The Token System – Chapter 841
“पर—”
“ये मेरा हिसाब है,” पहरे ने कहा। “मैं बीस साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ।”
वो आगे बढ़ा और उसने लाठी उठाई। दोनों आदमी रुक गए। मैंने तिजोरी गाड़ी में रखी और सुमन को बिठाया। बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।
“शेखर बाबू?” सुमन ने पूछा।
“वो अंदर हैं,” मैंने कहा। “पर वो बाहर नहीं आएँगे। उन्होंने कहा कि अगर वो आए, तो श्यामलाल को पता चल जाएगा।”
गाड़ी गोदाम से निकली और अदालत की तरफ़ भागी। मैंने पीछे मुड़कर देखा — पहरा उन दोनों के सामने खड़ा था, लाठी हवा में।
सुमन ने मेरा हाथ थामा। “तुम्हारी जेब में टोकन कैसा है?”
मैंने निकाला। वो अब ठंडा नहीं था, पर गरम भी नहीं। बस… शांत।
“क्या लिखा है?”
मैंने देखा। उस पर कोई शब्द नहीं था, पर एक लकीर उभर रही थी — धीरे-धीरे। जैसे कोई लिख रहा हो।
“कुछ आ रहा है,” मैंने कहा।
“क्या?”
लकीर पूरी हुई। मैंने पढ़ा।
“श्यामलाल।”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “उसका नाम?”
“नहीं,” मैंने कहा। “उसका पता।”
नीचे एक और लकीर उभरी — “तहसील। पीछे। तीन नंबर कमरा।”
बंसी ने पीछे मुड़कर देखा। “अदालत या तहसील?”
मैंने टोकन को जेब में रखा। “अदालत। पहले तिजोरी सुरक्षित करनी है। फिर उस आदमी से मिलेंगे।”
“और शेखर बाबू?”
“वो अभी सुरक्षित हैं,” मैंने कहा। “पहरे ने वादा किया था।”
गाड़ी अदालत की गली में घुसी। गेट पर भीड़ थी। मैंने गाड़ी रुकवाई और तिजोरी उठाकर नीचे उतरा।
हरीश चंद्र सीढ़ियों पर खड़े थे। मुझे देखते ही आगे आए। “ये क्या है?”
“तिजोरी,” मैंने कहा। “श्यामलाल की। इसमें हिसाब का पन्ना और एक चाबी है।”
“कैसे मिली?”
“कुएँ से,” मैंने कहा। “और शेखर बाबू खेत्री के गोदाम में हैं। वो सुरक्षित हैं, पर बाहर नहीं आ सकते।”
हरीश चंद्र ने तिजोरी की तरफ़ देखा। “जज से कहता हूँ। ये तिजोरी अदालत के कब्ज़े में रहेगी।”
वो अंदर गए। मैं सीढ़ियों पर बैठ गया। रात बीत चुकी थी और सुबह की पहली किरण आसमान पर फैल रही थी।
सुमन मेरे पास बैठी। “अब?”
“अब,” मैंने कहा, “श्यामलाल से मिलना है।”
“तहसील के पीछे?”
“हाँ।”
“अकेले?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “तुम मेरे साथ चलोगी?”
सुमन मुस्कुराई। “मैं डॉक्टर हूँ, मन्नू। मैं मरीज़ों को अकेले नहीं छोड़ती।”
मैंने टोकन निकाला। वो अब ठंडा था — एकदम शांत। जैसे कह रहा हो — अब तेरी बारी।
मैं उठा और गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। “चलो। एक आदमी से मिलने।”
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। गली के मोड़ पर एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था, हाथ में बुझी लालटेन। उसने हमें देखा और मुस्कुराकर बोला, “श्यामलाल बाबू आपका इंतज़ार कर रहे हैं।”
गाड़ी रुकी। मैंने उतरकर उसकी तरफ़ देखा। “तुम कौन हो?”
“मैं वही हूँ,” उसने कहा, “जो बीस साल से श्यामलाल बाबू का दीया जलाता आया है।”
और वो मुड़कर चल दिया। हम उसके पीछे-पीछे तहसील की तरफ़ बढ़े।
रास्ते में मेरी जेब में टोकन एक बार हिला — बस एक बार — जैसे कह रहा हो, “देख लेना।”
वो सफ़ेद कुर्ते वाला आगे-आगे चल रहा था, कदम तेज़, जैसे रास्ता उसकी जेब में रखा हो। तहसील की इमारत पीछे से आती थी — पीली दीवार, ऊपर लोहे की खिड़कियाँ, और नीचे तीन कमरों की कतार जिनके दरवाज़े हरे रंग से टूटे हुए थे।
“तीसरा कमरा,” बंसी ने धीरे से कहा। “मन्नू, ये सीधा मुँह में जाना है।”
“पता है।”
“फिर?”
“फिर क्या,” मैंने कहा। “मुँह में जाना है तो जाएँगे। पीठ में चाकू घुसेगा तो दर्द होगा ही।”
सुमन ने मेरी बाँह पकड़ी। “मैं साथ चलूँगी।”
“नहीं।”
“मन्नू—”
“तुम बाहर रुको,” मैंने कहा। “कुछ गड़बड़ हुई तो तुम भागकर हरीश चंद्र को बताओगी। कम से कम कोई तो बचेगा जो सच बता सके।”
उसने मेरी आँखों में देखा, फिर हाथ छोड़ दिया। “अगर तुमने कोई वीरता दिखाई, तो मैं तुम्हें अगली बार देखते ही कान पकड़कर खींचूँगी।”
“मेडिकल कॉलेज में ऐसा ही सिखाते हैं क्या?”
“नहीं,” वो बोली। “ये मैंने खुद सीखा है।”
सफ़ेद कुर्ते वाला तीसरे दरवाज़े पर रुका। उसने दरवाज़ा खटखटाया — दो बार, फिर तीन बार। अंदर से आवाज़ आई, “आ जाओ।”
दरवाज़ा खुला। अंदर अँधेरा था-सा, बस एक कोने में लालटेन जल रही थी। और उस लालटेन के सामने कुर्सी पर बैठा था — श्यामलाल।
मैंने उसे पहली बार देखा। सोचा था कोई मोटा, ऊँची आवाज़ वाला आदमी होगा। पर ये तो दुबला-पतला था, सफ़ेद बाल, चश्मा, और हाथ में माला। पंडित जैसा। मंदिर का पुजारी लगता था।
“आओ, मन्नू,” उसने कहा, जैसे मैं उसका रोज़ का मेहमान हूँ। “बैठो।”
“मैं बैठने नहीं आया।”
“फिर क्या करने आए हो? तिजोरी तो अदालत पहुँचा दी। मुझे खबर है।”
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। “खबर कैसे?”
उसने माला का एक दाना घुमाया। “मेरे पास आदमी हैं, मन्नू। तुम्हारे पास सिर्फ़ एक टोकन है। और वो भी अब काम करना बंद कर रहा है, है ना?”
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन पड़ा था, ठंडा। बस ठंडा।
“तो सुनो,” श्यामलाल ने कहा। “तुमने आज रात बहुत कुछ जीता है। पर जीत तभी है जब सुबह तक कुछ बचे। और सुबह होने में अभी दो घंटे हैं।”
“धमकी?”
“सलाह,” उसने कहा। “शेखर बाबू को मैंने नहीं उठाया। उन्हें मेरे आदमियों ने उठाया था, और मैंने उन्हें वापस भेज दिया उसी जगह। पर मैं उन्हें वहाँ से हटा भी सकता हूँ। तुम्हारे हाथ में एक फ़ैसला है।”
“क्या फ़ैसला?”
“तिजोरी वापस कर दो। काग़ज़ भी, हिसाब भी। मैं शेखर बाबू को छोड़ दूँगा और तुम गाँव लौट जाओ। ये जो कुछ हुआ, सब भूल जाओ।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। हाथ में माला थी, चेहरे पर मुस्कान। जैसे बाज़ार में भाव-ताव कर रहा हो।
“आपको क्या लगता है,” मैंने कहा, “मैं इतनी रात मेहनत करके आया, ताकि आपके सामने सौदा करूँ?”
“मुझे लगता है,” उसने कहा, “तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं है। और जिसके पास रास्ता न हो, वो समझदारी की बात सुन लेता है।”
मैं हँस पड़ा। बिना वजह। पर हँसी आई।
“आप बीस साल से एक काग़ज़ छिपा रहे हैं,” मैंने कहा। “बीस साल। एक काग़ज़ के लिए आपने कितने आदमी खरीदे, कितने डराए, किसी की जान ली। और अब आप कह रहे हैं कि मैं समझदारी की बात सुनूँ?”
“मन्नू—”
“नहीं, सुनिए।” मैंने पास रखी कुर्सी खींची और उसके सामने बैठ गया। “मैं आपसे एक बात कहूँ। बंसी!”
बंसी दरवाज़े पर खड़ा था। मैंने इशारा किया।
“अंदर आ जाओ। और साथ में वो लाओ जो तुमने बाहर छिपाया है।”
बंसी कुछ पल रुका, फिर मुस्कुराया और दरवाज़े से बाहर झाँका। अगले ही पल वो अंदर आया, हाथ में वही पीतल की तिजोरी।
श्यामलाल की माला रुक गई।
“पर… हरीश चंद्र को तो—”
“हरीश चंद्र को नकली तिजोरी दी,” मैंने कहा। “लोहे की, कोई चीज़ नहीं उसमें। ये असली है। मैंने सोचा, अदालत में रखकर क्या फ़ायदा, जब आपके आदमी चारों तरफ़ हैं। अगर आपका खेल चल ही नहीं रहा तो रखती कहाँ रहती?”
श्यामलाल उठ खड़ा हुआ। “तुमने मुझे धोखा दिया?”
“धोखा वो होता है जो आपने बीस साल तक किया,” मैंने कहा। “मैंने तो बस आपके जाल में उलझने से मना कर दिया।”
पर अगले ही पल कमरे का दरवाज़ा खुला और चार आदमी अंदर घुसे। हाथों में डंडे। श्यामलाल का चेहरा बदला।
“तुम समझते हो तुम जीत गए?” उसने कहा। “तुम्हारे पास तिजोरी है। पर चाबी मेरे पास है।”
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