The Token System – Chapter 908
“आधे घंटे पहले।” सुमन ने लिफ़ाफ़ा ऊपर उठाया। “जब आप रिकॉर्ड कमरे की चाबी लेकर नीचे आ रहे थे, तब जज साहब का आदमी ऊपर जा चुका था। असली डायरी अब जज साहब के ताले में है। जो आपके हाथ में है, वो —”
उसने राजेंद्र की तरफ़ देखा। राजेंद्र ने आगे बढ़कर शेखर बाबू के हाथ से चाबी ले ली।
“ये उस दराज़ की चाबी है,” राजेंद्र ने कहा, “जिसमें बीस साल पुरानी फाइलें हैं। जो काग़ज़ आप ढूँढ रहे थे, वो उस दराज़ में कभी था ही नहीं।”
शेखर बाबू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर सुमन की तरफ़।
“तुमने — तुमने मुझे बेवक़ूफ़ बनाया?”
“नहीं, शेखर बाबू,” सुमन ने कहा। “भवानी ने बनाया। उसने आपको ये काम दिया, क्योंकि वो जानता है — आप वो काम करेंगे जो कोई ईमानदार आदमी नहीं करेगा। और अब वो काग़ज़ आपके हाथ में आ जाता, तो आप हमेशा के लिए उसके आदमी बन जाते।”
शेखर बाबू ने चश्मा पहना। उनके हाथ काँप रहे थे।
“मेरी बेटी —”
“आपकी बेटी को भवानी से कोई ख़तरा नहीं,” सुमन ने कहा। “उसे ख़तरा आपसे है। जो आदमी अपने ही काग़ज़ बेचकर बेटी की शादी करवाता है, उसकी बेटी की शादी शादी नहीं, सौदा होती है।”
शेखर बाबू कुछ नहीं बोले। उन्होंने एक बार मेरी तरफ़ देखा। फिर पलटकर सीढ़ियाँ उतरने लगे। चार सीढ़ी उतरे, रुके, और बिना मुड़े कहा:
“मन्नू — तेरा दादा मुझसे कभी नाराज़ नहीं हुआ। और मैंने उसके साथ जो किया —”
“क्या किया?” मैंने पूछा।
“भवानी ने पहली बार जो काग़ज़ बदला था, वो मैंने बदला था।” उनकी आवाज़ सूखी थी। “तेरे दादा उस दिन मेरे दफ़्तार में बैठे थे। उन्होंने मुझे पानी मांगा। मैं पानी लेने उठा — और उसी बीच काग़ज़ की जगह दूसरा काग़ज़ रखा गया। मैंने वो नहीं रखा था, पर मैंने नहीं बताया कि रखा गया। मैं डर गया था।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“तेरा दादा मुझे माफ़ कर गए थे,” उन्होंने कहा। “अब तू कर या न कर।”
वो उतर गए। राजेंद्र ने दो सिपाहियों को इशारा किया — वो उनके पीछे चले।
सुमन मेरे पास आई। उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“ये तेरा नहीं,” उसने कहा। “ये अदालत का है। पर इसे एक बार तूने ही पढ़ना है। जज साहब सुनवाई से पहले चाहते हैं कि तू इसे देखकर बोल — इसमें लिखी बात सच है या नहीं।”
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक ही पन्ना था — पीला, टेढ़े किनारे, और छोटी साफ़ लिखाई में कुछ लिखा था।
मैंने पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा।
“ये मेरे दादा की लिखाई नहीं है,” मैंने कहा।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “नहीं है?”
“ये लिखाई मेरे दादा की नहीं है। ये —” मेरी गला सूख गया। “ये मेरी लिखाई है।”
बंसी ने लिफ़ाफ़े की तरफ़ झाँका। सुमन का चेहरा बदल गया।
“क्या मतलब?”
“मतलब — ये पन्ना मैंने नहीं लिखा। पर इस पर जो लिखा है, वो मेरी लिखावट में है। और मैंने ये कभी नहीं लिखा।”
राजेंद्र आगे आया। “मनोहर — ये लिफ़ाफ़ा जज साहब के ताले से आया है।”
“तो जज साहब के ताले में ये पन्ना किसने रखा?”
चारों तरफ़ चुप्पी छा गई। और उसी चुप्पी में — ज़ोर की आवाज़ आई। नीचे से। गेट से। किसी के चिल्लाने की आवाज़, फिर भागते कदमों की, और फिर एक आदमी का तेज़ सांस लेते हुए कहना — “रुको! रुको!”
मैं सीढ़ियों से उतरा। गेट पर सिपाही एक आदमी को ज़मीन पर दबोचे हुए था, और उस आदमी के हाथ से एक कपड़े का थैला छूट गया था जिसमें से काग़ज़ बिखर गए थे।
“ये कौन है?” राजेंद्र ने पूछा।
“सर,” सिपाही ने हाँफते हुए कहा, “ये कह रहा है — जज साहब का आदमी है।”
मैं ज़मीन पर झुका। उस आदमी का चेहरा जाना-पहचाना नहीं था — पचास के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, कलाई पर पट्टी बँधी।
“तुम जज साहब के आदमी हो?” मैंने कहा।
“हाँ जी।” वो हाँफ रहा था। “मैं जज साहब के साथ — रोज़ चलता हूँ।”
“तो भाग क्यों रहे थे?”
“क्योंकि —” उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर सुमन की तरफ़। “क्योंकि वो लिफ़ाफ़ा जो आपने खोला — वो जज साहब का नहीं है। मैंने उस पर मुहर लगाई। जज साहब ने नहीं।”
मेरी मुट्ठी भर गई।
“किसने कहा था मुहर लगाने को?”
वो कुछ नहीं बोला।
राजेंद्र ने उसका कुर्ता पकड़कर उठाया। “बोल!”
“काले कोट और गोल चश्मे वाले आदमी ने,” उसने काँपते हुए कहा। “रात में आया। कहा — ये लिफ़ाफ़ा सुबह अदालत से पहले मनोहर जी के हाथ में पहुँचाना। और ये भी कहना कि जज साहब ने भेजा है।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “काला कोट। गोल चश्मा। वही आदमी जिसने चौकीदार से दादा की डायरी माँगी थी।”
मैंने उस आदमी की कलाई पर पट्टी देखी।
“तुम्हारी कलाई पर पट्टी क्यों है?”
“गिर गया था —”
“पट्टी उठाओ।”
वो नहीं उठाया। राजेंद्र ने ख़ुद उठाई। नीचे — लंबा, उलटा, टेढ़ा ज़ख़्म। बिल्कुल वैसा, जैसा माँ ने बताया था जज साहब के साथ आए आदमी की कलाई पर था।
मैंने एक कदम पीछे लिया। सुमन ने मेरी आस्तीन पकड़ी।
“मन्नू — ये वही आदमी है?”
“नहीं,” मैंने धीरे से कहा। “ये वही आदमी नहीं। पर ज़ख़्म वही है।”
राजेंद्र ने कहा, “मतलब जो कलाई पर उलटा ज़ख़्म रखता है, वो कोई अकेला आदमी नहीं — एक निशान है।”
“हाँ,” मैंने कहा। “और जिस दिन ये निशान किसी और के हाथ पर देखो — समझ जाना कि वो भी उन्हीं का है।”
राजेंद्र ने उस आदमी को सिपाहियों के हवाले किया और मेरी तरफ़ मुड़ा।
“मनोहर, अब सुन।” उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने उसमें पहले नहीं सुनी — ठोस। “जज साहब ने तुझे सुबह दस बजे अदालत में बुलाया है। पर जाने से पहले वो चाहते हैं कि तू एक काम कर।”
“क्या?”
“वो लिफ़ाफ़ा जो अभी खुला — जिस पर मेरी मुहर नकली थी — उसे लेकर जज साहब के घर जा। अभी। अकेले।”
“क्यों?”
“क्योंकि जज साहब जानना चाहते हैं कि उनके ताले में ऐसा पन्ना कैसे पहुँचा जिस पर तेरी लिखाई है।” राजेंद्र ने एक पल रुककर कहा, “और मनोहर — जज साहब ने एक बात कही थी। कहा — ‘उस लड़के को बोलना, मेरे घर आए, पर मेरे साथ आए उस आदमी से नहीं मिले।’”
मैंने बंसी को देखा। बंसी ने सुमन को। सुमन ने मुझे।
“मैं चलता हूँ,” मैंने कहा।
“मैं साथ चलूँ?” बंसी ने पूछा।
“नहीं। तू अस्पताल में रुक। अमर के बाहर। सुमन के पास।” मैंने सुमन की तरफ़ देखा। “ठीक है?”
सुमन ने सिर हिलाया। “पर मन्नू — सुन।”
“क्या?”
“अमर की आँख खुली थी। मैंने पूछा — कौन था वो आदमी जो तुझसे काग़ज़ लेकर गया। उसने कहा — ‘मैं उसका नाम नहीं जानता, पर उसकी अंगूठी याद है। सादी पीतल की। बिना कोई निशान।’”
मैं सीढ़ियाँ उतरने लगा। नीचे गेट पर पहुँचा तो मैंने पीछे मुड़कर एक बार सुमन को देखा।
“सुमन,” मैंने कहा, “अगर मैं दोपहर तक न लौटूँ —”
“लौटेगा,” उसने कहा। “तू हमेशा लौटता है। बस इस बार लौटते वक़्त वो नकली पन्ना लेकर लौटना — जिस पर तेरी लिखाई है। क्योंकि अगर वो पन्ना किसी और के हाथ में गया, तो जो भी उस पर लिखा है, वो अदालत में तूने लिखा हुआ माना जाएगा।”
मैं साइकिल की तरफ़ बढ़ा। पर पहुँचने से पहले मेरी नज़र अस्पताल के सामने खड़ी उस सफ़ेद गाड़ी पर पड़ी — अब वहाँ नहीं थी। जगह ख़ाली थी। बस धूल में एक लंबी लकीर बनी थी — जैसे किसी ने पैर घसीटकर गाड़ी तक जाने का निशान छोड़ा हो।
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