The Token System – Chapter 36
"नर्सिंग होम के पिछले कमरे में। दो दिन। उसने बताया — वहाँ एक और औरत भी थी। वो बीमार थी। उसका नाम पूछा तो बोली — सुनीता।"
मेरा दिमाग़ ठंडा हो गया। "तो कमला को सुनीता के साथ रखा गया। और फिर सुनीता मर गई। और काग़ज़ पर लिखा गया कि मरी औरत कमला है।"
"हाँ।" सुमन ने काग़ज़ मोड़ा। "भवानी ने एक औरत मरवाई और दूसरी का नाम उस पर चढ़ा दिया। ताकि कमला का नाम खत्म हो जाए। और छोटू को गुम कर दिया ताकि कोई पूछने वाला न रहे।"
"और छोटू?"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "वो अब भी गुम है। पर एक बात — कमला ने इशारे से बताया कि जिस दिन उसे उठाया गया, उसी दिन छोटू घर पर नहीं था। वो अस्पताल की तरफ़ आ रहा था।"
"मतलब वो रास्ते में ही उठाया गया।"
"या रास्ते में ही किसी ने उसे रोका।"
मैं कमरे से बाहर निकला। बाहर आकाश नारंगी हो रहा था। मैंने टोकन निकाला। वो गरम था — हल्का, पर गरम। मैंने उसे हथेली पर पलटा। उस पर उभर रहा था, धीरे-धीरे, अक्षर साफ़ होते जा रहे थे —
"दवा का हिसाब: शून्य।"
मेरी साँस रुक गई। मैंने जेब में हाथ डाला। पैसे थे — एक हज़ार का बंडल। मैंने गिना। पूरे हज़ार। जो दो सौ पच्चास कल कम थे, वो आज पूरे थे।
मैं कुछ समझ नहीं पाया। "ये कैसे?"
टोकन पर नई लकीर उभरी — "काग़ज़ का सच: जवाब मिला। एक अंगूठा, दो औरतें। अब बही का हिसाब। तीन काम, तीन दिन — पहला: वो औरत जो मरी, उसका नाम वापस दो।"
मैंने टोकन जेब में रखा। सुनीता देवी — जो किसी की माँ थी, किसी की बहन। भवानी ने उसका नाम छीन लिया था, उसकी मौत पर दूसरे का नाम चढ़ा दिया था। पहला काम यही था।
मैं सीधा थाने पहुँचा। राजेंद्र गेट पर खड़े थे। मुझे देखकर वो आगे आए। "मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था।"
मैंने उन्हें सब बताया — कमला का ज़िंदा मिलना, सुनीता का नाम, एक ही अंगूठा, और अख़बार वाले को जानकारी देने वाला कोई और।
राजेंद्र ने सब सुना और फिर बोले, "सुनीता देवी का परिवार कहाँ है?"
"पता नहीं।"
"तो पहले वो ढूँढ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि जब तक उसका परिवार सामने नहीं आएगा, काग़ज़ पर उसका नाम वापस नहीं आएगा।"
"मैं ढूँढूँगा।" मैंने कहा। "पर एक बात — तुमने मुझे बताया था कि नर्सिंग होम का चौकीदार गायब है। वो कहाँ गया?"
राजेंद्र ने आवाज़ धीमी की। "मुझे एक खबर मिली है। वो चौकीदार शहर से बाहर नहीं गया। वो अपने गाँव में है — बसवा। और वहाँ से कल रात एक कॉल आई थी नर्सिंग होम के मेनेजर के फ़ोन पर।"
"तो मेनेजर जानता है।"
"मेनेजर डरा हुआ है। वो बोलता नहीं। पर अगर हम उसे सुनीता के परिवार वालों के सामने बैठा दें, तो शायद बोल दे।"
मैंने सिर हिलाया। "कल सुबह मैं उससे मिलूँगा।"
घर लौटा तो रात हो चुकी थी। रीना चाय बना रही थी। माँ दरवाज़े पर बैठी थीं। शेखर की बेटी पिछली कोठरी में सो रही थी।
रीना ने चाय दी और सामने बैठ गई। "अब बता। शाम को चाय की जगह सच लाना था।"
मैंने चाय पी और कप रख दिया। "कमला ज़िंदा है। उसके बच्चे उसके पास हैं। छोटू अब भी गुम है। और जो औरत मरी, उसका नाम सुनीता था — भवानी ने उसका नाम कमला बताकर छुपा दिया।"
रीना ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। "तो अब क्या करेगा?"
"सुनीता का परिवार ढूँढूँगा। उसका नाम वापस दिलाऊँगा।"
"और छोटू?"
मैंने टोकन जेब में दबाया। "वो मेरा दूसरा काम है।"
माँ ने धीरे से कहा, "मन्नू, एक बात — सुनीता देवी का नाम मुझे जाना-पहचाना लग रहा है।"
मैं रुक गया। "कैसे?"
"पता नहीं। बस लग रहा है।" माँ ने अपनी साड़ी के कोने से आँखें पोंछीं। "तेरे दादा के काग़ज़ों में कोई नाम था — सुनीता। मुझे याद है।"
मेरे हाथ रुक गए। "माँ, तू सोच। कहाँ?"
"पुरानी बही में। जो तेरे दादा के बक्से में थी।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "वो बही अब कहाँ है?"
मैं उठ खड़ा हुआ। दादा का बक्सा मेरे कमरे की अलमारी में था। मैंने खोला और उसमें से पुरानी बही निकाली। पन्ने पलटे। आख़िर में एक नाम मिला — "सुनीता, बसवा। अंगूठा लिया। हिसाब: पंद्रह।"
मैंने रीना की तरफ़ देखा। "सुनीता बसवा की थी। और उसका अंगूठा दादा ने लिया था।"
तभी बाहर गली में गाड़ी की आवाज़ आई। मैंने खिड़की से झाँका। नीचे एक कार रुकी थी। उसमें से काली शर्ट वाला आदमी उतरा — वही, जो तहसील में मिला था, जो बस स्टॉप पर धमकाया था। वो सीधा गेट की तरफ़ आया और ज़ोर से बोला, "मनोहर!"
मैंने रीना को इशारा किया कि अंदर जाए। माँ को भी। मैं दरवाज़े पर गया और खोला।
काली शर्ट वाला सामने खड़ा था। उसके पीछे गाड़ी में एक और आदमी बैठा था।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"ठाकुर साहब तुझसे मिलना चाहते हैं।" उसने जेब में हाथ डाला और एक कार्ड निकाला। "कल सुबह नौ बजे। उनका बंगला। और सुन — इस बार वो ख़ुद आ रहे हैं। किसी को साथ मत लाना।"
उसने कार्ड मेरे हाथ में रखा और मुड़कर चल दिया।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। पीछे रीना ने धीरे से पूछा, "कौन था?"
मैंने कार्ड पलटा। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "ठाकुर भवानी सिंह। कल सुबह नौ बजे। अकेले आना।"
"कोई मिलने का वक़्त देने आया है," मैंने कहा और दरवाज़ा बंद किया। "और इस बार मिलने वाला ख़ुद आ रहा है।"
॥
सुबह सात बजे के आसपास मैं चाय का कप लेकर दरवाज़े में खड़ा था कि गली के मुँह से एक सफ़ेद गाड़ी आई और ठीक मेरे घर के सामने रुक गई। कप हाथ में ही रह गया।
गाड़ी से ठाकुर भवानी सिंह उतरे — पूरा सफ़ेद, चमकीला कुर्ता, मुँह पर मुस्कान, हाथ में एक चमकता हुआ थैला। पीछे दो आदमी, वही काले कपड़ों वाले।
भवानी ने गली में घूरा, फिर घर की तरफ़ देखा। "क्यों मनोहर, नाश्ता हो गया?"
मैंने कप दीवार पर रखा। "आप सुबह-सुबह यहाँ क्यों?"
"सोचा, कुछ मीठा खिला दूँ।" उसने थैला ऊपर किया। "शुभ काम है।"
माँ दरवाज़े पर आ चुकी थीं। उन्होंने भवानी को देखा और साड़ी से मुँह ढक लिया।
भवानी ने हाथ जोड़े। "भाभी जी, प्रणाम। घर बहुत अच्छा है। छोटा है, पर अपना तो है।"
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
पीछे से रीना आई। हाथ में तौलिया था, सिर खुला था। उसने सीधे भवानी की तरफ़ देखा और कहा, "इस घर में इनका स्वागत नहीं है।"
भवानी हँसा। ठहाका नहीं, वो छोटी-सी हँसी जिससे आदमी की ऊँचाई और बढ़ जाती है। "बहन जी, मैं तो शादी की बात करने आया हूँ। आशीर्वाद देने। इतना डर कैसा?"
"शादी की बात लालाजी से होगी।" मैं कप सरका कर सामने आ गया। "मुझसे नहीं। आप मेरे घर पर शादी की बात करने आए हो — ये मुझे अच्छा नहीं लगता।"
भवानी ने थैला खोला, उसमें से एक मोटा लिफ़ाफ़ा निकाला। उसने लिफ़ाफ़े का मुँह खोलकर रीना की तरफ़ रखा। "लालाजी क्या हैं? लालाजी मेरे आदमी हैं। रिश्ता मेरा दिया हुआ है। एक फ़ोन करूँ, तो रिश्ता टूट भी सकता है और जुड़ भी सकता है।"
रीना थोड़ा आगे आई। "तो टूट जाने दीजिए। मैं ऐसे घर में नहीं जाऊँगी जहाँ आपका डर हो। और ऐसे ही मेरे भाई को किसी काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगाना पड़ेगा।"
भवानी का चेहरा कड़ा हो गया। मुस्कान वहीं रुक गई, जैसे दीवार से चिपका दी गई हो। उसने लिफ़ाफ़ा लपेटना चाहा, पर उसकी उँगली काँप रही थी — हल्की सी, पर मैंने देख ली।
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