The Token System – Chapter 172
“तो वो काग़ज़ असली है। और उस पर मेरा नाम है।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “तो अब?”
मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला। उस पर मेरा नाम गवाह के तौर पर लिखा था — “मन्नू, हवेली का बेटा।”
“अगर ये काग़ज़ असली है,” मैंने कहा, “तो मेरा नाम उस पर आज नहीं आया। महीनों पहले आया है। मतलब किसी को पता था कि मैं यहाँ आऊँगा।”
“किसको?” बंसी ने पूछा।
“उसी को,” मैंने कहा, “जो मेरे पापा से पहले इस हिसाब में था।”
रोशन ने धीरे से कहा, “मेरे मामा ने ये टोकन मुझे चार महीने पहले दिया था। जब वो मरने वाले थे। उन्होंने कहा था — ‘ये टोकन किसी को मत देना। एक दिन एक लड़का आएगा, जिसके जेब में टोकन होगा। उसे दे देना।’”
“और चाबी?” मैंने पूछा।
“चाबी उन्होंने महीने पहले दी थी। कहा था — ‘अब देर हो रही है। ये चाबी छुपा ले। मैंने इसे बहुत दिन रखा, अब नहीं रख सकता।’”
“तुम्हारे मामा को पता था कि काग़ज़ पर नाम है?”
“शायद। वो डरते थे। बसवा जाने से डरते थे। कहते थे — ‘वहाँ भवानी के आदमी हैं।’”
बंसी ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। “तो अब क्या करें? भवानी के आदमी काग़ज़ ढूँढने निकल चुके हैं। वो तुम्हारे घर जाएँगे।”
“घर नहीं,” मैंने कहा। “वो मेरे पास आएँगे। क्योंकि मैं ही काग़ज़ लेकर घूम रहा हूँ।”
“तो?”
“तो अब हमें भवानी के आगे निकलना है।”
मैंने राजेंद्र का काग़ज़ निकाला — जिस पर उसने अपना नंबर लिखा था। बसवा के मोड़ पर एक दुकान थी, जिसके बाहर पुराना फ़ोन था। मैं गया, सिक्का डाला, तीन लाइन में बात की।
फ़ोन रखकर मैं लौटा।
“क्या कहा?” बंसी ने पूछा।
“कहा — भवानी बसवा में है। उसके आदमी निकल चुके हैं। और तीसरा काग़ज़ मेरे पास है।”
“और?”
“और उसने कहा — ‘सुबह छह बजे अदालत का पिछला दरवाज़ा खुला रहेगा। वहाँ आ जाओ।’”
“और ये रात क्या करें?”
मैंने अपनी पोटली खोली। तीनों टोकन निकाले। उन्हें एक साथ रखा।
तीनों एक पल के लिए चुप रहे। फिर धीरे-धीरे गरम होने लगे। इतने गरम कि मेरी हथेली जलने लगी। पर मैंने छोड़ा नहीं।
फिर एक आवाज़ आई — तीनों में से एक साथ, धीमी, साफ़:
“चौथा खाँचा।”
मैंने बंसी और रोशन की तरफ़ देखा।
“चौथा खाँचा?” रोशन ने कहा।
मैंने हवेली की दीवार की तरफ़ देखा — जहाँ तीसरा खाँचा था, उसके नीचे, ज़मीन के पास, एक पत्थर था जो बाकी पत्थरों से अलग रंग का था।
मैंने वो पत्थर हटाया।
नीचे एक छोटा खाँचा था। उसमें एक पुरानी पर्ची थी।
मैंने उसे निकाला।
उस पर लिखा था — “हिसाब चार का है। तीन तो जाग गए, चौथा बाकी है। चौथा उसके पास रखो जो सबसे आख़िर में आएगा। वो तुम्हारा ही होगा।”
बंसी ने वो पर्ची पढ़ी। फिर मेरी तरफ़ देखा।
“चौथा मतलब?” उसने पूछा।
मैंने पर्ची जेब में रखी। मैंने रोशन की तरफ़ देखा। वो अपने टोकन को देख रहा था — उस पर कुछ नहीं उभरा था।
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर सुबह अदालत में तो जाना ही है।”
बंसी ने साइकिल उठाई। रोशन मोटरसाइकिल की तरफ़ बढ़ा।
तभी हवेली के अंदर से एक तेज़ आवाज़ आई — किसी चीज़ के टूटने की। फिर एक कराह। फिर भवानी की आवाज़, जो इस बार डर रही थी:
“नहीं… ये क्या… ये मेरे हाथ में…”
हम तीनों रुके।
हवेली का गेट खुला। भवानी बाहर आया — अकेला, बिना ड्राइवर, बिना आदमी। उसके हाथ में अपना टोकन था — पर टोकन का रंग बदल रहा था। पीतल से लाल, लाल से कोयले जैसा काला।
उसने टोकन गिरा दिया। टोकन ज़मीन पर गिरा और फूट गया — कई टुकड़ों में।
भवानी घुटनों पर आ गया। उसने अपने टुकड़ों को उठाने की कोशिश की, पर उसकी उँगलियाँ जल रही थीं।
मैं आगे बढ़ा। बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। “रुक।”
“देख तो,” मैंने कहा।
भवानी ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था — पर गुस्से का, डर का नहीं।
“तूने क्या किया?” उसने कहा। “तूने क्या किया मेरे टोकन से?”
“मैंने कुछ नहीं किया,” मैंने कहा।
“तो ये क्यों गिरा? ये क्यों टूटा?”
“क्योंकि तेरा हिसाब पूरा हो गया।”
वो उठा। उसने टुकड़े उठाकर अपनी जेब में डाले।
“मेरा हिसाब पूरा नहीं हुआ,” उसने कहा। “मेरा हिसाब तो अभी शुरू हुआ है।”
वो अपनी जीप की तरफ़ गया। मैंने उसे रोका नहीं।
बंसी ने फुसफुसाया, “उसका टोकन टूट गया। ये अच्छी बात है या बुरी?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर एक बात पक्की है — अब वो हिसाब उसके हाथ में नहीं है।”
रोशन ने धीरे से कहा, “तो अब किसके हाथ में है?”
मैंने अपनी पोटली में हाथ रखा। तीनों टोकन चुप थे। ठंडे।
“किसी के हाथ में नहीं,” मैंने कहा। “अब हिसाब खुद चलेगा।”
हम तीनों वहाँ से निकले। बसवा की हवेली पीछे छूट गई। भवानी की जीप दूर किसी मोड़ पर अंधेरे में घुल गई।
रास्ते में रोशन ने पूछा, “अगर भवानी का टोकन टूट गया, तो उसका हिसाब किस पर बैठेगा?”
बंसी ने साइकिल धीमी की।
“मेरे पापा कहते थे,” मैंने कहा, “कि हिसाब कभी मरता नहीं। टोकन टूटा है, हिसाब नहीं।”
रोशन चुप हो गया।
तभी मेरी जेब में कुछ हिला। मैंने हाथ डाला — तीनों टोकन में से एक गरम था। बसवा वाला।
मैंने उसे निकाला। उस पर एक नाम उभर रहा था, धीरे-धीरे, अक्षर दर अक्षर:
“विक्रम।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
“विक्रम?” बंसी ने कहा। “भवानी का बेटा?”
मैंने टोकन जेब में रखा और साइकिल की रफ़्तार बढ़ा दी।
“हवेली चलो,” मैंने कहा। “अब कुछ बड़ा होने वाला है।”
॥
रोशन की मोटरसाइकिल बसवा की हवेली से निकली तो पीछे बंसी की साइकिल थी और उस पर मैं। सड़क सूनी थी, दूर किसी खेत से पानी की आवाज़ आ रही थी, और मेरी जेब में तीन टोकन थे — एक चुप, दो बेजान।
“बंसी,” मैंने कहा, “दुकान चल।”
“अभी? रात के ग्यारह बज रहे हैं।”
“दुकान खोलनी है। बात करनी है।”
बंसी ने साइकिल नहीं रोकी, बस पैडल मारता रहा। “क्या बात करनी है जो घर में नहीं हो सकती?”
“जो बात माँ और रीना के सामने नहीं हो सकती।”
वो चुप हो गया।
रोशन ने मोटरसाइकिल हमारे साथ-साथ चलाई। मैंने उसे हाथ से इशारा किया। “तू घर जा। सुबह छह बजे अदालत के पीछे मिलना। रामदीन को भी लेकर आना अगर मिल जाए।”
“और ये टोकन?”
“मेरे पास रहेंगे।”
वो रुका। फिर बोला, “मामा कहते थे, टोकन उसी के पास रहता है जो सबसे आख़िर में आता है।”
“तो तू क्यों परेशान है?”
उसने मोटरसाइकिल घुमाई और अंधेरे में गायब हो गया।
बंसी की दुकान पर शटर आधा खुला था। अंदर लालटेन जल रही थी — बंसी ने हमेशा एक लालटेन रखी थी, बिजली जाने के लिए। उसने शटर पूरा ऊपर धकेला, अंदर जाकर चूल्हे पर केतली रखी, और बिना मुड़े बोला, “बोल।”
“पहले तू बैठ।”
“मैं खड़ा ठीक हूँ। बोल क्या हुआ।”
मैंने पोटली खोली और तीनों टोकन मेज़ पर रख दिए। बंसी की नज़र उन पर पड़ी। उसका हाथ केतली पर रुक गया।
“तीन?” उसने कहा।
“तीन। मेरा, भवानी का टूटा हुआ, और बसवा वाला। और बसवा वाला बोल रहा है — विक्रम।”
बंसी ने केतली उतारी। चाय का कप नहीं लिया। वो सीधा आकर मेरे सामने बैठ गया — पहली बार।
“मन्नू,” उसने कहा, “मैं तुझे एक बात बताने वाला हूँ। बीस साल से टाल रहा हूँ।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तेरे पापा की बही में मेरा नाम है। तू जानता है। पर तू नहीं जानता क्यों है।”
मैं चुप रहा।
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