The Token System – Chapter 714
कमरे में बैठे सब चुप हो गए। रीना दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ में चाय की ट्रे, ट्रे काँप रही थी।
रघुवीर ने फोटो फिर निकाली और मुझे दी।
“रख ले,” उसने कहा। “ये फोटो अब तेरे पास रहेगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे बाप की डायरी में लिखा है,” रघुवीर ने कहा, “‘ये फोटो उसी को देना जो हिसाब पूरा करे।’”
मैंने फोटो ली। कोयले की लिखाई देखी — “हिसाब तीन भाई का, बाँटेगा चौथा — सुखदेव।”
और मेरी उँगली जब फोटो के किनारे पर घूमी तो टोकन जेब में गुनगुना हो गया — और मैंने पहली बार महसूस किया कि ये फोटो टोकन के बहुत करीब है, जैसे दोनों एक ही जगह से आए हों।
रघुवीर ने लाठी उठाई और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा।
“सुबह आठ बजे,” उसने कहा। “अदालत के पिछले दरवाज़े पर। सबको लेकर आ। किशोरी लाल को भी।”
“वो आएगा क्यों?” मैंने पूछा।
रघुवीर ने दरवाज़े से पहले मुड़कर देखा।
“क्योंकि,” उसने कहा, “वो बीस साल से अपने साथी का हिसाब नहीं चुका पाया। और अब जब उसे पता चलेगा कि हिसाब चौथा बाँटने वाला आ गया है — वो ख़ुद आएगा।”
वो गया।
मैंने दरवाज़ा बंद किया। माँ चारपाई पर लेट गईं, आँखें खुली रखे हुए।
“माँ,” मैंने कहा, “तूने पहले क्यों नहीं बताया कि पापा का भाई ज़िंदा है?”
“क्योंकि पापा ने कहा था — बताना तब, जब वो खुद सामने आए।” माँ ने कहा। “आज सामने आ गया।”
रामदीन रसोई में चला गया, चाय बनाने। बंसी ने गिलास उठाया और एक घूँट में पी लिया।
“मन्नू,” उसने कहा, “कल अदालत में मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा। पर सुबह इससे पहले मुझे अपने ससुर की कब्र पर जाना है। एक बात पूछनी है।”
“ससुर ज़िंदा हैं?”
“कब्र पर जाकर पूछूँगा,” बंसी ने कहा।
मैंने फोटो को मेज़ पर रखा। लैंप उस पर पड़ रहा था। तीन आदमी — बीच वाला, दायाँ वाला दादा, बायाँ वाला चश्मे वाला।
मैंने उँगली बाएँ वाले पर रखी।
“ये किशोरी लाल है?”
रामदीन ने चाय का गिलास लाकर रखा।
“हाँ,” उसने कहा। “ये ही वो आदमी है जिसने मेरी बाईं टाँग नहीं, बाईं आँख की नज़र छीनी थी।”
और टोकन जेब में गरम हो गया। मैंने उसे बाहर निकाला। सत्रहवीं लकीर पूरी हो चुकी थी। और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक नई लकीर उभर रही थी — अठारहवीं — और उसके साथ दो शब्द, बहुत ही हल्के, जैसे पानी पर तेल की बूँद —
“सुबह। जल्दी।”
मैंने टोकन मेज़ पर रख दिया। बाहर गली में सफ़ेद गाड़ी अभी भी खड़ी थी, पर अब उसकी लाइट बुझ चुकी थी। और अंधेरे में एक आदमी उस गाड़ी की छत पर हाथ रखकर खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, लाठी, बूढ़ा — जो शायद मन्नू के सामने कभी न आएगा, पर उस रात पहली बार मन्नू ने उसे देखा।
उसने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। बैठा। गाड़ी चली गई।
और मैंने फोटो को जेब में रखा, टोकन को दूसरी जेब में, और पहली बार सोचा कि कल अदालत में जो खुलेगा, वो हिसाब नहीं होगा — वो एक आदमी का चेहरा होगा, जिसे बीस साल से सबने मरा समझा है।
॥
सुबह सात बजे मैं हरीश चंद्र के दफ़्तार के बाहर खड़ा था, और रघुवीर पहले से वहाँ था — सफ़ेद कुर्ता, लाठी, आँखों में वो नींद जो रातभर नहीं आई थी।
“तेरे पापा की घड़ी चल रही है?” उसने पूछा।
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे बाप ने कहा था — जब घड़ी चले, तब हिसाब का वक़्त आता है।”
हरीश चंद्र ने दरवाज़ा खोला। दफ़्तार में काग़ज़ों की महक थी और एक कोने में चाय ठंडी पड़ी थी।
“बैठो,” हरीश चंद्र ने कहा। “मैंने रातभर तुम्हारी फ़ाइल पढ़ी है, रघुवीर। मुझे सच जानना है — पूरा, बिना घुमाए।”
रघुवीर बैठा। उसने लाठी टेबल के सहारे खड़ी की और दोनों हाथ गोद में रख लिए।
“मेरा बाप भगवान सिंह,” उसने शुरू किया, “हवेली के चार हिस्सों में से एक का हक़दार था। हरि सिंह उसका छोटा भाई था — पर हिसाब में बड़ा।”
“कैसे?”
“हरि सिंह ने हमारे बाप के दस्तख़त एक काग़ज़ पर उठवा लिए — कहा कि हवेली के काग़ज़ हैं, बस निशान लगाने हैं। बाप ने निशान लगा दिए। निशान वाला काग़ज़ तहसील में जमा हो गया, और जब बाप को पता चला तो वो हरि सिंह के पास गया।”
“फिर?”
“फिर हरि सिंह ने उसे शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।” रघुवीर की आवाज़ सपाट थी, जैसे ये बात वो सौ बार दोहरा चुका हो अपने आप से। “धमकी, पैसा, और एक रात गाड़ी। बस।”
हरीश चंद्र ने चश्मा उतारा और पोंछा।
“रघुवीर,” उसने कहा, “तुम्हारा दावा सच्चा लगता है। मैं झूठ नहीं कहूँगा — मुझे भी लगता है कि हरि सिंह ने तुम्हारे बाप के साथ खोट किया। पर अदालत में सिर्फ़ ज़ुबानी बात नहीं चलती। जज साहब पूछेंगे — काग़ज़ कहाँ है?”
रघुवीर का चेहरा उतर गया। फिर उसने मेज़ पर हाथ मारा, इतनी ज़ोर से कि हरीश चंद्र का चश्मा हिल गया।
“मेरे बाप ने मरने से पहले मुझे बताया था,” वो बोला, “कि हवेली की उत्तर वाली दीवार में एक रजिस्टर छिपा है — जिसमें तीनों हिस्सों का हिसाब लिखा है, हरि सिंह की अपनी लिखाई में। बाप ने कहा था — जब हिसाब का वक़्त आए, वही रजिस्टर बोलेगा।”
मैं खड़ा हो गया।
“रुक,” मैंने कहा। “वही रजिस्टर तो कल अदालत में खुला है। उत्तर वाली दीवार के नीचे, छिपे कमरे से।”
रघुवीर मेरी तरफ़ देखने लगा।
“खुला?”
“खुला। पढ़ा गया। हरि सिंह की लिखाई मिली — साफ़ शब्दों में।”
रघुवीर की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया, खाँसा, फिर सीधा हरीश चंद्र की तरफ़ देखा।
“तो फिर देर किस बात की?” उसने कहा। “मुझे गवाह बनाओ।”
हरीश चंद्र ने काग़ज़ निकाला और कलम उठाई। लिखते-लिखते रुका।
“एक बात पहले साफ़ कर लूँ,” उसने कहा। “गवाही में तुम्हें ये भी बताना पड़ेगा कि तुम उस रात हवेली में थे। तुम ख़ुद अपने बाप की क़ब्र पर कांटा बन जाओगे।”
“मैं बीस साल से कांटा हूँ,” रघुवीर ने कहा। “अब कम से कम किसी काम का कांटा बनूँगा।”
हरीश चंद्र ने लिखा, काग़ज़ पढ़कर रघुवीर को दिया, और उससे निशान लगवाया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
“मन्नू, तू अपने दादा का काग़ज़ संभालकर रख — जो नींव में मिला था। और माँ का दिया हुआ सब कुछ। कल हर काग़ज़ की ज़रूरत पड़ेगी, एक भी काग़ज़ कम नहीं चलेगा।”
“है सब,” मैंने कहा।
“और एक बात,” हरीश चंद्र ने चश्मा पहनते हुए कहा। “अदालत में किशोरी लाल आएगा — मुझे भनक लग रही है। अगर वो आया, तो उसे बोलने देना। रोकना मत। जो आदमी ख़ुद बोलता है, वो अपने ही जाल में फँसता है।”
बाहर निकले तो धूप तेज़ हो चुकी थी। रघुवीर ने लाठी उठाई और मेरी तरफ़ मुड़ा।
“मन्नू,” उसने कहा, “तेरे दादा ने मेरे बाप को बचाया था — उस रात हवेली से निकालकर। इसलिए मैं तेरे साथ खड़ा हूँ, तेरे पीछे नहीं।”
मैं हँसा।
“अच्छा है,” मैंने कहा। “पीछे खड़े आदमी की परछाईं सबसे पहले गिरती है।”
हम हँसे — पहली बार एक-दूसरे के सामने, बिना किसी हिसाब के।
और तभी सड़क के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी। शीशा नीचे हुआ। अंदर भवानी बैठा था — वही काला कुर्ता, वही ठंडी आँखें, हाथ में चाँदी की सीकली।
“आ गया तू?” भवानी ने कहा, आवाज़ में हल्की हँसी। “मैं सोच रहा था, तेरे बाप की तरह तू भी कहीं मर गया।”
रघुवीर ने लाठी के सहारे कदम बढ़ाया — धीरे, एक-एक करके।
“मरे हुए लोग ज़्यादा सुनते हैं,” उसने कहा। “इसलिए मैं मरने की जल्दी में नहीं हूँ।”
भवानी की हँसी जम गई।
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