The Token System – Chapter 813
"मन्नू, कहाँ?" उसने पूछा।
"फ़तेह से बात करनी है। अभी।"
"पागल है क्या? वो राजेंद्र की हिरासत में है, और तू उससे—"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। "बंसी, उसने रीना का नाम लिया। रीना कहाँ है अभी?"
बंसी ने घड़ी देखी। "स्कूल में। डेढ़ घंटे में छुट्टी है।"
मेरे पैर अपने आप तेज़ हो गए।
राजेंद्र थाने के पीछे वाले कमरे में बैठा था। सामने फ़तेह कुर्सी पर बैठा था, कलाईयों में हथकड़ी, और वो मुस्कुरा रहा था। मुझे देखकर उसकी मुस्कान थोड़ी और बढ़ी।
"आ गए," उसने कहा। "मैं जानता था तुम आओगे।"
मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। मेरा हाथ अपने आप उसका गला पकड़ने के लिए उठा, पर सुमन ने बीच में हाथ डाल दिया। वो दरवाज़े पर खड़ी थी, सफ़ेद कोट में, हाथ में छोटी नोटबुक।
"मन्नू, रुक जाओ।" उसकी आवाज़ सपाट थी। "पुलिस के सामने नहीं। एक भी निशान पड़ा तो केस कमज़ोर हो जाएगा, और ये आदमी बच जाएगा।"
"ये बच्चों को ज़हर देता है—"
"मैं जानती हूँ।" सुमन ने मेरा हाथ नीचे किया। "इसीलिए तो ये ज़िंदा चाहिए। मरा हुआ काम नहीं आएगा।"
राजेंद्र उठ खड़ा हुआ। उसने सिगरेट बुझाई और कुर्सी की पीठ पर टेक लगाकर खड़ा हो गया।
"डॉक्टर साहिबा ठीक कह रही हैं।" उसने फ़तेह की तरफ़ देखा। "अब तू बोल, या मैं तेरे वकील को बुलाऊँ जो तेरे साथ तहसील के बाहर खड़ा था?"
फ़तेह ने कुछ नहीं कहा। पर उसका मुँह थोड़ा सिकुड़ा।
राजेंद्र कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठा। मेज़ पर एक रजिस्टर रखा और कलम उठाई।
"तेरा नाम?"
"फ़तेह मोहम्मद।"
"काम?"
फ़तेह ने नज़रें चुराईं। "भवानी साहब के यहाँ… बाहरी काम।"
"बाहरी काम मतलब?"
"जो कहा जाए, वो।"
राजेंद्र ने कलम रोकी। "कल रात वार्ड दो में तू क्यों गया था?"
फ़तेह ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वापस राजेंद्र की तरफ़।
"फ़ॉर्म पर अँगूठा लगवाने।"
"किसका?"
"बच्चे का।" उसने बिना झिझक कहा।
सुमन ने कदम बढ़ाया। "क्यों?"
"ताकि वो हमारे होम में भेजा जा सके।" फ़तेह ने कंधे उचकाए। "बच्चा बीमार था। हमारे होम में उसका इलाज होता।"
"इलाज?" सुमन की आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं सुना। "तुमने उसके मुँह में वो दवा डाली जो बड़ों के लिए है। चार बच्चे इस हफ़्ते। दो मर गए। इसे इलाज कहते हो?"
फ़तेह चुप रहा।
राजेंद्र ने मेज़ पर झुककर पूछा, "किसने भेजा?"
"पैसे मिले थे।"
"किसने दिए?"
"भवानी साहब के आदमी ने।"
"नाम?"
"नहीं पता। मैं उन्हें नाम से नहीं जानता। वो कहकर जाते हैं, मैं कर देता हूँ।"
मैंने आगे बढ़कर पूछा, "पीली अँगूठी वाला कौन है?"
फ़तेह की भौंहें हल्की सी उठीं। वो मेरी तरफ़ देखने लगा, जैसे मैंने वो नाम लिया हो जो उसे नहीं लेना चाहिए था।
"कौन?"
"जो तेरे साथ गाड़ी में बैठता है। जो सफ़ेद गाड़ी चलाता है। जिसकी उँगली पर पीली अँगूठी है।"
फ़तेह का चेहरा थोड़ा सख़्त हुआ, फिर वापस वही मुस्कान।
"वो मेरा आदमी नहीं है। वो ऊपर से आता है।"
"ऊपर से मतलब?"
"मतलब मुझे नहीं पता।" फ़तेह ने कंधे उचकाए। "मैं सिर्फ़ गाड़ी में बैठता हूँ। कहाँ जाना है, वो बताते हैं। कब आना है, वो बताते हैं। नाम कभी नहीं बताते।"
राजेंद्र ने कलम रखी और पास खड़े सिपाही को इशारा किया। सिपाही ने फ़तेह की जेब से कुछ निकालना शुरू किया — एक रूमाल, चार सौ के नोट, एक छोटी काँच की शीशी, और एक मुड़ी हुई तस्वीर।
राजेंद्र ने तस्वीर ली और खोली। उसने देखा, और उसका चेहरा बदल गया।
"ये…" उसने तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाई।
मैंने लिया। पुरानी तस्वीर थी — फीकी, किनारों से टूटी। उसमें तीन आदमी खड़े थे। बीच में भवानी, आधा जवान, बाल कम, और बगल में एक लंबा आदमी जिसका चेहरा आधा साये में था, पर उसके दाहिने हाथ में पीली अँगूठी साफ़ दिख रही थी। और तीसरे कोने पर एक और आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ते में, हाथ जोड़े — वो खुद फ़तेह था, जवान, दुबला।
तस्वीर के पीछे पेंसिल से लिखा था — "बापू के जाने वाले दिन।"
मेरा हाथ रुक गया।
"ये तस्वीर मुझे पहले भी मिली थी," मैंने कहा। "सफ़ेद गाड़ी की छत पर।"
बंसी ने मेरे कंधे के ऊपर से देखा। "वही तस्वीर?"
"वही।" मैंने तस्वीर राजेंद्र को लौटाई। "पर उस पर ये फ़तेह नहीं था। उस पर सिर्फ़ दो आदमी थे।"
फ़तेह ने पहली बार अपनी आवाज़ में कुछ बदला। "इस तस्वीर में मैं सोलह साल का था। उस दिन मुझे भवानी साहब के यहाँ पहली बार बुलाया गया था।"
"क्यों?" राजेंद्र ने पूछा।
"बापू जा रहे थे।" फ़तेह ने धीरे से कहा। "और उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया। मुझे नहीं पता क्या हुआ, पर उनके जाने के बाद भवानी साहब… अलग हो गए।"
सुमन ने आगे कदम बढ़ाया। "बापू कौन थे?"
फ़तेह ने उसकी तरफ़ देखा। "जानते नहीं? जिसका टोकन है, वो बापू का ही तो है।"
कमरे में एक पल के लिए सब चुप हो गए।
राजेंद्र ने कुर्सी की पीठ पकड़ी। "साफ़ बोल।"
फ़तेह ने साँस ली। "बापू भवानी साहब के बाप के साथी थे। टोकन वो बनाते थे। जब भी किसी को टोकन चाहिए होता था, वो बापू के पास जाते थे। भवानी साहब का असली टोकन बापू ने ही दिया था।"
मेरी जेब में टोकन ठंडा था।
मैंने फ़तेह की तरफ़ देखा। "और बापू अब कहाँ हैं?"
"जाने के बाद कोई नहीं जानता।" फ़तेह ने कहा। "पर जो पीली अँगूठी वाला है, वो खुद को बापू का बेटा बताता है।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। राजेंद्र ने कलम उठाई और सिपाही को इशारा किया।
"इसे हिरासत में ले जाओ," उसने कहा। "और ये सब जो इसने अभी कहा, सब रिकॉर्ड पर लिखो।"
सिपाही फ़तेह को खींचकर उठाने लगे। फ़तेह उठा, पर जाते-जाते रुका और मेरी तरफ़ मुड़ा।
"तुम्हें पता है," उसने कहा, "टोकन का हिसाब पूरा करने के लिए तुम्हें बापू से मिलना पड़ेगा। और बापू…" वो हँसा। "बापू से मिलने का मतलब है कि तुम अपना हिसाब खो दो।"
राजेंद्र ने उसे धकेला। "ले जाओ।"
फ़तेह बाहर ले जाया गया। दरवाज़ा बंद हुआ।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये बापू का नाम पहली बार नहीं आया। कल रात शालिनी ने भी बताया था — उस आदमी की जेब से 'बापू' नाम की फ़ाइल गिरी थी।"
"मैं जानता हूँ।" मैंने अपना सिर खुजाया। "और अब ये भी पता चला कि वो टोकन बनाता था।"
राजेंद्र ने कुर्सी खींचकर बैठा। "इसका मतलब ये है कि भवानी का टोकन बापू का बनाया हुआ है, और मन्नू का भी। दोनों एक ही हाथ से।"
"और एक ही हिसाब से," बंसी ने कहा, जो अब तक चुप खड़ा था। "यही तो दादा ने छिपाया था।"
मैंने घड़ी देखी। साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
"मुझे स्कूल जाना है।"
सुमन ने मेरा रास्ता रोका। "पहले फ़ोन कर।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर तू वहाँ पहुँचा और गाड़ी वाला तुझे देखकर भागा, तो रीना वहाँ अकेली रह जाएगी।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पहले उसे बता कि स्कूल के अंदर रहे, बाहर न निकले, और जो भी हो, किसी अजनबी से बात न करे।"
मैंने मोबाइल निकाला। हाथ काँप रहे थे। नंबर मिलाया।
दो घंटी बजीं। तीसरी पर आवाज़ आई।
"भाई?"
रीना की आवाज़ सामान्य थी। पर हल्की सी हड़बड़ी थी उसमें।
"रीना, सुन—"
"भाई, तू ठीक है न?" उसने पूछा। "मैंने सुना कल रात अस्पताल में कुछ हुआ। काकी का फ़ोन आया था—"
"मैं ठीक हूँ।" मैंने साँस रोकी। "तू सुन। स्कूल के अंदर है?"
"हाँ। क्लास में। पर भाई—"
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