The Token System – Chapter 692
"जनाब," भवानी का वकील खड़ा हुआ, "अगर यही बही सही है, तो भी हमें अपना पक्ष रखने का वक़्त चाहिए। हमें बही की जाँच का हक़ है, एक्सपर्ट का हक़ है, और मेरे मुवक्किल के पास एक ही चीज़ माँगी है — तीसरे ताले का सवाल अभी खुला है, और वो उन्हीं के हाथ में है।"
गमछे वाले आदमी ने कुर्सी से उठकर कहा, "चाबी मेरे पास है, वकील साहब। और मैं इसे आपके मुवक्किल को नहीं दूँगा।"
"तुम कौन हो?" वकील चिल्लाया।
वो आदमी सीधा खड़ा रहा। "मेरा नाम किशोरी है। बद्री उमराव मेरे नाना थे। तीसरा हिस्सा — सुखिया — मेरी माँ थी। और ये चाबी मेरी माँ की थी, जो उन्होंने ज़िंदा रहते हुए मुझे दी थी, साथ में एक बात कही थी — 'जिस दिन हवेली खुलेगी, उस दिन इसे खोलना, और मेरा नाम उस बही में जोड़ना।'"
अदालत में एक पल के लिए कोई आवाज़ नहीं थी।
"तो ये चाबी कल से तुम्हारे पास है," जज ने कहा।
"कल से नहीं, जनाब। परसों से। जब हरीश चंद्र ने तहसील में अर्ज़ी डाली, तभी मैंने तय किया कि अदालत में आना है। और जब कल कहा गया कि तीसरे ताले की चाबी किसी के पास है — तो मैंने माँ से किया वादा पूरा किया।"
जज ने हरीश चंद्र से कहा, "तिजोरी खोलने के लिए तीसरी चाबी अदालत को दी जाए, और साथ में जाँच के लिए बही भी। अगली तारीख़ कल सुबह दस बजे। तब तक जो काग़ज़ खुला है, उसकी नकल दोनों पक्षों को दी जाएगी।"
किशोरी ने चाबी उठाकर एक पुलिस वाले के हाथ में रखी, और पीछे मुड़कर भीड़ में अपनी जगह ले ली।
अदालत टूटी।
मैं बाहर निकला तो सूरज आँगन की दीवार पर सरक रहा था। बंसी मेरे पीछे आया, और उसका हाथ मेरी कमर पर था, जैसे कहीं गिरना हो।
"तेरे पापा," उसने धीरे कहा। "तेरे पापा आठ साल से नहीं मरे।"
"नहीं मरे," मैंने कहा। "और अदालत में जो बोला, उसके हिसाब से वो उस रात गाड़ी में बैठे थे — उसी रात जब वो औरत मरी। अब देख, मेरे पास सिर्फ़ एक रास्ता बचा है — उस लिफ़ाफ़े को खोलवाना जो किशोरी लेकर आया।"
बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे गली के कोने पर खींच लिया, जहाँ भीड़ का कोई शोर नहीं था।
"मन्नू," उसने कहा, "मैं तुझे एक बात बताने वाला हूँ, और ये मैंने आज तक किसी को नहीं बताई — न अपनी बीवी को, न तेरे पापा को, न भवानी को।"
"क्या?"
बंसी ने जेब से वो टेढ़ी पुरानी रसीद फिर निकाली, जो अभी अदालत में गई थी — उसकी एक नकल, जो उसने पहले ही करवा रखी थी — और उसे खोलकर मेरे सामने रखा।
"ये रसीद मेरे ससुर ने मुझे नहीं दी थी। ये मेरे घर की उस दीवार के पीछे पड़ी थी, जो मेरे पापा ने बनवाई थी। और उस दीवार के पीछे किसी ने इसे रखा था — ऐसे रखा था कि कोई न देखे, पर कोई मिल जाए तो पढ़े भी।"
"तो?"
"तो ये है कि जिसने इसे छिपाया, उसे पता था कि ये क्या है।" उसने रसीद के किनारे पर उँगली रखी। "और जिसने सुखिया का नाम मिटाया — वो मेरे घर का ही कोई था। बाहर का आदमी नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। बंसी का चेहरा वैसा नहीं था जैसा मैंने अब तक देखा था। घबराया नहीं, ग़ुस्से में नहीं। डरा हुआ नहीं। कुछ ऐसा जो आदमी को उस वक़्त होता है जब वो अपने ही घर की दीवार देखता है और उसमें अपना नाम नहीं पढ़ पाता।
"मेरे पापा," वो बोला। "या मेरे ताऊ। या मेरे ससुर ने ख़ुद अपना नाम मिटाया हो, ये तो मैं नहीं कहता। पर एक बात पक्की है — ये रसीद मेरे घर से आई है, और मेरे घर में इसका रहस्य सिर्फ़ एक और आदमी जानता था।"
"कौन?"
वो एक पल चुप रहा। फिर उसने रसीद मोड़कर जेब में डाली और गली के उस पार देखा, जहाँ भवानी का सफ़ेद वकील अपनी गाड़ी में बैठ रहा था।
"मेरे चाचा," उसने कहा। "जो मेरे सामने आज भी साधु बनकर बैठते हैं।"
मैंने टोकन जेब में हाथ डाला। वो अब भी गरम था — न ज़्यादा, न कम। जैसे कोई आदमी सामने बैठा हो और सिर्फ़ इंतज़ार कर रहा हो कि अगला सवाल कौन पूछता है।
"बंसी," मैंने कहा, "तेरा चाचा वो ही है जिसके घर की छत पर वो पुराने पुल की गली है न?"
"हाँ।"
"तो आज रात वहीं।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो उसका चाय का खोखा खोलते वक़्त होती है — जब वो एक चुटकी बनाने वाला हो।
"आज रात," उसने कहा। "पर एक बात — तू वहाँ अपना टोकन मत निकालना। मेरा चाचा वो चीज़ देखते ही पहचान जाएगा, और उसे पता चल जाएगा कि ये तेरे पास है।"
"कैसे?"
"क्योंकि," बंसी ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ कड़वा था, "मेरे चाचा ने ही मेरे पापा को ये रसीद छिपाने को कहा था। और मेरे ताऊ आज तक ज़िंदा हैं, बसवा से कोई ख़बर नहीं आई।"
किशोरी हमारे पीछे आया। उसने हमें गली के मोड़ पर रोका, और साथ में वो पीतल की चाबी रखने वाला सिपाही भी था।
"मनोहर," किशोरी ने कहा, "मैं तुमसे एक बात कहने आया हूँ। ये चाबी तीसरे ताले की है, पर मेरी माँ ने मुझसे ये भी कहा था — 'जब वो ताले खुलें, तो उस आदमी को ढूँढना जो उन तीनों के बीच में उँगली नहीं डालता। वही हिसाब का असली रखवाला है।'"
"और वो कौन है?"
किशोरी ने एक पल सोचा। "मुझे नाम नहीं पता। पर जब तुम्हारे पापा उस रात कुएँ पर आए, तो उनके साथ एक और आदमी था, जो कुएँ से दूर खड़ा था, और जिसने उस रात बाद में कोई काग़ज़ नहीं छुआ। सिर्फ़ देखा। वही आदमी बीस साल से इंतज़ार कर रहा है।"
"किशोरी भाई," मैंने कहा, "वो काग़ज़ जो आप लाए — 'रामेश्वर के बेटे से पूछो' वाला — क्या उस पर लिखने वाले का हाथ भी है?"
किशोरी ने सिर हिलाया। "हो सकता है। पर वो लिफ़ाफ़ा अभी अदालत के कब्ज़े में है। अगली तारीख़ कल। तब तक केवल एक चीज़ सुरक्षित है —" उसने मेरी तरफ़ झुककर देखा, "तुम्हारा सबूत। और तुम्हारा टोकन। दोनों को यहीं, इसी शहर में रखो। भवानी आज रात कुछ न कुछ करेगा। जब बही अदालत में है, तो उसका सबसे बड़ा डर यही है कि कल कोई नया काग़ज़ न खुल जाए।"
वो चला गया। मैं और बंसी गली में खड़े रहे।
थोड़ी दूर पर एक बूढ़ा आदमी हमें देख रहा था। मैंने पहले उसे देखा नहीं था। सफ़ेद कुर्ता, लंबी दाढ़ी, कंधे पर एक मैला थैला। जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ देखा, वो मुड़कर एक गली में चला गया, और उसकी चाल में वो लंगड़ाहट थी जो आज सुबह अदालत में किशोरी के मुँह से सुनी थी।
"बंसी," मैंने कहा, "अभी वो —"
"देख लिया," बंसी ने कहा। "वो मेरे चाचा नहीं, वो कोई और है। पर उस थैले पर एक निशान था — जो मैंने कहीं देखा है।"
"कहाँ?"
बंसी ने जेब से वो टेढ़ी रसीद फिर निकाली और उसे खोलकर मेरी तरफ़ किया। इस बार उसकी उँगली रसीद के कोने पर गई, जहाँ एक बहुत छोटा सा, फीका, मिटा हुआ निशान था — एक दरवाज़े जैसी शक्ल, जिसके ऊपर एक तीली।
"ये निशान," बंसी ने कहा, "अदालत में आज लिखे गए उस तीसरे नाम वाले पन्ने पर भी था। बही के नीचे के कोने पर।"
मैंने रसीद माँगी और ध्यान से देखा। ये वो कोना-चिह्न नहीं था। ये कुछ और था।
"ये घर का निशान है," मैंने कहा। "हवेली का नहीं। कोई और घर।"
"और वो घर," बंसी ने कहा, "मेरे चाचा का है। यही उस रसीद की गली में है। उस घर ने इस रसीद को पच्चीस साल बाहर नहीं जाने दिया — और उस दीवार ने मुझे बीस साल अपने सामने बैठने दिया।"
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