि यह केस आगे नहीं बढ़ेगा।
फ़ाइल खुली। बूढ़े ने पन्ना पलटा। काग़ज़ पीला, मोटा, तहसील की मुहर लगी हुई। नीचे हाशिये में स्याही से कुछ लिखा था — छोटा, तिरछा, जल्दी में लिखा हुआ।
मैंने फ़ाइल को रोशनदान के नीचे लाया। अक्षर धुँधले थे, पर पढ़े जा सकते थे। ऊपर भवानी सिंह का नाम था, और उसके नीचे—
"ये क्या है?" बंसी ने पीछे से झाँका।
वो एक कोना था। छोटा सा, काग़ज़ के कोने पर बना हुआ — दो आड़ी-खड़ी लकीरों का निशान, जैसे किसी मुहर का आधा हिस्सा। दो रेखाएँ एक-दूसरे को काटती हुईं, और उनके बीच एक छोटा बिंदु।
मैंने अपनी जेब से पोटली निकाली। टोकन खोला। उसका कोना — ठीक वैसा ही निशान। बिल्कुल वैसा ही।
"बंसी," मैंने धीरे से कहा। "ये निशान मेरे टोकन के कोने पर भी है।"
बंसी ने टोकन हाथ में लिया। पलटा। बूढ़े के काग़ज़ पर रखा। दोनों निशान एक से थे।
"यानी," बंसी ने धीरे से कहा, "इस काग़ज़ पर टोकन की मुहर है।"
"और भवानी का नाम भी।"
वकील कुर्सी पर बैठा हमें देख रहा था। उसने कुछ कहना चाहा, पर बूढ़े ने उसे रोक दिया। "बेटा, ये काग़ज़ तू ले जा। मेरे किसी काम का नहीं। दो साल से इसे देख रहा हूँ। आज पहली बार समझ आया कि इसमें कुछ और भी है।"
"आप इसे मुझे नहीं दे सकते," मैंने कहा।
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