The Token System33 / 1154

The Token System – Chapter 33

6 min read November 6, 2026

नर्सिंग होम के गेट पर एक गार्ड बैठा था। राजेंद्र ने वर्दी की कॉलर ठीक की और उतर गया। गार्ड उठ खड़ा हुआ।

"साहब, इस वक़्त?"

"रजिस्टर।" राजेंद्र ने हाथ बढ़ाया। "कल रात का भरती रजिस्टर।"

गार्ड की आँखें फैल गईं। "साहब, रजिस्टर तो… मैनेजर साहब के पास रहता है।"

"तो मैनेजर को बुला।"

गार्ड अंदर गया। मैं बंसी के साथ गेट के पास खड़ा रहा। पीछे मुड़कर देखा — दूर, सड़क के मोड़ पर एक गाड़ी खड़ी थी, हेडलाइट बंद। बंसी ने भी देखा।

"भवानी का आदमी," उसने धीरे कहा।

"जाने दो," मैंने कहा। "आज वो हमें रोक नहीं सकता।"

मैनेजर आया — पतला, चालीस के आसपास, आँखों में नींद और डर दोनों। उसने राजेंद्र को देखा और हाथ जोड़ लिए।

"साहब, रजिस्टर… कल रात का रजिस्टर तो…"

"क्या?"

"उसमें कुछ गड़बड़ है, साहब।"

राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "कैसी गड़बड़?"

मैनेजर ने आवाज़ धीमी की। "कल रात जो औरत आई थी, उसका नाम मैंने खुद लिखा था। पर सुबह उठकर देखा तो उस पन्ने पर… मतलब, नाम के आगे कुछ और लिखा था। मेरी लिखाई नहीं थी।"

"क्या लिखा था?"

"सुनीता देवी। और नीचे — छोटू की माँ।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "मैंने कल रात खुद छोटू की माँ को वार्ड तीन में देखा था। वो ज़िंदा है।"

मैनेजर मेरी तरफ़ घूमा, चेहरा सफ़ेद। "वार्ड तीन में? साहब, वार्ड तीन तो कल रात से बंद है। मरम्मत के लिए।"

मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर हो गया था।

"रजिस्टर लाओ," राजेंद्र ने कहा, आवाज़ ऐसी जैसे किसी और की हो।

मैनेजर अंदर गया और एक मोटा रजिस्टर ले आया, पन्ने पलटते हुए। उसने उँगली रखी — कल रात की तारीख़। मैंने पढ़ा। नाम — सुनीता देवी। उम्र — पच्चीस। पता — खेत्री। लाया — भवानी सिंह का आदमी। और नीचे, अलग स्याही से, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो — "छोटू की माँ।"

"ये नीचे का नाम मेरे हाथ का नहीं है," मैनेजर ने कहा।

बंसी ने रजिस्टर की तरफ़ झुककर देखा और धीरे से बोला, "मन्नू।"

"हाँ।"

"स्याही काली है, पर जो नाम ऊपर है उसकी स्याही नीली है।"

मैनेजर काँप गया। "मतलब कोई रात में अंदर आया था।"

राजेंद्र ने रजिस्टर बंद किया। "कल रात का ड्यूटी रजिस्टर भी लाओ। कौन नर्स थी, कौन चौकीदार।"

"साहब, चौकीदार तो…" मैनेजर हकलाया। "चौकीदार कल रात से गायब है।"

मैंने पीछे मुड़कर गेट के बाहर देखा। मोड़ पर खड़ी गाड़ी अब नहीं थी।

राजेंद्र ने मेनेजर को कुर्सी पर बैठाया और सख्त आवाज़ में कहा, "एक काग़ज़ और एक कलम दो। मैं अपनी नज़र में ये सब लिखवाता हूँ, और नीचे तेरा हस्ताक्षर होगा। अगर कल तक ये रजिस्टर गायब हुआ, तो सीधा तेरे नाम एफ़आईआर।" मैनेजर ने काँपते हाथ से हस्ताक्षर किए। राजेंद्र ने वो काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा। "और सुन — इस रात की बात किसी को नहीं। भवानी को भी नहीं।"

"पर साहब, वो मालिक हैं…"

"मालिक है तो रहने दे। जवाब मैं दूँगा।"

बाहर निकले तो ठंडी हवा चेहरे पर पड़ी। मैंने राजेंद्र से पूछा, "वार्ड तीन बंद है मतलब?"

राजेंद्र ने सिगरेट सुलगाई। "मतलब छोटू की माँ वहाँ नहीं है। और जिसे तूने कल सुबह दवा दी थी, वो या तो कोई और औरत थी, या फिर…" उसने धुआँ छोड़ा। "या फिर तुझे दिखाया गया था।"

बंसी ने कहा, "काग़ज़ का सच।"

राजेंद्र ने उसकी तरफ़ देखा। "क्या?"

"टोकन कह रहा था — काग़ज़ का सच: जवाब मिला। अब तीन सौ पच्चीस का हिसाब। एक नाम, एक हस्ताक्षर।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, आज जो हस्ताक्षर हुए — तेरे काग़ज़ पर, इस रजिस्टर पर… ये वही तीन सौ पच्चीस का हिसाब है।"

मेरी जेब में टोकन फिर गरम हुआ। पर इस बार मैंने निकाला नहीं। मुझे लगा, जो हो रहा है वो मेरे हाथ में नहीं, और टोकन भी बस गवाह है।

राजेंद्र ने गाड़ी स्टार्ट की। "मैं तुम दोनों को घर छोड़ता हूँ। सुबह आठ बजे थाने आना। हम भवानी के नर्सिंग होम का लाइसेंस चेक करेंगे।"

"रात में कुछ नहीं?" मैंने पूछा।

"रात में मैं तुम्हें घर भेज रहा हूँ, ये कम नहीं है।" उसने गाड़ी मोड़ी।

रास्ते में बंसी ने धीरे से कहा, "मन्नू, एक बात। काग़ज़ में जो औरत मरी, वो कोई और थी। पर उसका नाम छोटू की माँ के नाम पर क्यों लिखा?"

"क्योंकि भवानी को लगा होगा कि अगर छोटू की माँ का नाम काग़ज़ पर मरा हुआ दर्ज हो जाए, तो असली छोटू की माँ को कोई ढूँढेगा नहीं। मरी हुई औरत का नाम मिल गया, केस बंद।"

"तो असली माँ कहाँ है?"

मैंने खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में खेत, बिजली के खंभे, कहीं दूर एक ट्रैक्टर की लाइट। "भवानी के पास। कहीं। ज़िंदा या…"

राजेंद्र ने कहा, "ज़िंदा। भवानी मुर्दा औरत का इस्तेमाल नहीं करता। वो ज़िंदा औरत को छुपाकर रखता है, ताकि ज़रूरत पड़े तो काम आए।"

घर पहुँचा तो ग्यारह बज चुके थे। रीना दरवाज़े पर ही खड़ी थी। मुझे देखते ही बोली, "चाय बना रखी है। ठंडी हो गई, फिर बना दूँगी।"

"बना दे।"

वो अंदर गई। माँ बैठक में बैठी थीं, हाथ में रसीद — वही रसीद जो सुबह तहसील दफ़्तर से मिली थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"कुछ हुआ?"

"अभी कुछ नहीं माँ। कल सुबह पता चलेगा।"

उन्होंने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये तेरे हाथ की कमाई है। तेरे पास रहे।"

"आपके पास रहे।"

वो मुस्कुराईं, पर मुस्कुराहट आँखों तक नहीं पहुँची।

चाय पीकर मैं कमरे में गया। टोकन जेब में ठंडा था, बिलकुल चुप। मैंने उसे मेज़ पर रख दिया और चारपाई पर लेट गया।

सुबह जल्दी उठा। आठ बजे से पहले थाना पहुँचना था। नहाते वक़्त ही दरवाज़े पर दस्तक हुई। रीना ने दरवाज़ा खोला — बंसी खड़ा था, चेहरा उतरा हुआ।

"मन्नू को बुला," उसने कहा। आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने पहले नहीं सुनी थी।

मैं तौलिए में सिर पोंछता हुआ बाहर आया। "क्या हुआ? राजेंद्र ने कुछ भेजा?"

"राजेंद्र की बात नहीं है।" बंसी ने अपनी जेब से एक अख़बार निकाला, मुड़ा हुआ, सुबह का ताज़ा। "चल, दुकान चल। यहाँ नहीं।"

रीना ने बंसी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "मन्नू, क्या है?"

"दुकान से आते ही बताता हूँ।"

"तू रोज़ कहता है आते ही बताता हूँ," वो चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए बोली। "पर आता कुछ और है। आज साफ़ बता — क्या चल रहा है?"

मैंने कप लिया और एक घूँट में आधा खत्म किया। "सच में अभी नहीं बता सकता। पर जब बताऊँगा, पूरा बताऊँगा।"

वो कुछ देर मुझे देखती रही, फिर किनारे हट गई। "जा। पर शाम को चाय की जगह सच लाना।"

बंसी के पीछे-पीछे सड़क पर चलते हुए मैंने पूछा, "अख़बार में क्या है?"

"दुकान पर। अपनी आँखों से देख।"

"बंसी —"

"मैंने तुझे सुबह घर पर नहीं बताया क्योंकि रीना और काकी सामने थीं।" उसने तेज़ क़दम बढ़ाए। "और ये चीज़ पढ़कर तू घर में नहीं रुक पाता। मेरे ऊपर इल्ज़ाम आता।"

दुकान पहुँचे तो बंसी ने शटर उठाया, मुझे अंदर खींचा और फिर शटर आधा गिरा दिया। कमरे के अंदर अंधेरा-सा था, बस एक बल्ब जल रहा था। बंसी ने अख़बार खोलकर सामने रख दिया।

दूसरे पन्ने पर, ऊपर बीच में — मोटी सुर्खी नहीं, छोटी सी खबर। "नर्सिंग होम में एक औरत की मौत, परिवार ने लापरवाही का आरोप लगाया।" और साथ में एक फ़ोटो। धुँधली, पर आसानी से पहचानी जा सकती। औरत का नाम — कमला देवी। उम्र — कोई ज़िक्र नहीं। पता — नहीं। और नीचे दो लाइनें थीं जिन्होंने मेरे हाथ ठंडे कर दिए —

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