The Token System – Chapter 910
"जो आप जज साहब को दिखाने जा रहे थे।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया — जैसे कह रहा हो, अभी नहीं।
पर तभी सुमन बाहर आई। सफ़ेद कोट, हाथ में क्लिप बोर्ड, चेहरे पर सुबह की थकान — और आवाज़ में वो ठंडक जो ड्यूटी में पड़ जाती है।
"अच्छा हुआ तुम आ गए।" उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा, फिर सीधे शेखर बाबू की तरफ़। "शेखर बाबू, सुनिए। अमर की जान बच गई। पर अगले चौबीस घंटे नाज़ुक हैं। उसके जिस्म में जो ज़हर छह महीने से चल रहा था, वो अभी पूरा बाहर नहीं हुआ। मैं रात भर जागी हूँ। और अगर आपने वो काग़ज़ भवानी को दिया, तो मैं साफ़ कह रही हूँ — आपका अपराध भी उसी काग़ज़ के साथ चला जाएगा, और अमर के इलाज के काग़ज़ भी ग़ायब हो जाएंगे। मेरे पास और कुछ नहीं है।"
शेखर बाबू का हाथ काँपा। लिफ़ाफ़ा उनकी उँगलियों से फिसलने लगा।
पर वो उन्होंने गिरने नहीं दिया। सीने से और चिपका लिया।
"मैडम," उन्होंने कहा, आवाज़ अटकी हुई, "मुझे नहीं पता कौन सा काग़ज़ सही है और कौन सा ग़लत। मेरे हाथ में जो है, वो असली है। मैंने ही तो बनाया था।"
"असली हो तो बाद में बात करें।" सुमन ने कहा। "पहले ये कहिए, इसे किसे देने जा रहे थे?"
"एक आदमी बाहर खड़ा है। कहता है भवानी का आदमी है। कहता है अगर आज दोपहर तक काग़ज़ नहीं दिया, तो मेरी बेटी की शादी —"
सुमन ने बीच में कहा, "तो शादी टूट जाएगी और आप बाप बच जाएंगे। या शादी बच जाएगी और आप क़ैद में होंगे और वो शादी करेगी किसी और के साथ। ये हिसाब बड़ा नहीं है, शेखर बाबू।"
शेखर बाबू ने मुझे देखा। मैंने उनके सामने वो लिफ़ाफ़ा रखा।
"शेखर बाबू, आपकी बेटी की शादी का ख़र्च भवानी उठा रहा है। ये बात मुझे पता है।"
वो चौंके। "तू क्या जाने —"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर एक बात कहूँ?"
"कह।"
"आपकी बेटी का ससुराल भवानी के मोहताज है, ये भी मुझे पता है।"
शेखर बाबू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। बंसी ने चाय का गिलास नीचे रख दिया। सुमन ने भी एक पल के लिए मेरी तरफ़ देखा।
"तो फिर तू सब जानता है," शेखर बाबू ने धीरे से कहा। "तो फिर ये बातें क्यों? मैं मजबूर हूँ।"
मैंने जेब में हाथ डाला और मुट्ठी भर नोट निकाल दिए। टोकन से मिला पैसा — जो अब तक बंसी के पास पड़ा था, जिसे मैंने सुबह ही उठाया था। नोट पुराने थे, कुछ मुड़े हुए, पर गिनती में।
"मैं उठाऊँगा।"
शेखर बाबू ने नोटों की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर सुमन की तरफ़। एक लंबा सन्नाटा। पर मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू क्यों?" उनकी आवाज़ फटी। "तेरे पास टोकन है, ये सब जानते हैं। पर तू क्यों? तेरा क्या लगता है?"
"मेरा कुछ नहीं लगता।" मैंने कहा। "बस आपका हाथ काँप रहा है। और मुझे काँपते हाथ पसंद नहीं।"
शेखर बाबू ने नोटों की तरफ़ एक पल और देखा। फिर एक लंबी साँस ली — वो साँस जो पुराने आदमी बहुत रोके रखने के बाद छोड़ते हैं। और उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले। पर एक बात याद रख — मैंने इसे अदालत के लिए नहीं दिया था। मैंने इसे इसलिए लिया था कि मुझे लगा ये किसी अच्छे काम आएगा। अब तेरे हाथ में है, तो अच्छे काम में आ जाए।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर तीन काग़ज़ थे, जीर्ण-शीर्ण, कुछ जगह से फटे। पहला पीला, तहसील की मुहर वाला — हवेली के बँटवारे की पुरानी रसीद। दूसरा कोरा — जिस पर सिर्फ़ एक अंगूठे का निशान था। और तीसरा — सबसे छोटा, सबसे ज़्यादा जर्जर — जिस पर मोटे अक्षरों में चार लाइनें लिखी थीं।
मैंने पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा। फिर बंसी की तरफ़ बढ़ाया।
"पढ़।"
बंसी ने पढ़ा। उसका चेहरा बदला। फिर उसने सुमन को दिया। सुमन ने पढ़ा।
तीसरे काग़ज़ पर लिखा था:
"हवेली का असली मालिक जमुना देवी के ससुर थे। उनके बाद हवेली का आधा हिस्सा सुखदेव माली के नाम बक़ायदा हस्तांतरित हुआ, तहसील के रजिस्टर में दर्ज। सुखदेव माली मालिक थे। चोर नहीं।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "ये क्या है?"
"ये तुम्हारे दादा का नाम साफ़ करने वाला काग़ज़ है," सुमन ने कहा। "और ये सबसे ज़रूरी है। क्योंकि जो काग़ज़ भवानी के पास है, उसमें दादा को चोर लिखा है। अगर ये अदालत तक पहुँच गया, तो वो काग़ज़ बेकार हो जाएगा।"
मैंने काग़ज़ सीने से लगाया। एक पल के लिए भी नहीं सोचा। पर पल बहुत छोटा था — क्योंकि तभी रिकॉर्ड कमरे की बत्ती बुझ गई।
पूरा बरामदा अंधेरे में डूब गया। सुमन ने कुछ कहा पर मैंने नहीं सुना। मैंने काग़ज़ सीने से लगाया और पीछे वाली सीढ़ियों की तरफ़ भागा। अंधेरे में कोई मेरी तरफ़ बढ़ रहा था — बूट की आवाज़ नहीं थी, चप्पल की गरारी थी। दो आदमी। मैंने दीवार पकड़ी और सीढ़ियों पर कूदा।
सीढ़ियों पर भवानी के दो आदमी खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में छड़ी — एक ने कहा, "मन्नू जी, काग़ज़ दे दो। साहब नाराज़ ना हों।"
मैंने पीछे कदम बढ़ाया। सीने से काग़ज़ चिपका था, पर वो पसीने से भीग रहा था — मेरे पसीने से। अंधेरा गाढ़ा था। मैंने कोई एक सेकंड सोचा — और फिर जो किया, वो शायद मूर्खता थी। मैं दीवार से चिपका और उनके बीच से भागा, पर पहले वाले ने मेरा हाथ पकड़ा। मैंने झटका दिया। काग़ज़ का कोना उसकी उँगली में फँसा और फटा — एक छोटा सा टुकड़ा उसके हाथ में रह गया।
पर असली काग़ज़ मेरे सीने पर था।
मैं सीढ़ियों के बगल से निकला — उस रास्ते से जो सुमन ने कभी मुझे दिखाया था, रसोई के पिछले दरवाज़े की तरफ़। मेरे पीछे पैरों की आवाज़ थी। पर मैं नहीं रुका।
पीछे के आँगन में बंसी खड़ा था, हाथ में ईंट लिए।
"इधर!" उसने कहा।
मैं उसकी तरफ़ दौड़ा। उसने वो ईंट एक कदम आगे पटक दी और आवाज़ गई — किसी ने पीछे से धक्का खाकर पैर पीछे किया। हम दोनों आहाते की पिछली दीवार कूद गए। बाहर गली में बंसी की साइकिल खड़ी थी।
"बैठ!"
मैं पीछे बैठा। बंसी ने पैडल मारा। गली के मोड़ पर तीन और आदमी आते दिखे, पर हम निकल गए।
काफ़ी दूर जाकर हम रुके — रामगंज की चाय की दुकान पर। बंसी ने साइकिल खड़ी की और मेरी तरफ़ देखा।
"काग़ज़?"
मैंने सीने से निकाला। फटा था — एक कोना, जहाँ "जमुना देवी के ससुर" लिखा था, गायब था। बाक़ी साबुत था।
बंसी ने उसे लिया और हौले से हौले सम्मान से मोड़कर जेब में रखा।
"मन्नू," उसने कहा, "मैंने ज़िंदगी में एक बात सीखी है — जिस काग़ज़ को भवानी चाहता है, वो काग़ज़ हमारा सबसे बड़ा हथियार है। और आज उसका आधा हिस्सा तेरे सीने पर चिपका था। तू कभी उसे अपने सीने पर मत लगाना। कोई और ऐसा करे, तो उसे मत करने देना।"
"फटा तो है।"
"तो क्या? अदालत में एक शब्द भी काफ़ी होता है। बस वो शब्द आज रात तक बचा रहे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और फिर आसमान की तरफ़। सुबह की धूप अब भी धुँधली थी।
मेरी जेब में टोकन ठंडा था। और उस पर उभरे शब्द ने अब हल्की सी चमक ली — जैसे टोकन भी जानता हो कि मैंने आज कुछ ऐसा लिया है जो मेरा नहीं है — बल्कि वापस लिया है।
चाय की दुकान के पीछे एक टूटी चारपाई पड़ी थी। बंसी ने मुझे उस पर बैठाया और खुद सामने वाली बेंच पर बैठ गया। दुकानदार ने दो गिलास चाय रख दिए। मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे।
"अब बताओ," बंसी ने कहा, "कमरे में और कौन था?"
"पता नहीं। बत्ती बुझी तो अंधेरा। बस चप्पल की आवाज़ सुनी।"
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