The Token System – Chapter 888
"तूने ये कब लिखा?" मैंने पूछा।
"पिछले महीने," उसने कहा। "जब मुझे पता चला कि श्यामलाल ने अपने काग़ज़ों पर हस्ताक्षर बदलवाए हैं। मेरे ही एक मुंशी ने उसके लिए ये काम किया था। मुंशी मरने से पहले मुझसे आकर माफ़ी माँगने लगा। तब मैं समझा कि चालीस साल से मैं उसी की गाड़ी में बैठकर, उसी के लिए हिसाब बिगाड़ रहा था।"
"बस माफ़ी माँग ली?" बंसी ने कहा, और उसकी आवाज़ में तल्ख़ी थी।
देवेंद्र ने उसकी तरफ़ देखा।
"बस माफ़ी," उसने कहा। "और फिर मैंने तिजोरी खोली, और चालीस साल पहले वाला चौथा टुकड़ा निकाला।"
मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा।
"बंसी," मैंने कहा, "ये काग़ज़ तेरे मुंशी के पास ले जा। दो कॉपी बनवा। एक तू रखना, एक मैं ले जाऊँगा। और कोई तीसरे को न बताना।"
"मैं भी चलूँ?" रीना ने दरवाज़े से कहा। वो माँ के साथ लौट आई थी।
"नहीं," मैंने कहा। "तू माँ के साथ हवेली चल। दो बजे अदालत पहुँचना है।"
बंसी काग़ज़ लेकर निकल पड़ा। देवेंद्र ने तिजोरी बंद की और चाबी मेरे हाथ में रखी।
"रख," उसने कहा। "अब मेरा काम है बस सच बोलना।"
हवेली लौटते वक़्त मेरे पीछे गाड़ी आई। पीली नंबर प्लेट वाली सरकारी गाड़ी। गेट पर रुकी, और उतरा वही राजेंद्र — इस बार साथ में दो और आदमी, काले कोट में, हाथ में एक काग़ज़।
राजेंद्र ने मुझे देखते ही काग़ज़ बढ़ा दिया।
"अदालत ने सुनवाई आज दोपहर दो बजे रखी है," उसने कहा। "तुम्हें चार बजे तक हर हाल में पहुँचना है। देर हुई तो वारंट।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। मुहर लगी थी, ताज़ा। दो बजे, हवेली के मालिकाना हक़ की सुनवाई।
भवानी गेट के अंदर से आ रहा था। राजेंद्र ने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे ख़िलाफ़ भी वारंट है," उसने कहा। "दो बजे।"
भवानी हँसा।
"मैं तो खुद जाना चाहता था," उसने कहा। "बीस साल से सोच रहा हूँ कि कब बोलूँ। तब राजेंद्र ने एक मुहर लगी तलबी और भवानी की ओर बढ़ाई। भवानी ने वो लेते वक़्त एक पल मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। डर नहीं। तैयारी। जैसे सालों से जवाब रटा हुआ हो और काग़ज़ सिर्फ़ बहाना हो।
राजेंद्र की गाड़ी गई।
मैंने भवानी को अलग ले जाकर कहा — "तेरे बेटे अमर की हालत ख़राब है। उसका वकील उसे अदालत में घसीटना चाहता है।"
भवानी ने मुँह सिकोड़ा।
"अमर अदालत में आएगा," उसने कहा।
"तूने उसे मना क्यों नहीं किया?" मैंने पूछा। "वो बीमार है।"
"मैंने नहीं मनाया," भवानी ने कहा। "उलटा मैंने ही उससे कहा।"
"क्या कहा?"
"मैंने कहा — अगर सच बोलने से तेरा बोझ हल्का होता है, तो बोल दे।"
मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया।
"तूने उसे ये कैसे कह दिया?" मैंने पूछा। "तू तो कहता था — बेटे को लड़ाई से दूर रखो।"
भवानी ने मुँह घुमाया। पीछे हवेली की छत पर एक कबूतर उड़ा। उसने उसकी तरफ़ देखा, जैसे शब्द जमा कर रहा हो।
"तूने मुझसे एक बार पूछा था," उसने कहा, "कि मैं तेरे बाप के साथ खड़ा क्यों नहीं था। मेरे पास जवाब नहीं था। आज भी नहीं है। पर अमर के पास जवाब है। वो मुझसे बेहतर आदमी है। उसका बोझ मेरे बोझ से हल्का है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। कुछ बदल गया था। चेहरा वही, पर अंदर से।
"तू अचानक बदला क्यों है?" मैंने पूछा।
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी जेब से अपना टोकन निकाला — वही पुराना, जो कुएँ में मिला था। उसे मेरी हथेली पर रखा। वो गरम था। और उस पर एक लाइन खिंची थी, जो अभी तक नहीं थी।
"क्योंकि कल रात मेरे टोकन पर लिखा आया," भवानी ने कहा — "'बेटे का हिसाब उतारने का आख़िरी मौक़ा आज है।'"
मैंने उसे देखा। टोकन की स्याही सूखी नहीं थी — जैसे अभी लिखी गई हो।
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टोकन की स्याही सूखी नहीं थी — जैसे अभी लिखी गई हो। और भवानी उसे देखकर भी कुछ नहीं बोला, बस अपनी जेब में रख लिया। मैंने कुछ पूछना चाहा, पर तभी हवेली की तरफ़ से रीना की आवाज़ आई — "दो बजने वाले हैं, चलो।"
अदालत का कमरा पहले से भरा हुआ था। पंखे धीरे घूम रहे थे और दो पंक्तियों में लोग बैठे थे — काकी, रामकिशन, अमृता, सुमन, और पीछे की बेंच पर वो टाट वाला बूढ़ा भी। भवानी की कुर्सी पहली पंक्ति में खाली रखी थी, और उसके दोनों तरफ़ काले कोट वाले दो आदमी।
राजेंद्र ने दरवाज़े पर खड़े होकर नाम पुकारे। जज साहब आए, चश्मा पोंछा और फ़ाइल खोली।
"पहला गवाह," उन्होंने कहा, "शेखर बाबू।"
शेखर बाबू उठे। उनकी शर्ट की कॉलर सीधी थी और हाथ में एक मोटा भूरा बैग था। जिस वक़्त वो स्टैंड पर खड़े हुए, हॉल में सबसे ज़्यादा शोर हुआ — भवानी का वकील, मोटा सफ़ेद कुर्ता वाला, काग़ज़ उठाकर पहले ही खड़ा हो गया था।
"शेखर बाबू," वकील ने शुरू किया, "आप भवानी सिंह के यहाँ बीस साल से काग़ज़ लिखते रहे हैं। सच बताइए — कितने काग़ज़ बदले?"
शेखर बाबू ने अपना चश्मा उतारा और उसे साफ़ किया।
"बहुत," उन्होंने कहा।
"बहुत मतलब?"
"मतलब ये कि मैंने गिनती छोड़ दी थी।"
हॉल में फुसफुसाहट फैल गई। जज ने मुहर पर मुहर रखी और शेखर बाबू की तरफ़ देखा।
"कितने पैसे लिए?" वकील ने आवाज़ तेज़ की।
"हर काग़ज़ के पचास, कुछ के सौ, कुछ के दो सौ। जो बड़ा हिस्सा हो, उसका ज़्यादा।"
"यानी आप चोर हैं," वकील हँसा। "अपनी गवाही से पहले ही आपने कबूल कर दिया कि आप ख़ुद इस धंधे में शामिल थे। ऐसे आदमी की बात क्यों मानी जाए?"
शेखर बाबू ने बैग खोला। उसमें से काग़ज़ों की गड्डियाँ निकालीं — पीले, भूरे, कुछ पुराने अख़बार में लिपटे। उन्होंने उन्हें एक-एक कर स्टैंड पर रखना शुरू किया।
"मैं चोर हूँ," उन्होंने कहा। "पर मैं बेवकूफ़ नहीं हूँ। मैंने इन पच्चीस सालों में जो भी काग़ज़ बदला, उसकी एक कॉपी अपने घर की पीछे वाली दीवार में ईंट हटाकर रख दी। आज सुबह राजेंद्र जी के सिपाही उसे खोदकर लाए।"
वकील का हाथ बैग पर पड़ा और फिर वहीं रुक गया।
जज ने काग़ज़ उठाकर देखे।
"इन पर मुहर किसकी है?" उन्होंने पूछा।
"भवानी सिंह की," शेखर बाबू ने कहा। "पर एक बात है साहब। जिस रजिस्ट्री पर भवानी की मुहर है, उस पर लगी रबर मुहर पिछले पाँच साल से एक ही ठप्पे से लगी है। और उस ठप्पे का कोना टूटा है।"
भवानी ने पहली बार सीधा उनकी तरफ़ देखा।
"कौन सा कोना?" जज ने पूछा।
"नीचे का बायाँ," शेखर बाबू ने कहा। "अगर सारे काग़ज़ भवानी जी ने ख़ुद लिखवाए होते, तो मुहर में कोना कभी न टूटता। कोना उस वक़्त टूटा जब किसी ने काग़ज़ के नीचे से मुहर उठाकर दोबारा लगाई — जल्दी में।"
वकील ने काग़ज़ उठाकर देखा, फिर रख दिया।
"जाँच की जाएगी," जज ने कहा और काग़ज़ अपने पास रख लिए।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो पीछे की बेंच पर बैठा था और उसकी मुट्ठी घुटनों पर कसी हुई थी। उसने मुझे देखकर बस एक बार सिर हिलाया — कह रहा था, अभी और आना है।
"अगली गवाह," राजेंद्र ने कहा। "डॉक्टर सुमन।"
सुमन उठी। उसने सफ़ेद कोट नहीं पहना था, बस सादा कुर्ता था, और हाथ में एक मोटा रजिस्टर। स्टैंड तक चलते वक़्त उसने भवानी को नहीं देखा, पर भवानी देख रहा था।
"डॉक्टर सुमन," वकील ने शुरू किया, "आप सरकारी अस्पताल में हैं। भवानी के नर्सिंग होम से आपका क्या वास्ता?"
सुमन ने रजिस्टर खोला।
"पाँच साल पहले," उसने कहा, "इनके एक आदमी ने मुझे इमरजेंसी में रोका और कहा कि एक मरीज़ सरकारी अस्पताल में नहीं, उनके होम में भर्ती होगा। मैंने मना किया। उस आदमी ने मेरे हाथ में काग़ज़ दिया।"
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