The Token System – Chapter 818
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सिकुड़ी हुई थीं।
"तू भवानी के घर जाने की बात कर रहा है?"
"नहीं।" मैं उठ खड़ा हुआ। "मैं भवानी के काग़ज़ों की बात कर रहा हूँ। जो काग़ज़ उसने चुराए, जो रजिस्टर उसने छिपाए — वो अगर अदालत तक पहुँच जाएँ, तो उसे सुमन तक पहुँचने की फ़ुरसत नहीं मिलेगी। वो अपनी ही लड़ाई में उलझा रहेगा।"
"और कल छत?"
"कल छत पर मैं जाऊँगा। पर उससे पहले आज रात —"
"आज रात क्या?"
मैंने जेब से टोकन निकाला। उसे हथेली पर रखा। उस पर वही लकीरें थीं। कोई नया शब्द नहीं।
"आज रात," मैंने कहा, "शेखर बाबू के पास जाना है। उनके पास भवानी का पुराना रजिस्टर है। अगर वो रजिस्टर कल सुबह अदालत में पहुँच जाए, तो भवानी की आधी दीवार गिर जाएगी।"
बंसी उठा। उसने अपना ठंडा गिलास उठाया और एक घूँट में ख़त्म किया।
"ठीक है," उसने कहा। "चल।"
"तू नहीं चलेगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि तेरे हाथ में प्लास्टर है और तेरी दुकान टूटी पड़ी है। तेरा घर भी एक ज़िम्मेदारी है।"
बंसी मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखें छोटी थीं।
"सुन, मन्नू। जिस दिन मैंने भवानी के लिए पहला झूठा काग़ज़ लिखा था, उस दिन मेरे पास भी बहाना था। अपनी दुकान, अपना घर, अपनी ज़रूरत। आज मेरे पास वही बहाना है। और मैं उसे दोबारा इस्तेमाल नहीं करूँगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"दुकान टूटी है, फिर बनेगी। हाथ टूटा है, जुड़ जाएगा। पर अगर आज मैं घर बैठ गया, तो फिर कभी ठीक से खड़ा नहीं हो पाऊँगा।"
"ठीक है।" मैंने सिर हिलाया। "पर एक शर्त है।"
"बोल।"
"तू गेट पर रहेगा। अंदर मैं जाऊँगा। और अगर दस मिनट में बाहर न आऊँ, तो तू शोर मचा देगा और राजेंद्र को बुलाएगा।"
"बीस मिनट।"
"दस।"
"पंद्रह। और इसमें मेरी आधी चाय भी है।"
"तेरी चाय बढ़िया है। तेरह।"
बंसी हँसा। "तेरह। चल।"
शेखर बाबू का घर पुराने बाज़ार के पीछे वाली गली में था, रिकॉर्ड कमरे के पास। सुनसान, टूटी सड़क। बाहर साइकिल खड़ी थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
कोई जवाब नहीं।
फिर खिड़की से रोशनी दिखी। परदा सरका, और शेखर बाबू का चेहरा दिखा — चश्मा नाक पर, एक आँख सिकोड़कर।
"कौन?"
"मैं हूँ, शेखर बाबू। मन्नू।"
दरवाज़ा खुला। वो अंदर ले गए। कमरा छोटा था, काग़ज़ों से भरा। एक कोने में बक्सा, जिस पर कपड़ा ढका था।
"इस वक़्त?" उन्होंने कहा। "कुछ गड़बड़ है?"
"गड़बड़ नहीं।" मैंने पीछे से दरवाज़ा बंद किया। "सिर्फ़ एक काग़ज़ चाहिए। आपके पास जो भवानी का पुराना रजिस्टर है — जिसमें तहसील के दस्तख़त दर्ज हैं।"
शेखर बाबू का चेहरा बदल गया। वो पीछे हटे और मेज़ के कोने पर हाथ रखकर टिके।
"कौन सा रजिस्टर? मेरे पास कई रजिस्टर हैं।"
"वो जो आपने कल तहसील से उठाया था। ईंट के पीछे से।"
उन्होंने चश्मा उतारा। फिर साफ़ किया। उनके हाथ धीरे थे, बहुत धीरे।
"मन्नू, तू नहीं जानता कि तू क्या माँग रहा है।"
"जानता हूँ। और आप भी जानते हैं।"
"अगर भवानी को पता चला—"
"उसे पता चलेगा।" मैंने एक कुर्सी खींची और बैठ गया। "पर सुबह तक नहीं, अगर हम अभी निकलें। आपके पास रजिस्टर है, मेरे पास टोकन। दोनों मिलकर सुबह अदालत में कुछ ऐसा खोलेंगे जो उसने बीस साल से बंद कर रखा है।"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें काँप रही थीं।
"तू भी वही बात करता है जो सुखदेव करता था," उन्होंने कहा।
"कौन सुखदेव?"
"तेरा दादा।" उन्होंने कुर्सी खींची और बैठे। "वो भी यही कहता था — शेखर, हिसाब छिपाना सबसे बड़ा पाप है। जिस दिन मैंने पहला झूठा काग़ज़ लिखा, उस दिन वो मेरे घर आया था। रात को। मेरी बीवी बीमार थी। वो आया और बोला, शेखर, तेरे हाथ में कुछ नहीं। भवानी तेरे बच्चों के स्कूल का ख़र्च उठा रहा है। पर याद रख — जिस दिन तू अपना हिसाब बराबर करेगा, वो दिन तेरे लिए सबसे भारी होगा।"
"और आज?"
"आज," शेखर बाबू ने मेरी आँखों में देखा, "वो दिन है।"
वो उठे, बक्से से कपड़ा हटाया। उसके अंदर भूरी जिल्द का मोटा रजिस्टर था, छोटे चमड़े के पट्टे से बाँधा हुआ।
"ये रजिस्टर मैंने चुराया था," उन्होंने कहा। "और ये मैं ख़ुद चुरा रहा था जब मन्नू ने मुझे रोका। उस दिन भी अपना हिसाब चुकाना चाहता था, पर हिम्मत नहीं हुई।"
"आज?"
"आज हिम्मत कर रहा हूँ।" उन्होंने रजिस्टर मेरे हाथ में रख दिया। "इसमें तीन लिखाइयाँ हैं। एक भवानी के दादा की, एक रामदीन मिस्त्री की, और तीसरी तेरे दादा की। तीनों एक ही साल की हैं। और तीनों में एक ही नाम गायब है।"
"कौन सा नाम?"
"जो तीसरी लिखाई में लिखा है।" उन्होंने रजिस्टर खोला और आख़िरी पन्ना दिखाया। "देख।"
पन्ने पर फटी स्याही में चार लकीरें थीं। तीन नाम साफ़ थे। चौथी लकीर पर सिर्फ़ एक अक्षर बचा था — 'रा'। और उसके नीचे, बहुत छोटी लिखाई में, एक पंक्ति।
मैंने पंक्ति पढ़ी। मेरी साँस रुक गई।
"ये पंक्ति," मैंने कहा, "कौशल्या की है?"
शेखर बाबू ने सिर हिलाया। "तेरे दादा ने लिखी थी। लिखा है — जो इस लकीर का नाम जानेगा, वो मेरी बहन को जानेगा।"
"आपकी बहन?"
शेखर बाबू की आवाज़ धीमी हो गई। "मेरी कोई बहन नहीं थी, मन्नू। सिर्फ़ काग़ज़ों में थी। कौशल्या को हवेली ने अपना नाम दिया था, जब वो सोलह साल की थी। और मुझे —" उन्होंने रुककर साँस ली, "मुझे उस वक़्त यही बताया गया था कि वो मेरी बहन है। ताकि मैं उसे अपने जैसा न समझूँ, और उससे दूरी रखूँ।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे हाथ में रजिस्टर था और सिर में चक्कर।
"तो आप मेरी माँ के—"
"मैंने आज तक किसी से नहीं कहा, क्योंकि मुझे सच नहीं पता।" उन्होंने चश्मा पहना। "पर आज रजिस्टर में चौथी लकीर पर जो अक्षर बचा है, वो सबसे बड़ा सुराग़ है। 'रा' — राघव। वही चौथा हिस्सा, जो काग़ज़ों से मिटाया गया।"
"आप मुझे क्या बता रहे हैं?"
"मैं यही बता रहा हूँ कि तू जब कल छत पर जाएगा, तो उससे पूछ — उससे पूछ कि वो कौशल्या का क्या लगता है।" उन्होंने मेरे हाथ से रजिस्टर लिया और बाँधने लगे। "अब चल। देर नहीं करनी। सुबह अदालत है।"
बाहर बंसी गेट पर खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखकर पूछा, "क्या मिला?"
"बहुत कुछ।" मैंने रजिस्टर अपनी बगल में दबाया। "और कुछ ऐसा जो मैंने माँगा नहीं था।"
"अच्छा?"
मैंने उसे रास्ते में सब बताया। बंसी चलता रहा, कुछ नहीं बोला।
"कुछ कह क्यों नहीं रहा?" मैंने पूछा।
"जब हिसाब अपनी असली शक्ल दिखाता है," उसने कहा, "तो पहले डर आता है, फिर ज़मीर जागता है। मैं अभी पचास के करीब हूँ, और मेरे ज़मीर ने भी आज ही आँख खोली है। मुझे चुप रहना सीखना पड़ रहा है।"
रात दस बजे मैं घर पहुँचा। माँ दरवाज़े पर बैठी थीं, पंखा चला रही थीं। मैंने रजिस्टर उनके सामने रख दिया।
"क्या है?" उन्होंने पूछा।
मैंने पन्ना खोला। आख़िरी लकीर पर उँगली रखी।
माँ ने आधे पन्ने तक देखा। फिर रुक गईं। फिर उन्होंने पंखा बंद कर दिया।
"मुझे पता था," वो बोलीं।
"क्या पता था?"
"कि मैं किसी और की बेटी नहीं हूँ।" उन्होंने सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा। "बचपन में हवेली में जाती थी, तो सब मुझे बहुत आदर से देखते थे — बहुत आदर, सच कहूँ तो डरने वाला आदर। और भवानी के बाप को जब भी मैं दिखती, वो मुँह फेर लेता। उसके घर में कोई बात थी जो सब जानते थे, और माँ रह गई थी।"
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