The Token System – Chapter 188
मैंने सिर हिलाया।
"तो… तो वो काग़ज़…" उनका गला रुक गया। "वो काग़ज़ तेरे नाम पर है।"
दरवाज़े के बाहर गलियारे में किसी ने स्ट्रेचर की धातु की टाँग ज़मीन पर मारी — ठक। मैं खड़ा रहा, और मेरी जेब में टोकन ठंडा था, एकदम ठंडा।
मैंने कुंडी पकड़ी रखी थी, पर जिस्म ने काम करना बंद कर दिया था। गला सूख गया। स्ट्रेचर की आवाज़ दूर जाती गई और उसके पीछे मेरे कानों में एक ही शब्द गूँजता रहा — मनोहर। काग़ज़ मेरे नाम पर। मैं गली के स्कूल में पढ़ता था, तभी मास्टर जी ने मेरा नाम लिखा था, माँ ने अँगूठा लगाया था। मेरा नाम किसी तहसील के काग़ज़ तक कैसे पहुँचा?
"शेखर बाबू," मैं दरवाज़े से पलटकर उनकी मेज़ की तरफ़ बढ़ गया, "पूरी बात बताइए। काग़ज़ पर क्या लिखा है? किस साल का है?"
वो पीछे हट गए। "रुक जा, रुक जा। दरवाज़ा बंद कर पहले।"
मैंने दरवाज़ा बंद किया। वो फ़ाइलों के नीचे से एक लाल मोटी रजिस्टर निकाले, उसे खोलकर पन्ने पलटने लगे। उनका हाथ अब रुका हुआ था, डर जाता नहीं था, ठंडा पड़ गया था।
"तेरह साल पहले," उन्होंने उँगली एक लकीर पर रखी, "भवानी की तिजोरी में एक काग़ज़ रखा गया था। ज़मीन का काग़ज़। उसमें लिखा था — खेत्री की सरकारी ज़मीन का हिस्सा, मुआवज़े में नक़द रक़म, और हर हिस्से के सामने एक नाम।" उन्होंने पन्ना मेरी तरफ़ घुमाया। "ये देख। तीसरी कतार।"
मैंने देखा। मेरी ही लिखाई जैसी लकीरें नहीं थीं, पर नाम साफ़ था — मनोहर उर्फ़ मन्नू।
"मेरा नाम यहाँ कैसे?" मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लगी।
"यही तो भवानी का खेल है।" शेखर बाबू ने रजिस्टर बंद किया। "मुआवज़े का हिसाब गाँव के कुछ लोगों के नाम पर दिखाया जाता है — जो कभी मुआवज़ा लेते नहीं, जो हिसाब भी माँगते नहीं। तेरा नाम उसने ऐसे ही चुना। तेरा बाप मज़दूरी करता था, तू छोटा था। कोई पूछने वाला नहीं था।" उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे नाम पर निकला पैसा किसी और की जेब में गया। और अगर हिसाब खुले, तो काग़ज़ पर तेरा नाम होगा — पैसा लेने वाले का नहीं।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए। पैसा मुझे नहीं मिला था, पर फंदा मेरे नाम पर बना था।
"अब समझा," मैंने कहा, "भवानी ने टोकन भेजा, क्योंकि उसे पता था कि अगर रिपोर्ट थाने पहुँची, तो जाँच सबसे पहले उसी काग़ज़ पर होगी जिस पर मेरा नाम है। और वो चाहता था कि जाँच मेरी तरफ़ मुड़े, अपनी तरफ़ नहीं।"
शेखर बाबू ने सिर हिलाया। "और विक्रम के दस्तख़त उसी काग़ज़ के नीचे हैं — नीचे की कतार में। यानी जब ये काग़ज़ बना, विक्रम बीस साल का भी नहीं था।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। "आपने ये सब पहले क्यों नहीं बताया?"
वो खिड़की की तरफ़ मुँह फेरकर खड़े हो गए। "क्योंकि मेरी बेटी का नाम भी उसी रजिस्टर के एक पन्ने पर है, और मैं तेरह साल से बस यही सोचता रहा कि मेरा काग़ज़ कौन खोलेगा।" वो पलटे। "अब तू खोल रहा है।"
बाहर गलियारे में फुसफुसाहट आई — दो आदमी, जिनकी परछाइयाँ दरवाज़े के नीचे से चौखट पर रुक गईं।
शेखर बाबू ने मेरी कलाई पकड़ी। "छत की सीढ़ी। पीछे की खिड़की से। अभी।"
मैंने कॉपी और नक्शा जेब में दबाया, खिड़की पर चढ़ा। नीचे दो मंज़िला गिरा, पीछे की गली में उतरा। पीछे मुड़कर देखा तो खिड़की पर शेखर बाबू की सफ़ेद परछाई हिल रही थी — और दरवाज़े की कुंडी अंदर से खुल रही थी।
मैंने कदम तेज़ किए। जेब में टोकन अब भी ठंडा था, पर उस ठंडक में अब एक और चीज़ थी — एक नाम, जो मेरा था और जो किसी और ने मेरे बिना काग़ज़ पर चढ़ा दिया था।
मुझे रुकना पड़ा। गली के मोड़ पर मैंने जेब से कॉपी निकाली और उसे चाँद की रोशनी में खोला। शेखर बाबू ने जो लिखा था, वो नीचे की तरफ़ एक लाइन में ख़त्म होता था — 'मनोहर व मन्नू दोनों एक ही, पिता का नाम: रामलाल।'
मैंने काग़ज़ मोड़ा। पर सोचने से पहले कि कहाँ जाना है, मेरे कानों में गली की दीवार के पीछे से वो आवाज़ आई, जो मैंने कभी नहीं सुनी थी, पर पहचानी ज़रूर थी — छड़ी की ठक-ठक, और उसके साथ एक बूढ़ी आवाज़।
"तो तू ही है मन्नू।"
॥
छड़ी की ठक-ठक गली के मोड़ पर रुक गई। मैंने कॉपी जेब में दबाई और दीवार से चिपक गया। सामने से एक बूढ़ी औरत आ रही थी, सिर पर मैला सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में लाठी, आँखों पर चश्मा जिसका एक काँच टूटा था।
"तू भागता फिरता है," उसने कहा, "और तेरे पीछे-पीछे भवानी के आदमी दौड़ते हैं। कल से तीन बार देख चुकी हूँ।"
"आप कौन हैं?"
"मैं वो हूँ जिसका नाम उस रजिस्टर में है और मौत का काग़ज़ किसी और के नाम।" उसने लाठी आगे की। "कम्मो। हवेली की नौकरानी रही हूँ। सेठ गोवर्धनदास के घर सोलह साल की उम्र से काम किया।"
मैंने आस-पास देखा। गली खाली थी, पर मुझे पता था खाली नहीं थी।
"अभी नहीं," उसने मेरी कलाई पकड़ी, "अभी बोलूँगी तो दोनों मरे जाएँगे। चल, सुमन की माँ के पास। वहाँ कोई नहीं ढूँढेगा।"
सुमन की माँ का मकान अस्पताल की पिछली दीवार से सटा था। कमरा छोटा, दीवार पर पुरानी तस्वीरें, चूल्हे पर चाय। कम्मो चारपाई पर बैठ गई और मैंने कॉपी मेज़ पर रखी।
"ये काग़ज़ किसका है?" उसने सीधा पूछा।
"खेत्री की सरकारी ज़मीन का। तेरह साल पुराना। नाम मेरा, पैसा किसी और का।"
कम्मो ने चश्मा उतारा। "तेरा नाम? अरे, तेरा नाम तो इससे भी पुराने काग़ज़ पर है।" उसने लाठी से फ़र्श ठोका। "सुन कम्बख़्त, भवानी से लड़ने की बात तू सोच भी कैसे रहा है? उसका दादा हरि सिंह मेरे सामने ही काग़ज़ बदलता था। मैं चूल्हे के पास खड़ी रहती थी, सुनती रहती थी। जो नहीं सुन पाती, वो दूसरे दिन सेठ की बही में पढ़ लेती। पढ़ना वहीं सीखा।"
"तो आपने कुछ नहीं किया?"
"मैंने अपनी जान बचाई।" उसकी आवाज़ सपाट हुई। "और अब बचाने की उम्र नहीं, बताने की आई हूँ।" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "भवानी का टोकन टूटा न? टूटा तो अब वो ख़ुद कुछ नहीं कर सकता। हर काम जो उसने दूसरों से करवाया, उसका हिसाब अब उसके बेटे के पास जा रहा है। विक्रम को बचाना है तो काग़ज़ पहले अदालत में जाना चाहिए, तेरे जेब में नहीं।"
मैंने टोकन निकाला। ठंडा था।
"दस बजे अफ़सर के दस्तख़त हैं," मैंने कहा, "और नौ बजे विक्रम का बयान।"
"तो जा।" कम्मो ने लाठी उठाई। "पर एक बात सुन ले — भवानी के होम में जो औरतें काम करती हैं, कल रात दो ने दो नाम दीवार पर लिखे देखे थे। उनमें एक नाम सुनीता का था, दूसरा किसी और का। वो काग़ज़ भी अपने साथ रखना।"
मैंने कॉपी और काग़ज़ समेटे और निकल पड़ा। अस्पताल के पीछे वाले कमरे में बंसी और सुमन पहले से बैठे थे। सुमन ने काग़ज़ पढ़ा और उसका चेहरा कठोर हो गया।
"ये दस्तख़त देख," उसने उँगली नीचे की कतार पर रखी, "विक्रम के। चौदह साल का बच्चा काग़ज़ पर गवाह नहीं बनता। अगर ये काग़ज़ अदालत में गया, तो भवानी के सिर्फ़ ज़मीन हड़पने का केस नहीं बनेगा — अपने ही बेटे के नाम पर सारा कारोबार चलाने का केस बनेगा।"
बंसी ने चाय की गिलास ख़ाली की। "और इस काग़ज़ में मन्नू का नाम? ये तो जाल है पूरा। भवानी ने तेरा नाम ऐसे चुना जैसे किसी अनाथ का नाम चुनते हैं।"
"मुझे भवानी ने नहीं चुना," मैंने कहा, "मेरे बाप का नाम रामलाल लिखा है। मेरे बाप भवानी के यहाँ मज़दूरी करते थे। उन्होंने ये नाम चुना क्योंकि वो जानता था — रामलाल कभी काग़ज़ पढ़ने नहीं आएगा।"
सुमन ने काग़ज़ वापस मेरी तरफ़ सरकाया। "अब रिपोर्ट दर्ज करवानी होगी। वही रिपोर्ट जिसमें ये काग़ज़ की कॉपी लगी हो। विक्रम को बचाना है तो पहले उसे गवाह बनवाना होगा, दोषी नहीं।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno