The Token System – Chapter 741
"तू राघव को ढूँढ रहा है?" उसने पूछा। आवाज़ धीमी और भारी थी।
"तुम कौन हो?"
"मैं वही हूँ जिसके नाम की चिट्ठी तू आठ साल से जेब में रखे फिर रहा है।" उसने झोले से एक और लिफ़ाफ़ा निकाला। "रामदीन।"
मैं उठ खड़ा हुआ। टोकन जेब में धक-धक कर रहा था। जाड़े में भी पसीना आ रहा था।
"तो तुमने मेरे सिर पर वार करवाया?"
"मैंने कहा था — डरा दो।" उसने कंधे उचकाए। "मेरा भतीजा बेवकूफ़ है। नाप-तौल नहीं जानता।"
"तुम्हारा भतीजा?"
"मीरा का बेटा।" उसने कदम बढ़ाया। "तू सोचता है मैं भवानी का आदमी हूँ? नहीं। भवानी मेरा आदमी है। बस वो जानता नहीं। वो सोचता है मैं उसके बाप का नौकर हूँ।" उसने अँगूठी को घुमाया। "मैं उसका बाप हूँ।"
सड़क पर एक बैलगाड़ी गुज़री। घंटियाँ बजीं। मैंने उस आदमी की आँखों में देखा — छोटी, भूरी, बिना किसी डर की।
"भवानी का बाप तो मरा —"
"मरा दिखाया। मैं श्मशान में नहीं था। मैं यहाँ था।" उसने पीपल की तरफ़ इशारा किया। "जब मेरा बेटा हवेली में घुसा और सबको लगा वो मर गया, मैं बाहर खड़ा था। तब से मैं काग़ज़ों के पीछे रहा। मेरे नाम का एक भी काग़ज़ किसी अदालत तक नहीं पहुँचा। मैंने अपने बेटे का नाम हरि सिंह रखवा दिया — और हरि सिंह का बेटा भवानी बन गया।"
"तो भवानी तुम्हारा…"
"बेटा नहीं।" उसने नाक सिकोड़ी। "मेरा बेटा कोई और था। भवानी मेरा पोता है — हरि सिंह की तरह।" उसने रुककर देखा। "तू सोच रहा हैगा — ये सब क्यों बता रहा हूँ? बता रहा हूँ क्योंकि तेरा बाप आज ज़िंदा है और मैं चाहता हूँ वो जान ले — जो उसने खोया, वो उसका नहीं था।"
"मेरे पापा ने क्या खोया?"
"जो तेरे हाथ में है।" उसने टोकन की तरफ़ इशारा किया। "वो टोकन उसका नहीं। वो मेरी माँ का था — कौशल्या के हाथ से निकला। मैंने पचास साल उसे ढूँढा। और अब वो तेरी जेब में है।"
"तो ले लेना।" मैंने कहा। "आज़मा लो।"
रामदीन हँसा। खोखली-सी हँसी। "तू समझता है मैं छीनने आया हूँ? नहीं। मैं आया हूँ तुझे बताने — तेरा खाता अब मेरे पास नहीं चलेगा। तेरे पास टोकन है, पर हिसाब तेरा नहीं।" उसने झोले से एक काग़ज़ निकाला। "ये ले। मेरी माँ की लिखाई। जो मैंने चालीस साल पहले उठाया था, तेरे बाप के हवाले करने से पहले। इसमें लिखा है — खाता किसी का नहीं होता। खाता ख़ुद एक आदमी है।"
काग़ज़ मेरे हाथ में आया। एक ही पंक्ति थी, कोयले से लिखी — "हिसाब। रुका।"
"अब मैं जा रहा हूँ," रामदीन ने कहा। "अदालत में तेरे बाप का बयान होगा। मैं वहाँ नहीं आऊँगा। उसके बाद तू पत्थर उठाना।" वो मुड़ा। "और सुन — भवानी से कहना, उसका बेटा बच गया। पर उसका पोता नहीं बचेगा।"
वो पीपल के पीछे से गायब हो गया, जैसे कभी आया ही न हो। मैं सड़क पर अकेला खड़ा रहा। जेब में टोकन, हाथ में काग़ज़, और सिर में रामदीन की आवाज़।
टोकन जेब में ठंडा हो गया। मैंने निकाला। नया शब्द उभरा था — सोमवार।
मैंने आसमान देखा। आज मंगलवार था। सोमवार मतलब अगले छह दिन। छह दिन का इंतज़ार, जबकि पापा आज बयान दे रहे थे।
और तभी फोन बजा। रघुवीर।
"मन्नू, बसवा से ख़बर आई है।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "पापा का बयान कल नहीं — आज ही हो गया। जज ने बसवा भेजा। पर…"
"पर क्या?"
"पर बसवा में मोहन नहीं मिले। कमरा खाली था। बिस्तर पर सिर्फ़ एक पर्ची थी।"
"क्या लिखा था?"
रघुवीर ने साँस ली। "लिखा था — 'मैं अपना हिसाब ख़ुद चुकाऊँगा। मुझे मत ढूँढो। — मोहन।'"
फोन जेब में रखा तो मेरे हाथ काँप रहे थे। टोकन गरम हो गया — अचानक, ज़ोर से। मैंने उसे जेब से निकाला। उस पर एक लंबा वाक्य उभर रहा था, अक्षर-अक्षर, जैसे कोई भीतर से लिख रहा हो।
"अब खाता तेरा नहीं। अब खाता उसका है जिसने ख़ुद को मिटाया।"
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। रामदीन जा चुका था। पर उसकी जगह, पेड़ के नीचे, एक और चीज़ पड़ी थी। मैंने उठाई — पीतल का एक और टुकड़ा। छोटा, तिकोना, और उस पर उभरा हुआ — "तीन का बेटा।"
मैं वहीं बैठ गया।
अब तीन हिस्से थे — सीधा टोकन, उलटा टुकड़ा, और ये तिकोना। तीनों अलग-अलग, पर एक ही धातु के। और जब मैंने तीनों को हाथ में लिया, तो टोकन ज़ोर से चमका — एक पल के लिए — और फिर बुझ गया।
टोकन पर नया शब्द उभरा — "पूरा।"
और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, एक नाम — राघव।
मैंने पर्ची निकाली जो लिफ़ाफ़े में थी। "जो हिसाब तेरे हाथ में है, वो तेरा नहीं। वो उसका है जो पहले पत्थर के नीचे है। और वो आज तक ज़िंदा नहीं हुआ।"
राघव। पहले पत्थर के नीचे। ज़िंदा नहीं हुआ।
मैंने फोन उठाया। बंसी का नंबर।
"बंसी," मैंने कहा, "मुझे तीन लोग चाहिए — तू, रघुवीर, और किशोरी लाल। और हाँ, माँ को भी ले आना।"
"कहाँ?"
"हवेली। पहले पत्थर के सामने। आज रात।"
"मन्नू — आज रात? पर जज ने सील…"
"सील हिसाब पर नहीं लगी," मैंने कहा। "सिर्फ़ काग़ज़ पर लगी है। और आज रात हिसाब खुलेगा। पहला पत्थर आज उठेगा।"
मैंने फोन काटा और सड़क की तरफ़ देखा। दूर, धूल में, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। सफ़ेद गाड़ी। अभी आई थी। मेरी तरफ़ देख रही थी।
मैं हँसा।
"अच्छा," मैंने कहा। "तो तुम भी आ गए।"
मैंने टोकन जेब में रखा और सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ चल पड़ा — न डरकर, न भागकर, बस अपना हिसाब पूरा करने।
॥
सफ़ेद गाड़ी के पास पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था और अंदर कोई नहीं था। इंजन बंद। सीट पर सिर्फ़ धूल और एक पीली पर्ची — “अंदर आ जा।”
मैं पलटा। मेरे पीछे, सड़क के उस पार, अस्पताल का दीवाला और उसके सहारे खड़ा शेखर बाबू — चश्मा हाथ में, आँखें लाल।
“तू?” मैंने कहा।
“मैं गाड़ी में नहीं था,” उसने हाथ उठा दिए। “मैं बस यहाँ खड़ा था। देख रहा था तू आता है या नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे पता है तू मुझे ढूँढ रहा है। और मुझे भी तुझसे बात करनी है।”
मैंने उसे अस्पताल के पीछे वाले चाय के कमरे में बैठाया। कुर्सी पर वो ऐसे बैठा जैसे घर में आग लगी हो और वो बाहर बैठकर सोच रहा हो कि अब क्या जलाए।
“सुन, शेखर बाबू,” मैंने सामने बैठकर कहा, “तेरे पास दो रास्ते हैं। एक — तू अदालत में गवाही देता है। दूसरा — तेरे भतीजे ने मेरे सिर पर वार किया, तेरा नाम काग़ज़ पर है, पुलिस रिपोर्ट होती है, और तू आरोपी बनता है।”
“मेरी बेटी की शादी है,” वो फुसफुसाया।
“मुझे पता है। इसीलिए तुझे बुलाया है।”
“भवानी ने कहा है — गवाही दी तो शादी तोड़ दूँगा।”
“भवानी तिजोरी सील हो चुकी है। उसके आदमी कल तहसील में पकड़े गए। वो अभी ख़ुद अपने बचाव में लगा है।” मैंने आगे झुककर कहा, “गवाही दे। तेरी बेटी की शादी दो दिन में हो जाएगी — बिना किसी के काग़ज़ के, बिना भवानी की मुहर के। और रामदीन का नाम भी साफ़ हो जाएगा।”
शेखर बाबू ने चश्मा पोंछा। फिर रख दिया। फिर उठाकर पोंछा।
“मेरा नाम मत लगवाना,” उसकी आवाज़ टूटी। “मैं बीस साल उस आदमी के पैर पकड़ता रहा। मेरी बेटी के स्कूल की फीस उसी के पैसे से दी। मैं आरोपी बनूँ, तो वो लड़की किस मुँह से स्कूल जाएगी?”
“नाम तो तब भी लगेगा।” मैंने उसकी आँख में देखा। “फ़र्क़ यह है कि तब तू आरोपी होगा, अब गवाह। आरोपी की बेटी से कोई शादी नहीं करता। गवाह की बेटी के लिए ख़ुद भवानी के दरवाज़े से लोग आएँगे।”
वो देर तक चुप बैठा। फिर बोला, “दो दिन। मुझे दो दिन दे। मैं अपनी बेटी से बात करूँ, उसकी मौसी से बात करूँ। दो दिन बाद जो तू कहेगा, वो लिख दूँगा।”
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