The Token System – Chapter 816
मैंने काग़ज़ खोला। सूची में नाम थे। और उनमें से एक नाम मैंने पहले भी कहीं देखा था — शकुंतला देवी।
"मैंने उस औरत को भवानी के होम भेजा था," सुमन ने कहा। "और वो वहाँ मरी।"
वो चुप हो गई। मैंने काग़ज़ उसे लौटाया।
"तूने उसे नहीं भेजा," मैंने कहा। "तुझे भेजने पर मजबूर किया गया।"
"यही तो सबसे बड़ा झूठ है।" सुमन ने काग़ज़ जेब में रखा। "जो काम हम डर के मारे करते हैं, वो भी हमारा ही होता है।"
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।
"तूने मुझे आज बताया क्यों?"
"क्योंकि कल तू छत पर जा रहा है।" सुमन ने मेरी आँखों में देखा। "और मुझे नहीं पता कि वहाँ से तू लौटेगा या नहीं। अगर नहीं लौटा, तो ये बात किसी के पास रहनी चाहिए।"
"तो ये बात राजेंद्र के पास रख।"
"नहीं।" सुमन ने सिर हिलाया। "राजेंद्र के पास जाएगी तो वो काग़ज़ माँगेगा, और काग़ज़ जाएगा तो भवानी के वकील उसे गायब कर देंगे। ये काग़ज़ मेरे पास रहेगा।"
वो मुड़ी।
"सुमन।"
वो रुकी।
"तू उस औरत की मौत का बोझ पाँच साल से उठा रही है," मैंने कहा। "अब उतार।"
सुमन ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखें भरी थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"जिस दिन भवानी का हिसाब खुलेगा," उसने कहा, "उस दिन उतरेगा।"
वो वार्ड में चली गई।
मैं बाहर आया। रात हो चुकी थी। काकी वहीं बैठी थीं।
"दादी, तुम घर जाओ। मैं यहीं रुकता हूँ।"
"नहीं।" काकी ने सिर हिलाया। "मैं यहीं सोऊँगी। छोटू जब उठेगा तो पहले मुझे देखेगा।"
मैंने उनके पैरों के पास चटाई बिछाई। वो लेटीं। मैं बाहर बेंच पर बैठ गया।
जेब से अँगूठी निकाली। चाँद की रोशनी में उसे देखा। मोटी, घिसी, पुरानी। अंदर का नाम उँगली से टटोला — भगवान सिंह।
अगर ये अँगूठी भगवान सिंह की है, तो ये आदमी भगवान सिंह का क्या है? बेटा? भाई? या कोई जो उनका नाम इस्तेमाल कर रहा है?
मैंने टोकन जेब से निकाला। उस पर नई लाइन नहीं थी। बस वही पुरानी लकीरें, वही कोना-चिह्न।
मैंने अँगूठी उँगली में पहनी।
कुछ नहीं हुआ। टोकन ने गरमी नहीं दी। अँगूठी भारी थी, बस।
मैंने उसे उतारकर जेब में रखा और बेंच पर लेट गया।
सुबह होते-होते मैंने तीन बार आँखें खोलीं। हर बार वही सपना — एक छत, एक आदमी, और एक अँगूठी जो मेरी उँगली से फिसल रही थी।
सुबह छह बजे सुमन बाहर आई। "छोटू जागा है। पूरा होश में।"
मैं अंदर गया। छोटू ने मुझे देखा और मुस्कुराया।
"चाचा।"
"हाँ, बेटा।"
"दादी?"
"बाहर है। सो रही है।"
छोटू ने धीरे से कहा, "मुझे पता था तुम आओगे।"
मैं उसके पास बैठ गया। "अब कैसा लग रहा है?"
"कमज़ोर।" उसने हाथ उठाया। "पर ठीक हूँ।"
काकी अंदर आई। छोटू को देखकर उसकी आँखें भर आईं, पर वो रोई नहीं। उसने छोटू का सिर सहलाया और कुछ नहीं कहा।
मैं बाहर आया। राजेंद्र का फ़ोन आया।
"मन्नू, मोहम्मद इस्माइल का नाम होम के तीन रजिस्टरों में मिला। गाड़ी उसके नाम पर है, पर वो ख़ुद होम में नहीं रहता। पता मिला है — पुराने बाज़ार के पीछे, क़ब्रिस्तान वाली गली में।"
"तो जाएँ?"
"मैं जा रहा हूँ। तू अस्पताल में रुक।" वो रुका। "और मन्नू, आज शाम छत पर। तू अकेला नहीं जाएगा, याद है?"
"याद है।"
फ़ोन कटा।
मैंने सुमन को बुलाया। "आज शाम छत पर जाना है। राजेंद्र पीछे रहेगा। मैं तुझे बता रहा हूँ। वादा पूरा।"
सुमन ने सिर हिलाया। "और अगर वो वहाँ तुझे अकेला देखकर कुछ कहे तो?"
"तो सुनूँगा।" मैंने जेब में हाथ डाला। "पहले सुनना, फिर देखना।"
दोपहर को मैं घर गया। माँ चूल्हे पर थी। रीना स्कूल गई थी।
"माँ।"
माँ ने पलटकर देखा।
"आज शाम मुझे कहीं जाना है।" मैंने कुर्सी खींची। "रात तक लौट आऊँगा।"
माँ ने चूल्हे की आँच धीमी की। "कहाँ?"
"हवेली की छत पर।"
वो चूल्हे के पास ही खड़ी रही। फिर बोली, "अकेला?"
"अकेला नहीं। राजेंद्र पीछे रहेगा।"
माँ ने थाली उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "खा।"
"भूख नहीं है।"
"मैंने पूछा नहीं। खा।" उसने थाली मेज़ पर रख दी। "जो आदमी खाली पेट लड़ने जाता है, वो लड़ता नहीं, गिरता है।"
मैं बैठ गया। रोटी तोड़ी। माँ सामने बैठ गई, हाथ में पंखा।
"वो अँगूठी दिखा," उसने कहा।
मैंने जेब से निकाली। माँ ने हाथ में ली। पलटी। अंदर का नाम देखा। उसकी उँगली उस नाम पर रुकी।
"भगवान सिंह।" उसने धीरे से कहा।
"तू जानती है इसे?"
माँ ने अँगूठी मेज़ पर रख दी, जैसे वो गरम हो। "भगवान सिंह बीस साल पहले हमारे गाँव के ज़मींदार थे। तेरे पिता के साथ उनका हिसाब-किताब था।"
"हिसाब-किताब?"
"ज़मीन का मामला।" माँ ने पंखा धीमा किया। "तेरे पिता ने उनसे कुछ एकड़ खरीदे थे। रजिस्ट्री हुई, पैसा दिया। फिर एक दिन भगवान सिंह मुकर गए। बोले, पैसा कम मिला।"
"फिर?"
"फिर क्या। तेरे पिता अदालत गए। दो साल मुकदमा चला।" माँ की आवाज़ सपाट थी। "और जिस दिन फ़ैसला आने वाला था, उससे एक रात पहले तेरे पिता को बुख़ार चढ़ा। तीन दिन में चले गए।"
मेरे हाथ की रोटी रुक गई।
"तूने मुझे कभी नहीं बताया।"
"क्या बताती।" माँ ने पंखा चलाया। "तू उस वक़्त आठ साल का था। तुझे मुकदमे से क्या लेना।"
"और भगवान सिंह?"
"मुकदमा हम हार गए।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "काग़ज़ कमज़ोर निकल आए। भगवान सिंह ने बाद में वो ज़मीन बेच दी, और कुछ साल बाद वो भी मर गए।"
मैंने अँगूठी उठाई। "तो ये अँगूठी उसी की है।"
"उसकी निशानी है।" माँ ने रोटी की तरफ़ इशारा किया। "खा।"
मैंने खाया।
"माँ, एक बात।" मैंने चबाते हुए कहा। "भगवान सिंह का भवानी से क्या रिश्ता था?"
माँ कुछ देर चुप बैठी रही। "भवानी उसकी भतीजी है। भगवान सिंह की कोई संतान नहीं थी। मरने से पहले उसने अपनी सारी जायदाद भवानी के नाम कर दी।"
पंखा रुक गया।
"और ये अँगूठी किसी ज़माने में उस घर की निशानी थी," माँ ने कहा। "जो इसे पहनता था, वो भगवान सिंह का आदमी माना जाता था।"
मेरे हाथ से अँगूठी मेज़ पर गिरी। एक बार लुढ़की, फिर रुकी।
"तो जिस आदमी ने छत पर मुझसे मिलना तय किया है," मैंने कहा, "वो अपने आप को भगवान सिंह का आदमी कह रहा है। यानी वो भवानी के ख़िलाफ़ खड़ा है।"
"या ख़ुद भवानी ही है।" माँ ने पंखा वापस चलाया। "छत पर क्या होगा, पता है तुझे?"
"नहीं।"
"तो सुन।" माँ ने आवाज़ धीमी की। "वो आदमी जो भी हो, वो तुझे बुलाकर अपने हाथ में खेल रहा है। छत पर या तो वो तुझे कोई चीज़ देगा, या कोई चीज़ छीन लेगा। दोनों में फ़र्क़ यही है — तुझे पता होना चाहिए कि तेरे पास क्या है जो वो चाहता है।"
"मेरे पास क्या है?"
माँ ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "वो गोली का टोकन।"
मैंने बाहर जाकर टोकन निकाला। दोपहर की धूप में उसे घुमाया। उस पर वही लकीरें, वही कोना-चिह्न। कुछ नया नहीं।
तभी पीछे से आवाज़ आई। "भाई।"
रीना थी। स्कूल से लौटी थी, बैग कंधे पर। हाथ में कॉपी।
"तू दोपहर में घर क्यों आई?"
"आधी छुट्टी थी।" उसने कॉपी खोली। "देख, मैंने उस गाड़ी का नंबर लिख लिया, पर एक और बात पकड़ी है।"
वो मेरे पास आई और कॉपी दिखाई। "गाड़ी के शीशे पर एक स्टिकर था। फटा हुआ। उस पर ये निशान बना था।"
उसने उँगली से बनाया — एक गोल, और उसके अंदर एक तिरछी लकीर।
मेरा हाथ रुक गया।
टोकन की कोना-लकीर वही थी। बिल्कुल वही।
"ये तूने ठीक से देखा?" मैंने पूछा।
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