The Token System – Chapter 686
“मनोहर कुमार,” जज साहब ने कहा। “ये जो नई अर्ज़ी आई है, उस पर तुम कुछ कहना चाहोगे?”
“मैं कहना चाहूँगा, हुज़ूर।” मैं खड़ा हुआ। “ठाकुर भवानी सिंह कल रात से ये केस लिखवा रहे हैं, और सुबह आठ बजे अर्ज़ी लगा रहे हैं। मेरे घर पर कल रात उनका आदमी आया था — चिट्ठी लेकर। चिट्ठी में लिखा था कि आज मैं कोर्ट आया, तो घर जल जाएगा।”
कोर्ट में खुसफुसाहट फैल गई। भवानी का पहला वकील खड़ा हुआ। “हुज़ूर, ये बिलकुल बेबुनियाद आरोप है। मेरे मुवक्किल के पास ऐसा कोई आदमी नहीं।”
“वो आदमी पकड़ा गया था,” बंसी ने पीछे से कहा।
“चुप,” जज साहब ने कहा, पर तेज़ नहीं। उन्होंने हरीश चंद्र की तरफ़ देखा। “हरीश चंद्र, तुमने क्या अर्ज़ी लगाई थी?”
हरीश चंद्र खड़े हुए। उनका सफ़ेद कुर्ता साफ़ इस्त्री किया हुआ था, आवाज़ बस एक पायदान ऊपर — “हुज़ूर, मेरी मुवक्किल जमुना देवी की तरफ़ से ये अर्ज़ी है कि हवेली पर चार हिस्सों का हक़ है। चारों काग़ज़ हवेली में ही हैं। एक उत्तर वाली दीवार के पीछे, एक नींव में, एक कुएँ की दीवार के पास और एक तीसरी मंज़िल के बंद कमरे में।”
“चार काग़ज़?” भवानी का दूसरा वकील खड़ा हुआ। “हुज़ूर, ये सारी बातें बाद की हैं। पहले तो ये तय हो कि हवेली का मालिक कौन है। और हमारी अर्ज़ी में साफ़ लिखा है — हवेली ठाकुर हरि सिंह के परिवार की है, आज से नहीं, सौ साल से।”
“और तीन दिन पहले तक क्या सौ साल से थी?” जज साहब ने पूछा।
वकील रुका।
“मैंने पढ़ा है तुम्हारी अर्ज़ी में,” जज साहब ने कहा। “कल की तारीख़ में लिखी है ‘सदा से’। पर हवेली का नाम तहसील के रजिस्टर में साठ साल पहले तक किसी और के नाम पर था। ये बात मुझे नई नहीं है।”
भवानी की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर अब भी वही शांति थी, पर उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर कस गई थीं।
“मेरा आदेश है,” जज साहब ने कहा। “दीवार अभी खोली जाएगी। कोर्ट का अफ़सर साथ जाएगा। दोनों पक्ष के वकील मौजूद रहेंगे। रजिस्ट्रार, तुम रिकॉर्ड लिखो।”
वह काग़ज़ मेरे हाथ में था जिससे सब कुछ बदलना था — कोर्ट का आदेश। दोपहर बारह बजे हम हवेली के आँगन में खड़े थे। अफ़सर के साथ दो सिपाही थे, रजिस्ट्रार के हाथ में कॉपी। भवानी उसके पीछे आया, बगल में उसका भाई — वो मोटा आदमी जो रात मेरे घर धमकाने आया था। उसकी मुट्ठी जेब में बंद थी। माँ मेरे साथ थीं, उनका हाथ पहले से भी ठंडा था।
“उत्तर वाली दीवार,” हरीश चंद्र ने कहा। “सबसे नीचे की तीसरी ईंट।”
मज़दूर ने हथौड़ा चलाया। ईंट हिली। दूसरी। तीसरी। पहले सिर्फ़ गारा निकला। फिर खोखली आवाज़ आई। चौथी ईंट हटी तो दीवार के भीतर एक आलमारी का मुँह दिखा — छोटा, गहरा, जिसमें धूल जमी थी।
“अंदर रजिस्टर है,” हरीश चंद्र ने कहा।
अफ़सर ने खुद हाथ डाला। पहले एक मोटी भूरी बही निकली, फिर उसके नीचे से — एक छोटी लोहे की तिजोरी। वो ज़मीन पर रखी गई। उस पर तीन ताले थे, तीन अलग-अलग जगहों पर, और तीनों की शक्ल अलग।
भवानी आगे आया। उसने तिजोरी देखी और उसके क़दम अपने आप रुक गए।
“ये तो…” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “ये तो मेरे दादा की तिजोरी है।”
“तुम्हारे दादा की?” अफ़सर ने पूछा।
“हाँ।” भवानी ने तिजोरी पर झुककर ऊपर की तरफ़ देखा। “इसमें मेरा हिसाब है। मेरे दादा ने ख़ुद बसाई थी, मैंने बचपन में देखी है। मेरा हिसाब —”
“अब हिसाब सबका खुलेगा,” मैंने कहा। “तीनों का।”
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार उसकी आँखों में वो बात थी जो अब तक नहीं थी — हड़बड़ाहट। उसने मुँह फेर लिया।
“ये रजिस्टर क्या है?” जज साहब का आदेश रजिस्ट्रार ने पढ़ा। अफ़सर ने रजिस्टर उठाया और पन्ने पलटे। “हुज़ूर, इसमें तीन हिस्सों का हिसाब है, और चौथे हिस्से की जगह खाली।”
“खाली क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि चौथा काग़ज़ अभी आया नहीं,” अफ़सर ने कहा। “रजिस्टर में लिखा है — जब चौथा काग़ज़ मिले, तब ये हिसाब पूरा होगा।”
माँ ने मेरा हाथ कसा। मैंने उनकी तरफ़ देखा तो वो रजिस्टर को ऐसे देख रही थीं जैसे उससे डर रही हों। मुझे तब नहीं पता था कि उन्होंने क्या देखा।
अफ़सर तिजोरी की तरफ़ बढ़ा। “इसके तीन ताले हैं। चाबियाँ किसके पास हैं?”
हरीश चंद्र ने अपनी जेब से पुरानी चाबी निकाली। बंसी ने अपने घर के संदूक से निकाली चाबी दी। माँ ने अपनी पोटली से एक तीसरी चाबी निकाली — वो चाबी जो मुझे टोकन के इशारे पर अभी-अभी नहीं, पहले ही मिल चुकी थी, पर मैं उसे बंसी के सिवा किसी को नहीं दिखा पाया था।
पहला ताला खुला। दूसरा। तीसरा। ढक्कन उठा।
अंदर सबसे ऊपर एक लिफ़ाफ़ा था — पीला, मोटा, मुहर लगा। उसके नीचे चार छोटे-छोटे पुलिंदे धागे से बँधे थे, और सबसे नीचे — एक पीतल की तश्तरी, जिस पर कोई निशान खुदा था।
“हर पुलिंदे पर एक नाम है,” अफ़सर ने कहा। “पहले पर — हरि सिंह। दूसरे पर — रामदीन मिस्त्री। तीसरे पर — सुखदेव। चौथे पर —” वो रुका और पास झुककर देखा। “चौथे पर नाम मिटा है। सिर्फ़ लकीर बची है।”
माँ ने ठंडी साँस भरी।
भवानी झटके से आगे आया। “ये मेरा हिसाब है! मेरे दादा का! इसमें से कोई काग़ज़ मेरे बिना नहीं खुलेगा!”
“ठाकुर साहब,” अफ़सर ने कहा, बिना गुस्से के। “कोर्ट का आदेश है। सब रिकॉर्ड पर आएगा। आपके वकील यहीं हैं।”
भवानी अपने वकील की तरफ़ देखने लगा। वकील ने धीरे से सिर हिलाया — “ना।”
तभी जज साहब का अगला आदेश आया, जो अफ़सर ने मौके पर ही पढ़ा — “हवेली पर कोई काम नहीं होगा, कोई बिक्री नहीं होगी। नीलामी अगली तारीख़ तक टलती है। रजिस्टर और तिजोरी की सामग्री अदालत के कब्ज़े में रहेगी।”
भवानी एक बार भी मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो घूमा और सीधा गली की तरफ़ चल दिया। पर जाते-जाते उसका कंधा मेरे कंधे से रगड़ खा गया। इत्तेफ़ाक़ से नहीं।
बाहर निकलते ही, गली के मोड़ पर, उसने रुककर मुझे रोका। उसकी आवाज़ धीमी थी, दाँतों के बीच से।
“तूने ये नहीं सोचा,” उसने कहा, “कि जिस रजिस्टर पर तुझे इतना गुरूर है, उसमें तेरे दादा का नाम भी है?”
“सोचा है,” मैंने कहा।
“और?”
“और मैंने ये भी सोचा है कि अगर दादा का हिसाब गड़बड़ निकला, तो मैं उसे भी बराबर करूँगा। जैसे तेरा करूँगा।”
वो मुस्कुराया। एक ऐसी मुस्कान जो सिर्फ़ होंठों पर आई और चली गई। फिर बोला, “तेरे दादा ने सिर्फ़ टोकन नहीं छिपाया था। उसने एक आदमी भी छिपाया था।”
वो चला गया।
मैं घर लौटा तो शाम हो चुकी थी। रास्ते में बंसी ने कुछ नहीं कहा, बस मेरे साथ चलता रहा। घर पहुँचकर मैंने जेब में हाथ डाला — कुछ काग़ज़ थे, चाबियाँ थीं, और टोकन। तभी उँगलियों को कुछ मोटा लगा। मैंने निकाला तो नोटों का बंडल था। तीन हज़ार नहीं, तीन बंडल — तीस हज़ार। पहला बंडल पुराना था, दूसरा नया, तीसरे पर रबर बैंड भी नहीं था।
मैंने टोकन को जेब से बाहर निकाला। उस पर कोई नया अंक नहीं था। बस एक लकीर थी, जो कल नहीं थी।
“क्या है?” बंसी ने पूछा।
“हिसाब का हिस्सा,” मैंने कहा। “अभी तक तो ये काम के बदले आता था। आज बिना काम क्यों आया?”
बंसी ने नोटों को देखा। “तूने आज सुबह क्या किया था?”
“कुछ नहीं। बस अदालत गया।”
“तो शायद ये उसी का हिसाब है। जिन पाँच लोगों का सच तूने अदालत में रखवाया — उनका।”
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