The Token System – Chapter 778
एक अनजान नंबर। मैसेज एक ही था।
रघुवीर नर्सिंग होम की कोठरी में बंद है। रात बारह बजे पिछले दरवाज़े पर आ। अकेला।
मैंने बंसी को दिखाया। बंसी ने पढ़ा और होंठ काट लिए। “अकेला? जिस आदमी ने तेरे सिर पर लाठी मारी, वो अकेले बुला रहा है?”
“नंबर अनजाना है,” मैंने कहा।
“वही तो,” बंसी ने कहा। “रामदीन ने आज ही कहा — जो चीज़ भवानी तक न पहुँचे। और उसी शाम कोई कह रहा है कोठरी खुली है। होम भवानी का है, पर आज कल उसके आदमी उसे ही ढूँढ रहे हैं। कुछ तो हिल रहा है।”
मैंने एक पल सोचा। “अगर रघुवीर सच में वहाँ है, तो हमें जाना चाहिए।”
“जाएँगे,” बंसी ने कहा। “पर अकेले नहीं। मैं अपने भतीजे को बुला लूँगा, और मोहल्ले के दो आदमी — जो रात में शटर के नीचे चुपचाप आ सकें। रास्ते में जगह-जगह खड़े रहेंगे। अगर बारह बजे के बाद आधा घंटा बाहर से कोई ख़बर न मिले, तो वो राजेंद्र को फोन कर देंगे।”
“ठीक है,” मैंने कहा। “मैं माँ के पास जाता हूँ। अभी सुमन को भी ये नहीं बताना।”
“मैंने भी किसी को नहीं बताना,” बंसी ने कहा।
मैं माँ के पास गया। वो आँखें बंद किए लेटी थीं, पर साँसें सुनकर लगा वो सो नहीं रही थीं। मैं बिना आवाज़ किए बैठ गया। पाँच मिनट बाद माँ ने आँखें खोलीं।
“जा रहा है?”
“कुछ काम है माँ,” मैंने कहा। “आधी रात तक लौट आऊँगा।”
“मेरे बारे में मत सोच,” माँ ने कहा। “बस आँखें खुली रख।”
“किसलिए?”
“क्योंकि जो आदमी चीज़ बनाता है,” माँ ने धीरे से कहा, “वो उससे जाता है। और जो चीज़ को सहलाता है, वो ख़ाली हाथ लौटता है। तू ख़ाली हाथ लौटना, बस मुझे ज़िंदा पाना।”
मैंने उनका हाथ दबाया। फिर उठकर बाहर आ गया।
रात साढ़े ग्यारह बजे मैं और बंसी अस्पताल की पिछली दीवार से चले। मैंने पुराना काला कुर्ता पहना था और सिर पर गमछा बाँधा था। बंसी ने अपने भतीजे को मोहल्ले के मोड़ पर खड़ा कर दिया था, और उसके साथ दो आदमी — एक पहलवान जैसा मोटा, दूसरा लंबा दुबला — जो रामगंज की गलियों में चाय का काम करते थे और बंसी के बिना किसी के लिए हाथ नहीं उठाते थे।
रास्ते में बंसी ने मुझसे कहा, “एक बात पक्की। अंदर घुसते ही अगर मैं ‘चाय’ कहूँ, तो तू भागना।”
“और तू?”
“मैं पीछे से भागूँगा,” बंसी हँसा। “और अगर मैं ‘कड़क’ कहूँ, तो तू रुक जाना, वहाँ कुछ मिला है।”
“अरे, तूने तो पूरी योजना बना दी,” मैंने कहा।
“चाय की दुकान पर बैठकर बारह साल से यही प्लान बना रहा हूँ,” बंसी ने कहा। “बस अब तक कोई फ़िल्म में नहीं दिखाया।”
हम होम के पिछले हिस्से में पहुँचे तो सड़क सुनसान थी। एक कुत्ता दूर किसी डिब्बे को सूँघ रहा था। दरवाज़ा — लोहे का, जिस पर जंग के धब्बे थे — पूरा खुला हुआ था। हवा के साथ हल्की-हल्की आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई भीतर बंद कमरे में साँस ले रहा हो।
बंसी ने मेरी कमीज़ पकड़ी। “तेरे मोबाइल में ये मैसेज किसने भेजा, ये तो पक्का नहीं?”
“नहीं,” मैंने कहा।
“तो चल,” बंसी ने कहा। “पर मेरी एक आदत है — जब भी कोई कहे कि सब ठीक है, मैं पहले चारों तरफ़ देखता हूँ।”
हम अंदर घुसे। बरामदा खाली था। दीवारों पर पुराने पोस्टर टंगे थे, जिनके कोने मुड़े हुए थे। एक बल्ब जल रहा था, जो झूल रहा था। नीचे की ओर सीढ़ियाँ जाती थीं, पर वहाँ अंधेरा था।
“कोठरी कहाँ है?” मैंने फुसफुसाया।
“यहीं कहीं,” बंसी ने कहा।
हम आगे बढ़े। दस कदम के बाद मुझे कुछ सुनाई दिया — धीमी सी खाँसी। फिर एक आवाज़, जिसमें दर्द था। “पानी…”
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। हम उस तरफ़ बढ़े। बरामदे के आख़िर में एक छोटी कोठरी थी, जिसका दरवाज़ा लोहे की सांकल से बाहर से बंद था। सांकल खुली पड़ी थी, पर दरवाज़ा ऊपर से टेका हुआ था।
मैंने दरवाज़ा खींचा। अंदर कुछ सफ़ेद था — कोई कपड़ा, जो धूल में पड़ा था। मैंने झुककर उठाया।
वो रघुवीर की सफ़ेद कुर्ता थी। पर कुर्ता खाली था। अंदर कोई नहीं था।
पल भर को मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। बंसी ने कोठरी में झाँका, फिर पीछे मुड़ा। “मन्नू, ये जाल है। बाहर चल।”
हम जैसे ही बाहर की तरफ़ बढ़े, पीछे से तेज़ रोशनी आँखों में आ टकराई। गाड़ी की हेडलाइट — सफ़ेद, तेज़। मैंने हाथ आँखों पर रखा। बंसी ने मुझे अपने पीछे खींच लिया।
रोशनी में एक आदमी खड़ा था। लंबा, चौड़ा, पर आज उसके कंधे झुके थे। हाथ ख़ाली थे। मैंने उसकी शक्ल पहचानी — भवानी।
उसके पीछे गाड़ी थी, जिसका दरवाज़ा खुला था। गाड़ी में कोई नहीं था। वो अकेला था।
बंसी ने कसम खाई। “ये क्या तमाशा है?”
भवानी ने दो कदम आगे बढ़े। उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था — मोटा, पीला, जिसके कोने फटे थे। उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, “तू आ गया। अच्छा किया।”
“रघुवीर कहाँ है?” मैंने पूछा।
“रघुवीर कहीं नहीं है,” भवानी ने कहा। “मैंने उसे सुबह ही छोड़ दिया था। वो अब मेरे किसी काम का नहीं।”
“तो मुझे किसने मैसेज भेजा?”
“मैंने,” भवानी ने कहा।
बंसी ने मेरे कान में कहा, “ये बात गड़बड़ है। चल।”
पर मैं रुका। भवानी के चेहरे पर वो ठाकुर वाली अकड़ नहीं थी। आज उसकी आवाज़ में कुछ और था — थकान। मैंने उससे कहा, “तो बोल, क्या कहना है?”
भवानी ने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया। “इसमें मेरी तिजोरी का सारा हिसाब है। तू इसे अदालत में ले जा।”
मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। “और बदले में?”
“बदले में मैं तुझे रीना की शादी का पूरा खर्च दे दूँगा, और हवेली का पाँचवाँ हिस्सा भी। जो तेरा हक़ है — चौथे के बाद पाँचवाँ। तेरे पापा का हिस्सा मैंने कभी नहीं मिटाया।”
“पर एक बात माननी होगी?”
“रामदीन की गवाही मत लगवा,” भवानी ने कहा।
मैंने देखा, बंसी की मुट्ठी कस गई। मैंने भवानी की आँखों में देखा। “क्यों?”
भवानी ने लिफ़ाफ़ा नीचे किया। “क्योंकि अगर वो अदालत में बोला, तो सब जान जाएँगे कि मैं उसका बेटा हूँ। और मेरा बीस साल का नाम एक रात में मिट जाएगा। मैं तेरे बाप का क़ातिल नहीं हूँ, मन्नू। पर मैं उस रात गाड़ी में बैठा था। और उस रात के बाद जो कुछ हुआ, वो मेरे बाप ने किया — मैंने नहीं। अब वो ज़िंदा है और मुझसे कह रहा है कि हिसाब उतार। मैं उतारने को तैयार हूँ। पर बेटे की तरह नहीं — सिर्फ़ हिसाब की तरह।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “मन्नू, दो मिनट रुक। मैं इस आदमी की एक बात भी नहीं मानता।”
मैंने भवानी से कहा, “तूने रीना को डराया। तूने माँ को उठाया। तूने रघुवीर को बंद किया। और अब तू हिसाब देने आया है?”
“माँ तेरी ठीक है,” भवानी ने कहा। “उसे मैंने नहीं उठाया था। उसे उठाया उस आदमी ने जिसे तू अभी तक नहीं जानता। और वो आदमी मेरी भी नहीं सुनता।”
“कौन?”
भवानी ने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। “इसे ले। अंदर तीन नाम हैं, जो मेरे हिसाब में नहीं, उसके हिसाब में हैं। बापू का नाम पहला है। मैं तुझे उसका पता भी दे दूँगा। बस एक बात — रामदीन को उस कुर्सी पर मत बैठाना। वो बैठा, तो हिसाब फिर उसके हाथ में चला जाएगा, और मैं तेरे साथ खड़ा नहीं रहूँगा।”
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। “मन्नू, ये आदमी आज तक किसी से सीधी बात नहीं करता। ये कुछ चाहता है।”
मैंने भवानी से कहा, “तू मुझे ये सब क्यों दे रहा है? तेरे पास चार आदमी हैं, गाड़ियाँ हैं, वकील हैं।”
भवानी ने एक पल आसमान की तरफ़ देखा। “क्योंकि आज सुबह मेरे होम में जो काग़ज़ मिला, उसमें मेरा ही नाम कटा हुआ था। जिस हिसाब को मैं बीस साल से अपना समझ रहा था, वो मेरा कभी था ही नहीं। मैं सिर्फ़ उसका पहरा हूँ। और आज वो पहरा ख़त्म हो रहा है।”
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