The Token System – Chapter 899
वो गाड़ी में बैठा। इंजन चालू किया। फिर खिड़की से झाँका।
"एक बात और," उसने कहा। "श्यामलाल को पुलिस ले गई। पर वो अंदर से किसी को फ़ोन कर चुका है। मुझे पता चला है। सुबह तक कुछ होने वाला है। तू संदूक खोल, पर आँखें खुली रख।"
गाड़ी चली गई। मैं सड़क पर अकेला खड़ा रहा, हाथ में चाबी, और सामने ज़मीन पर वो लोहे का संदूक।
मैंने संदूक उठाया। भारी था। घसीटकर घर के पिछले हिस्से में ले गया, जहाँ माँ की नज़र न पड़े। रीना ने दरवाज़े से झाँका।
"ये क्या है?"
"कुछ पुराना काग़ज़," मैंने कहा। "तू सो जा।"
रीना नहीं गई। पास आई, संदूक पर हाथ रखा।
"भवानी दे गया?"
"हाँ।"
"और तू इसे खोल रहा है? आधी रात को? अकेले?"
"इसलिए खोल रहा हूँ कि अकेले खोलना है," मैंने कहा। "अगर इसमें कुछ ऐसा निकला जो माँ को तोड़ दे, तो मैं पहले ख़ुद देखूँगा। फिर तय करूँगा कि उन्हें बताना है या नहीं।"
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। फिर चुपचाप एक लालटेन जलाकर पास रख दी और मेरे साथ ज़मीन पर बैठ गई।
"मैं भी देखूँगी," उसने कहा। "तू अकेला सब नहीं झेलेगा।"
चाबी ताले में डाली। घुमाई। ताला खुला — ज़ंग की आवाज़ के साथ। ढक्कन उठाया तो अंदर से उठी धूल लालटेन की रोशनी में नाचने लगी।
अंदर काग़ज़ों के बंडल थे। रसीदें, पुरानी ज़मीन के काग़ज़, कुछ फटे हुए, कुछ ऐसे जो छूने से टूट जाएँ। मैंने एक-एक करके निकाले। ज़्यादातर हवेली के पुराने हिसाब-किताब — किसानों से लिया लगान, ज़मीन के सौदे, बीसियों साल पुरानी तारीख़ें।
सबसे नीचे एक अलग लिफ़ाफ़ा था। पीला पड़ा, मोटा काग़ज़। ऊपर मेरे दादा की लिखाई — मैंने उनकी लिखाई बहुत देखी थी, पुराने रसीदों पर।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"खोल," उसने कहा।
मैंने खोला। अंदर दो काग़ज़ थे। पहला — दादा की लिखाई में, दो पन्ने का। दूसरा — छोटा, मोड़ा हुआ, किसी और की लिखाई में।
मैंने पहला पढ़ना शुरू किया। दादा ने लिखा था — टोकन के बारे में नहीं, पहले कुछ और। उन्होंने लिखा कि हवेली के कुएँ में जो मिला था, वो पहली बार नहीं था। बीस साल पहले भी कुछ मिला था। किसी और चीज़ का टोकन। और उस वक़्त दादा ने वो टोकन किसी और को दिया था — अपने ही भाई को। उनके बड़े भाई — रघुवीर के पिता — को। और वो टोकन उन्होंने अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया, जबकि उनका हक़ नहीं था।
मेरे हाथ रुक गए। रीना ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या लिखा है?"
"दादा ने अपने भाई का हक़ मारा," मैंने धीरे से कहा। "रघुवीर के पिता का।"
रीना की साँस रुकी।
मैंने दूसरा काग़ज़ खोला। छोटा, मोड़ा हुआ। उस पर सिर्फ़ चार लाइनें थीं — और नीचे एक नाम। वो नाम किसी और का नहीं, उस आदमी का था जिसना दादा ने बीस साल पहले ठगा था।
नाम पढ़ते ही मेरे हाथ काँपने लगे। क्योंकि वो नाम मैं जानता था। वो नाम हमारे घर में सब जानते थे। वो बूढ़ा आदमी जो गली के नुक्कड़ पर चाय की दुकान चलाता है — जगन्नाथ चाचा। वही जगन्नाथ, जिसके पास मैं बचपन में रोज़ जाता था, जो मुझे मुफ़्त चाय पिलाता था, जिसकी आँखों में हमेशा कोई पुराना दर्द बसा रहता था।
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया। रीना ने पढ़ा। फिर दोनों चुप बैठे रहे।
"अब क्या?" रीना ने पूछा।
"ये काग़ज़ सुबह अदालत में जाएगा," मैंने कहा।
"दादा के ख़िलाफ़?"
"सच के साथ," मैंने कहा। "मैंने कहा था न — हिसाब बराबर। अब पूरा हिसाब।"
सुबह हुई तो मैंने रघुवीर को फ़ोन किया। उसे सब बताया। वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला — "मिलता हूँ अदालत में।" और फ़ोन रख दिया।
अदालत पहुँचा तो रघुवीर पहले से बाहर खड़ा था। मेरी तरफ़ देखा।
"मेरे पिता का हक़ मारा था दादा ने?"
"हाँ।"
"और तू ये काग़ज़ पेश करेगा?"
"हाँ।"
रघुवीर ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने हाथ बढ़ाया।
"आ।" बस इतना कहा।
अंदर जज के सामने मैंने दोनों काग़ज़ पेश किए। जज ने पढ़ा। उनका चेहरा गंभीर होता गया। जब नाम पढ़ा — जगन्नाथ का — तो उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"ये नाम तुम जानते हो?"
"जानता हूँ, जज साहब। ये मेरे बचपन के जगन्नाथ चाचा हैं। गली के नुक्कड़ पर चाय की दुकान।"
"उन्हें बुलाया जाएगा," जज ने कहा। "अगर ये सच है, तो उन्हें मुआवज़ा मिलेगा। और तुम्हारे दादा के ख़िलाफ़ भी जाँच होगी।"
"मुझे मंज़ूर है, जज साहब।"
जज ने फ़ैसला सुनाया — पिछली सुनवाई में दिए आदेश पूरे रहेंगे। दादा के ख़िलाफ़ जाँच खुलेगी। जगन्नाथ को अदालत बुलाया जाएगा। और श्यामलाल की हिरासत पाँच दिन बढ़ाई जाती है, क्योंकि पुलिस को उसके फ़ोन रिकॉर्ड से पता चला है कि उसने जेल में रहकर भी किसी को बाहर भेजा था।
फ़ैसला सुनकर मैं बाहर आया। सीढ़ियों पर जगन्नाथ चाचा खड़े थे। किसी ने उन्हें ख़बर कर दी थी। उनकी आँखों में आँसू थे। बीस साल का दर्द उनके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था।
मैं उनके पास गया। कुछ कहना चाहता था — माफ़ी, या कुछ और। पर वो बोले।
"तेरे दादा ने मुझे ठगा था," उन्होंने कहा। "पर तूने आज मेरा हक़ लौटा दिया। मैं तेरे दादा को नहीं, तुझे दुआ दूँगा।"
मैं झुका। उनके पैर छुए।
उसी शाम मैं घर पहुँचा। माँ बैठी थीं। मैंने उन्हें सब बताया। सुनते ही वो चुप हो गईं। फिर बोलीं —
"तेरे दादा ने जो किया, वो ग़लत था। पर तूने जो किया, वो हमारे घर का नाम बचाया।"
"माँ, काग़ज़ तो उनके ख़िलाफ़ गया।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "पर ईमानदारी से। चोरी से नहीं।"
रात को मैं बैठा था। टोकन मेज़ पर रखा था — ठंडा। मैंने हाथ बढ़ाया। टोकन छुआ तो हल्का गरम हुआ। फिर मेरी हथेली में कुछ आया। मैंने देखा — दो हज़ार के नोट। चार। जगन्नाथ चाचा के बीस साल पुराने हक़ का हिसाब।
मैं उठा। बाहर चला। जगन्नाथ चाचा की दुकान बंद थी। मैंने दरवाज़े की दरार से लिफ़ाफ़ा अंदर सरका दिया। ऊपर लिखा — "आपका हक़। माफ़ी के साथ।"
लौटकर आया तो सोचा, अब तो सब खत्म। हवेली का फ़ैसला हो गया, दादा की सच्चाई सामने आ गई, भवानी ने काग़ज़ दे दिए, श्यामलाल अंदर है।
तभी मेरा फ़ोन बजा। भवानी।
"एक बात बताना भूल गया," उसने कहा। "श्यामलाल ने जेल से जिसे फ़ोन किया था — वो बाहर आ चुका है। और उसने तेरे घर के बाहर चक्कर लगाना शुरू कर दिया है।"
"कौन?"
"पता नहीं," भवानी ने कहा। "पर सावधान रह। अब तेरे पास टोकन है। और टोकन वालों के पीछे पूरा शहर पड़ा है।"
फ़ोन कट गया। मैंने खिड़की से बाहर देखा। गली खाली थी। पर नुक्कड़ के पेड़ के पीछे कोई खड़ा था — काली छाया, सिगरेट की लाल नोक।
मैंने खिड़की का पर्दा खींचा। टोकन जेब में रखा। रीना सो रही थी। माँ सो रही थीं।
मैं दरवाज़े की कुंडी जाँचने लगा — और तभी सड़क पर गाड़ी की रोशनी पड़ी। एक गाड़ी आकर रुकी। दरवाज़ा खुला। भवानी उतरा, हाथ में एक और चाबी।
"भूल गया था," उसने कहा। "इस संदूक में एक ख़ाना और है — नीचे, लोहे के फ़र्श के नीचे। उसका ताला अलग है। और उसमें जो है, वो मैंने आज तक नहीं देखा। मेरे दादा ने कहा था — इसे तभी खोलना जब हवेली का फ़ैसला हो जाए।"
"तो अब खोल।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो तेज़ी लौट आई थी — पर इस बार डर के साथ।
"इनमें एक काग़ज़ ऐसा है जो तेरे दादा के ख़िलाफ़ है," उसने कहा। "अगर ये अदालत में गया, तो तेरे दादा चोर साबित होंगे। अब बता, तू इसे खोलेगा या मैं इसे वापस गाड़ी में रख दूँ?"
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