The Token System – Chapter 31
अब मुझे समझ आने लगा — जो पैसा टोकन देता है, वो हवा से नहीं आता। किसी की जेब से आता है। किसी के हिसाब से आता है। दवा का हिसाब। दवा के पैसे में से कुछ कटा, किसी और की जेब में गया, और अब वो हिसाब मेरे सामने खड़ा है।
मैंने टोकन जेब में रखा और उस दीवार की तरफ़ देखा जिस पर अस्पताल का पुराना नक्शा टँगा था। उस पर एक जगह गोल घेरे में लिखी थी — पुराना रिकॉर्ड कमरा। मैंने उसे देखकर सोचा — शेखर वहीं बैठता था। और उसी कमरे की दराज़ में हवेली की चाबी पड़ी है। और वही काग़ज़ जो दीवार के पीछे लिखा है।
सुबह पाँच बजे डॉक्टर सुमन गलियारे से गुज़री। मुझे बेंच पर देखा।
“तू अब तक यहीं है?”
“हाँ।”
“सोया नहीं?”
“थोड़ा।”
“जा, घर जा। नहा, कपड़े बदल, वापस आ।”
मैं उठा। “डॉक्टर साहिबा।”
“फिर?”
“उस काग़ज़ की एक कॉपी मुझे दे दोगी?”
वो रुकी। “क्यों?”
“क्योंकि जो आदमी इसे भेजेगा, वो अपनी कॉपी बनवाएगा। और मुझे एक चाहिए — मिलाने के लिए।”
वो मुस्कुराई। “तेरे अंदाज़ अजीब हैं।” फिर बोली, “आ जा चार बजे। कॉपी मिलेगी।”
मैं अस्पताल से बाहर निकला। सुबह की ठंडी हवा लगी। गेट पर बंसी खड़ा था — अबकी बार चाय का गिलास लेकर नहीं, खाली हाथ, और चेहरा वैसा जो मुझे पसंद नहीं आया।
“क्या हुआ?”
“शेखर का फ़ोन आया।”
“कब?”
“आधे घंटे पहले।”
“क्या कहा?”
“कहा — मेरी बेटी को भवानी के पास भेज दे।”
मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया। टोकन ठंडा था, पर मुझे लगा जैसे उसने हल्का सा कुछ कहा हो — जो कान तक नहीं पहुँचा।
“क्यों?”
“कह रहा है — मेरी ग़लती है। मैंने अंगूठा लगाया, और उसके बाद… उसके बाद उसने सब लौटा दिया।”
“क्या लौटाया?”
“नहीं बताया। बस इतना कहा कि अगर बेटी नहीं भेजी, तो जो उसने दिया है, वो भी जाएगा। और उसके साथ उसकी बेटी का नाम भी।”
“शेखर कहाँ है?”
“नहीं बताया।”
“उसकी बेटी कहाँ है?”
“रामगंज। तेरे घर पर। रीना के पास।”
मैंने आँखें बंद कीं। अब समझ आ रहा था — भवानी ने शेखर को इसलिए नहीं छोड़ा था कि उसने कुछ दे दिया। उसने उसे इसलिए छोड़ा था कि वो अब भी काम का है। बंधक। हर आदमी के पास कोई न कोई बंधक होता है — बेटी, बेटा, काग़ज़, नाम। भवानी का हर हथियार यही था।
“बंसी।”
“हाँ।”
“रीना से बात कर। बोल — लड़की को कहीं और ले जाएँ। अभी। काकी के घर।”
“काकी के घर भी वही आदमी आए थे कल।”
“काकी के घर के पीछे वाला हिस्सा, जहाँ पुरानी कोठरी है। छोटू ने बताया था — वहाँ से कोई रास्ता नहीं जाता।”
“और तू?”
“मैं अस्पताल में हूँ। चार बजे डॉक्टर सुमन से मिलना है।”
“मन्नू, तू एक दिन में कितनी जगहें होता है?”
“जितनी ज़रूरत पड़े।”
वो हँसा नहीं। “मेरी बात सुन। शेखर का फ़ोन मुझे ठीक नहीं लगा। उसकी आवाज़ में डर था, पर वो डर वैसा नहीं था जैसा पहले था। वो जैसे कह रहा था — मुझे कुछ बताना है, पर बता नहीं सकता।”
“तो मैं खुद ढूँढूँगा।”
“कहाँ?”
मैंने अस्पताल की इमारत की तरफ़ देखा। ऊपर, दूसरी मंज़िल पर, एक खिड़की खुली थी — पुराना रिकॉर्ड कमरा।
“वहीं से शुरू करूँगा जहाँ से सब शुरू हुआ था।”
शाम चार बजे मैं डॉक्टर सुमन के कमरे में बैठा था। उसने काग़ज़ की कॉपी मेरे सामने रखी।
“ये तेरी।”
मैंने उठाया। एक कॉपी मेरे पास।
“अब एक बात।” वो कुर्सी पर बैठी। “तूने कल रात कुछ कहा था — शेखर ने अंगूठा लगाया, गवाही दी, फिर भी भवानी ने उसे छोड़ दिया। मैंने सोचा। तेरी बात सही है। भवानी छोड़ता नहीं। शेखर के पास कुछ है।”
“बही।”
“क्या?”
“सेठ की बही। हवेली का पुराना हिसाब। भवानी के दादा की लिखाई। छीने गए हक़ों की सूची।”
डॉक्टर सुमन कुछ देर चुप रही। “ये कहानी तूने किसी से सुनी?”
“माँ से।”
“और वो बही कहाँ है?”
“शेखर के पास।”
“और शेखर?”
“लापता।”
डॉक्टर सुमन ने कलम उठाई, फिर रख दी। “तू मुझे कुछ बता रहा है, पर आधा बता रहा है।”
“मैं जितना बता सकता हूँ, बता रहा हूँ।”
“क्यों आधा?”
“क्योंकि पूरा बताने से तुझे ख़तरा है।”
वो देर तक मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, “मैंने एक बार एक मरीज़ को भवानी के नर्सिंग होम भेज दिया था। तीन साल पहले। उसका बच्चा… वो बच गया, पर मैं नहीं बची। मेरे अंदर कुछ रह गया जो कचोटता है। तू जानता है, अगर उस दिन मैं न झुकती तो?”
“तो?”
“तो शायद मेरी नौकरी जाती। पर वो कचोटना नहीं होता।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो उठी। “जा। तेरे पास काम है। और मनोहर — जब तुझे लगे कि अब बताने का वक़्त है, तो बता। मैं सुनूँगी।”
मैं बाहर आया। गलियारे में छोटू दौड़ता आया, हाथ में एक पुरानी चिट्ठी लिए, मुँह पर गर्व।
“चाचा! चाचा! मिल गई!”
“क्या मिली?”
“पुराने रिकॉर्ड कमरे की चाबी। मैंने वहाँ सफ़ाई वाले काका से पूछा। उन्होंने कहा कि दराज़ में पड़ी है। मैं ले आया।”
मैंने लिया। चाबी जंग लगी थी, टैग पर लिखा था — हवेली, पिछला दरवाज़ा।
मैंने चाबी मुट्ठी में दबाई और छोटू के सिर पर हाथ रखा।
“तू कमाल का है।”
“माँ बोली थी — चाचा की मदद करना।”
“अब घर जा। काकी के पास। रीना के पास। बता देना — मैं आ रहा हूँ।”
वो दौड़ गया।
मैं गलियारे में खड़ा रह गया, हाथ में चाबी, जेब में टोकन। टोकन फिर हल्का गरम हुआ और उस पर वही लकीर उभरी, अब थोड़ी साफ़ —
दवा का हिसाब: तीन सौ पच्चीस बाकी। काग़ज़ का सच: जवाब बाकी।
मैंने टोकन देखा और धीरे से बोला, “अब दो बाकी हैं।”
गलियारे के आख़िर में घड़ी टिक रही थी — पाँच बजने वाले थे। और कहीं, किसी दफ़्तर में, कोई फ़ोन उठा रहा था, और किसी को बताया जा रहा था कि अस्पताल में एक औरत बच गई, और उसका बचना किसी के हिसाब में गड़बड़ डाल रहा है।
॥
सुबह नौ बजे मैं तहसील दफ़्तर की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, हाथ में काग़ज़ों की थैली, पीछे बंसी और उसके पीछे शेखर बाबू — दोनों ऐसे चल रहे थे जैसे कोर्ट में गवाही देने जा रहे हों। बंसी के हाथ में चाय का गिलास था जो उसने रास्ते में खत्म नहीं किया, और शेखर बाबू हर दो कदम पर पीछे मुड़कर देख रहे थे।
सीढ़ी के मोड़ पर एक आदमी खड़ा था। काली शर्ट, हाथ में मोबाइल, मुँह पर वो वाली मुस्कान जो कहती है — मैं यहाँ तेरे लिए ही हूँ।
"मनोहर जी।"
मैं रुका नहीं। "हट जा भाई, दफ़्तर का टाइम है।"
"ठाकुर साहब ने कहा है — आज काग़ज़ जमा नहीं होगा।"
मैंने थैली दूसरे हाथ में ली। "अच्छा। ठाकुर साहब तहसील के क्लर्क भी हैं क्या?"
वो हँसा। "ठाकुर साहब वो हैं जो क्लर्क से काग़ज़ रुकवा सकते हैं।"
बंसी ने चाय का आख़िरी घूँट मारा और गिलास सीढ़ी की रेलिंग पर रख दिया। "भाई, ये तहसील है, ठाकुर की जागीर नहीं। तू रास्ता दे, हमारा काम है।"
आदमी ने रास्ता नहीं दिया। मैंने उसके कंधे से हाथ रखकर हल्का सा हटाया और आगे बढ़ गया। वो कुछ बोला नहीं, बस मोबाइल उठाकर किसी को मिस्ड कॉल दे दी।
अंदर क्लर्क का काउंटर था। पीली फ़ाइलों का ढेर, पुरानी रजिस्टर, और एक आदमी जिसकी उम्र पचास के आसपास थी, चश्मा नाक पर टिका था।
"काकी के ज़मीन के काग़ज़ जमा करने हैं," मैंने थैली काउंटर पर रखी।
क्लर्क ने थैली खोली, काग़ज़ निकाले, ऊपर से नीचे तक देखा, फिर धीरे से बोला, "इस केस पर रोक लगी है।"
"किसने लगाई?"
"ऊपर से आदेश है।"
"कौन ऊपर?"
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