The Token System – Chapter 916
तभी पीछे से आवाज़ आई — "रुको।"
हम सब पलटे। मशाल की रोशनी में जगन्नाथ चाचा खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, और पीछे दो आदमी। उनकी आँखें सीधे पापा पर थीं।
"तू आ गया," जगन्नाथ ने कहा। "बीस साल बाद भी तू वही बेवकूफ़ है, सुखदेव। ये कुआँ तेरा नहीं है।"
"ये कुआँ हमारे आँगन में है," पापा ने कहा। "हमारे आँगन में जो है, वो हमारा है।"
"तो अंदर जो पड़ा है, वो भी तेरा है?" जगन्नाथ हँसे। "जो हड्डियाँ तू आज निकालने आया है, वो हड्डियाँ तेरे नहीं हैं।"
कम्मो बुआ आगे बढ़ीं। जगन्नाथ उन्हें देखकर एक कदम पीछे हटे, जैसे किसी ने उनके सामने से पर्दा खींच दिया हो।
"कम्मो…" उनकी आवाज़ भारी हो गई।
"तूने मुझे पहचाना, जगन्नाथ भाई?" बुआ ने कहा। "बीस साल पहले जब तेरा भाई मेरे भाई को कुएँ में धकेल रहा था, तू उस वक़्त कहाँ था? ऊपर बैठकर हिसाब लिख रहा था? कितना हिस्सा मिला तुझे ख़ून का?"
जगन्नाथ के चेहरे का रंग उतर गया। उनके पीछे खड़े आदमियों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
"बहुत हुआ," जगन्नाथ ने कहा। "कल अदालत में जो होगा, होगा। पर आज रात ये कुआँ जैसा है, वैसा ही रहेगा।" और उन्होंने अपने आदमियों को इशारा किया।
बंसी ने कुदाल उठा ली। "एक कदम बढ़ाया, तो सिर फूटेगा।"
दोनों आदमी रुक गए। पीछे से कम्मो बुआ ने कहा, "जगन्नाथ, तू जानता है मैंने बीस साल क्यों चुप रही? क्योंकि मेरे भाई ने मरने से पहले मुझसे कहा था — 'बहन, जिस दिन मेरा नाम किसी काग़ज़ पर पूरा लिखा जाएगा, उस दिन तू आ जाना।' आज वो नाम पूरा हुआ है।" उन्होंने टोकन की तरफ़ इशारा किया जो मेरी जेब में था। "और अब मैं यहाँ से हड्डियाँ लेकर जाऊँगी।"
जगन्नाथ ने कुछ कहना चाहा, पर पापा ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और ऐसी आवाज़ निकाली जो बीस साल की चुप्पी से आई थी — "जगन्नाथ, अदालत कल तेरा नाम तलब करेगी। आज रात में आग लगाने की कोशिश मत करना, क्योंकि मैंने इस कुएँ की तस्वीरें सुबह ही किसी और को दे दी हैं।"
जगन्नाथ कुछ देर खड़े रहे। फिर बिना बोले मुड़े और चले गए। उनके आदमी भी पीछे हट गए।
बंसी ने कुदाल फेंकी और हम दोनों ने चूने की बची परत तोड़नी शुरू की। आधे घंटे बाद रस्सी ने कुछ पकड़ा — भारी था। हम तीन बार में उसे ऊपर खींच पाए। एक ज़ंग लगा लोहे का बक्सा था, छोटा, ताले से बंद।
पापा ने ताला देखा। "ये मेरे पिता का है। ये ताला मैंने बनवाया था।"
कम्मो बुआ ने बक्सा खोला। अंदर कुछ कपड़े थे, एक मोटी डायरी और एक छोटी सी मूर्ति — भवानी की। मूर्ति के पीछे खून के छींटे थे, जो अब सूखकर कालिख जैसे हो गए थे।
मैंने डायरी उठाई। पहले पन्ने पर लिखा था — "अगर ये डायरी किसी ने पढ़ी है, तो मैं मर चुका हूँ। कन्हैया को मारने वाला मेरा ही बड़ा भाई है — भवानी। और उसका साथी जगन्नाथ।"
कम्मो बुआ ने कपड़े उठाए। एक छोटी सी कुर्ती थी। उन्होंने उसे सीने से लगा लिया।
"ये मेरे भाई की है," उन्होंने कहा। "मैंने इस पर कढ़ाई की थी।"
तभी पीछे से पैरों की आहट आई। माँ दौड़ती हुई आईं, साँस फूल रही थी।
"सुमन…" पापा ने कहा।
"अमर की आँखें खुल गईं," माँ ने कहा। "वो पानी माँग रहा है। और — और वो कुछ कह रहा है। बार-बार। कह रहा है — 'कुआँ। डायरी। कुआँ।'"
हम सब एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे।
बक्सा अभी खुला था, डायरी मेरे हाथ में थी, और माँ ये कह रही थी कि अमर जिस हाल में था, उसमें कुएँ का नाम ले रहा है।
पापा ने कम्मो बुआ की तरफ़ देखा।
"अमर," पापा ने कहा, "वो लड़का नहीं है जो हमें लगता है। वो उसी रात की गवाही लेकर आया है, जिस रात का गवाह मैं था — पर उसका होश बीस साल बाद आया है।"
कम्मो बुआ ने डायरी मेरे हाथ से ली और अपने सीने से लगाई।
"कल अदालत में," उन्होंने कहा, "ये डायरी पढ़ी जाएगी। और अमर जब पूरी बात बताएगा, तब जगन्नाथ को कोई नहीं बचा पाएगा।"
हम लौटने लगे। बंसी बक्सा उठाकर पीछे चल रहा था। मैं सबसे आख़िर में था, टॉर्च हाथ में। हवेली का दरवाज़ा पार करके मैंने पीछे मुड़कर एक बार देखा — कुआँ वहीं था, खुला, अंधेरे में मुँह बाए खड़ा, जैसे अभी-अभी कुछ और उगलने की तैयारी में हो।
घर के बाहर पहुँचकर सब अंदर चले गए। मैं कुछ देर दरवाज़े पर खड़ा रहा। उसी वक़्त सामने के पीपल के पेड़ के नीचे से एक काली छाया हिली।
पहले मुझे लगा बंसी का कोई आदमी है। फिर वो छाया चलकर रोशनी में आई — औरत थी, सिर पर सफ़ेद ओढ़नी, आँखें सीधी मुझ पर।
वही औरत। वही काली छाया जो तीन दिन से घर के बाहर खड़ी दिखती थी।
वह मेरे सामने आकर रुकी। नमस्ते नहीं की, आँखें नहीं झुकाईं।
"तू मन्नू है ना?" उसने कहा। "सुखदेव का पोता?"
"कौन हो तुम?" मैंने पूछा।
"मेरा नाम सीधा मत पूछ," उसने कहा। "मैं कन्हैया की बहन हूँ। मैंने अपना नाम बीस साल पहले छोड़ दिया था, तब जब मेरे भाई को भवानी के आदमियों ने उठाया था। आज मैं नाम वापस लेने आई हूँ। और तुझे बताने आई हूँ कि वो हड्डियाँ जो तुम कुएँ से निकाल रहे हो, वो कन्हैया की नहीं हैं।"
मेरे हाथ से टॉर्च फिसल गई।
"क्या?"
"कन्हैया की हड्डियाँ आज भी हवेली के कुएँ में हैं," उसने कहा। "वो बक्सा जो तुमने निकाला है, वो जगन्नाथ ने खुद रखवाया था — किसी और की हड्डियों के साथ, ताकि कल अदालत में सब उलझ जाए। और तेरा अमर जो चार दिन से बेहोश था — उसे डर से नहीं, उस बक्से को देखने से होश आया है। क्योंकि उसने उसी बक्से को सात साल पहले कुएँ में जाते देखा था। तेरे दादा के हाथ से।"
॥
मेरे हाथ से टॉर्च गिरी, और उसके काँच की आवाज़ रात में इतनी तेज़ हुई कि माँ दरवाज़े पर आ खड़ी हुईं।
“क्या हुआ?” माँ ने पूछा।
सफ़ेद ओढ़नी वाली औरत माँ की तरफ़ मुड़ी। दोनों एक-दूसरे को देखकर रह गए।
“तू?” माँ की आवाज़ फट गई। “तू ज़िंदा है?”
“कौशल्या।” औरत ने मेरी माँ का नाम लिया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। “तेरे बाल सफ़ेद हो गए, पर आँखें वही हैं।”
मैं बीच में खड़ा था, और मुझे कुछ समझ नहीं रहा था। “माँ, ये कौन है?”
माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू मुँह पर रख लिया। “ये शांति है। कन्हैया की बहन। चालीस साल पहले गाँव छोड़कर गई थी। हम सब समझते रहे कि मर गई।”
शांति ने अंदर कदम रखा, जैसे ये घर उसका हो। “मरने से बुरा कुछ होता है,” उसने कहा। “डर के मारे ज़िंदा रहना। मैं चालीस साल उसी डर में ज़िंदा रही।”
बंसी ने बक्सा ज़मीन पर रख दिया और पीछे हट गया। पापा चारपाई पर बैठे थे, उन्होंने लाठी की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
“बैठ,” पापा ने कहा। “जो बताना है, बैठकर बता।”
शांति चारपाई के किनारे बैठी। उसने ओढ़नी सिर से हटाई। सफ़ेद बाल, पतला चेहरा, और आँखों के नीचे वो ज़ख़्म जो वक़्त से नहीं, किसी इंसान से मिला था।
“मैं सोलह की थी,” उसने कहा, “जब मेरे भाई कन्हैया को भवानी के आदमी उठाकर ले गए थे। मैंने श्यामलाल को देखा था — कुएँ के पास, लालटेन लिए। उसने मेरे भाई की गर्दन पकड़ी थी। मैं चीखी, पर उस वक़्त हवेली दूर थी, कोई सुनने वाला नहीं था।”
“तूने पुलिस को क्यों नहीं बताया?” मैंने पूछा।
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