The Token System – Chapter 15
"आपने मेरे दादा को इन्हीं काग़ज़ों से फँसाया था?"
"तेरे दादा ने खुद फँसाया था।"
"और शेखर बाबू को?"
"शेखर को मैंने नहीं उठाया।" उन्होंने पानी का गिलास उठाया। ऊपर से एक घूँट लिया। "शेखर बेटी की शादी के लिए बहुत पैसा चाहता था। मैंने उसे दिया। वह नहीं चुका पाया। अब उसका हिसाब मेरे पास है। वह भाग गया। मेरे आदमी उसे ढूँढ रहे हैं।"
"भाग गया?"
"कल रात। अपनी बेटी को लेकर।" भवानी ने गिलास रखा और मुझे देखा। "अब बता, मन्नू — एक आदमी अपने आप भागता है या किसी ने उसे भगाया?"
मेरा मुँह सूख गया। अगर शेखर भागा है तो गवाही का क्या? और वह बही — जो मैंने उसे दी थी, वो कहाँ है?
"मेरी बही लौटा दो," मैंने कहा।
"कौन सी बही?"
"आपको पता है।"
भवानी मुस्कुराए। वो मुस्कान आज सबसे डरावनी चीज़ थी। "तू बच्चा है, मन्नू। बही काग़ज़ है। काग़ज़ चोरी होते हैं, जल जाते हैं। असली हिसाब यहाँ होता है।" उन्होंने अपने सीने पर हाथ रखा। "और यहाँ से कोई नहीं चुरा सकता।"
टोकन फिर गरम हुआ — अब की बार धीरे-धीरे, जैसे कोई अंगीठी सुलग रही हो।
भवानी ने अपना टोकन उठाया और मेरी ओर बढ़ाया। "इसे हाथ लगा। बस एक बार। देख, क्या होता है।"
"नहीं।"
"डरता है?"
"हाँ," मैंने कहा। "आपकी चीज़ों से।"
भवानी हँसे ज़ोर से, और उनके पीछे खड़े दोनों आदमी भी हँसे — ऐसे जैसे कोई खिलौना चलाया गया हो।
"जा," उन्होंने कहा। "शाम हो गई है। कल सुबह तक सोच ले। एक साल, मन्नू। एक साल में तेरी बहन की शादी हो जाएगी, तेरी माँ को दवा मिल जाएगी, और तू मेरी तरह का आदमी बन जाएगा।" उन्होंने मुझे पानी का गिलास या चाय नहीं दी। "और हाँ — तेरा वो काग़ज़, जो तेरे दादा ने छुपाया था। वो मेरे पास है। एक दिन तुझे उसे लेने भी आना पड़ेगा।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा।
"मन्नू।" उनकी आवाज़ बदली। "शेखर बाबू की बेटी से मिलना चाहे तो मिल लेना। वो अक्सर झामा राम की गली में अपनी मौसी के घर आती है। कह देना — पापा जल्दी आएंगे।"
यह धमकी नहीं थी। यह रस्सी थी। मुझे उस पर चलना था।
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाहर निकला। गाड़ी पकड़ी। मोहल्ले की तरफ़ चला।
——
रात सवा नौ बजे बंसी की दुकान पर पड़े लोहे के बेंच पर मैं बैठा था, और चाय ठंडी हुई जा रही थी।
बंसी मेरे सामने खड़ा था, हाथ में गिलास। "तो उसने कहा — एक साल?"
"हाँ।"
"और तूने देखा उसकी उँगली को?"
"हाँ। काँप रही थी। दो बार।"
"दो बार।" बंसी ने गिलास मेज़ पर रखा और बैठ गया। "तो जब उसने कहा — मैंने शेखर को नहीं उठाया। उस वक़्त भी काँपी?"
"नहीं। उस वक़्त हाथ मेज़ पर था, पूरा। हिला नहीं।"
"मतलब शेखर सच में भागा है?"
"मतलब शेखर जानता था कि उसे उठाया जाएगा।" मैंने चाय उठाई। "भवानी ने उसे पैसा दिया था। शेखर ने बही देखी होगी तो समझ गया होगा कि सब बाहर आ जाएगा। वो रात ही भाग गया।"
"और बेटी?"
"उसने जान-बूझकर बताया," मैंने कहा। "कि शेखर की बेटी कहाँ मिलेगी। ताकि मैं वहाँ जाऊँ। ताकि मैं उसकी रस्सी पर चलूँ।"
बंसी ने सिर खुजाया। "तो अब?"
"अब टोकन कुछ और कह रहा है।" मैंने जेब से टोकन निकाला। ठंडा था। मैंने बंसी की तरफ़ बढ़ाया।
"हटा इसे," वो पीछे हटा। "मैंने तुझे बोला था ना — मुझे नहीं दिखाना। चल, रख वापस।"
"काग़ज़ ढूँढना है," मैंने कहा। "रामगंज, पुरानी गली। ज़मीन का काग़ज़।"
"रामगंज की पुरानी गली?" बंसी ने सोचा। "वहाँ तो… अरे हाँ। वहाँ काकी रहती हैं। मोहल्ले की बूढ़ी औरत। उनका पोता है — छोटू। जिसे तूने अस्पताल पहुँचाया था।"
"छोटू? वो काकी का पोता है?"
"हाँ। छोटू। जिसकी माँ —" बंसी रुका। "जिसकी माँ खेत्री वाली है। जो अस्पताल में है।"
मेरे हाथ से चाय का गिलास ज़रा सा हिला। जिस बच्चे को मैंने दो दिन पहले बुख़ार में तपते देखा था, वो उसी औरत का बेटा है जो अस्पताल में छोटू के पास बैठी है। और छोटू… छोटू तो वही है जो खेत्री में मिट्टी में लकीरें गिन रहा था।
"ये आपने पहले क्यों नहीं बताया?"
"मुझे क्या पता था कि ये जुड़ेगा," बंसी ने हाथ फैलाए। "काकी की ज़मीन का काग़ज़! अरे मन्नू — काकी की ज़मीन भवानी को चाहिए। तीन साल से ठाकुर के आदमी उनके पीछे पड़े हैं। काग़ज़ खो गया है और उन्हें याद भी नहीं कि कब खोया।"
"तो काग़ज़ किसके पास है?"
"यही तो पता नहीं। कोई कहता है कि काकी के पोते के बाप ने किसी को दे दिया था। कोई कहता है कि ठाकुर के आदमी उठा ले गए। बूढ़ी औरत पागल सी हो गई है — बस यही बोलती है, 'मर जाऊँगी पर काग़ज़ नहीं दूँगी।'"
मैंने टोकन जेब में रखा और उठ खड़ा हुआ।
"अबे, रात के दस बज रहे हैं। कहाँ?"
"सुबह जाना है," मैंने कहा। "पर सुबह से पहले एक काम है।"
"क्या?"
"शेखर की बेटी। झामा राम की गली। अगर भवानी ने उसका नाम मुझे दिया है तो उस आदमी की नीयत साफ़ नहीं है। उस लड़की को कल तक कुछ हो गया तो हम सब मिलकर उसी के हिसाब में फँस जाएंगे।"
बंसी मेरे पीछे चल पड़ा। "मैं साथ चलता हूँ। पर एक बात — मैं अंदर नहीं जाऊँगा।"
"तू गली के मोड़ पर रुक जाना," मैंने कहा। "और अगर मैं आधे घंटे में लौटा नहीं, तो सीधा डॉक्टर सुमन को फ़ोन करना।"
"वो क्या करेगी?"
"वो डॉक्टर है। डॉक्टरों से पूछताछ के लिए पुलिस जल्दी आती है।"
बंसी ने कुछ सोचा, फिर हँसा। "तू अब पहले जैसा नहीं रहा, मन्नू।"
"कैसा?"
"डरता तो तू अब भी है। पर अब डर के साथ हिसाब भी जोड़ता है। चल।"
——
झामा राम की गली रामगंज के उस हिस्से में थी जहाँ पुराने दरवाज़े अब भी लकड़ी के थे और हर आँगन में एक नीम। रात के सवा दस बजे गली में एक बत्ती जल रही थी और कुत्ता कहीं भौंक रहा था।
मैंने तीसरा मकान खटखटाया — छोटा, नीला दरवाज़ा, ऊपर एक बंद खिड़की।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला। सामने एक औरत खड़ी थी, पचास के आसपास, सिर पर दुपट्टा। पीछे एक लड़की बैठी थी — करीब बीस साल की, आँखें सूजी हुईं।
"कौन?" औरत ने कहा।
"शेखर बाबू की बेटी यहाँ है?" मैंने पूछा। "मैं मनोहर हूँ। अस्पताल में काम करता हूँ। शेखर बाबू के साथ काम करता था।"
लड़की उठ खड़ी हुई। "पापा कहाँ हैं? आपको पता है?"
"नहीं पता," मैंने कहा। "पर मुझे लगता है वो सुरक्षित हैं। उन्होंने किसी को कुछ बताया था?"
"वो रात बारह बजे आए थे," लड़की ने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "एक मोटी सी बही लेकर आए थे। मौसी से बोले — इसे कहीं छुपा दो। फिर मुझे गाड़ी में बैठाया और यहाँ छोड़ गए। बोले, सुबह आ जाऊँगा।"
"बही?" मेरी साँस रुकी। "कौन सी बही? कहाँ है?"
औरत ने कुछ सोचा। फिर लड़की की तरफ़ देखा। लड़की ने सिर हिलाया।
औरत अंदर गई और एक मिनट बाद एक मोटी, काली जिल्द वाली बही लेकर आई। किनारे से जर्जर। पहला पन्ना खुलते ही मैंने भवानी के दादा की लिखाई पहचानी — वही जो मैंने हवेली में देखी थी।
मेरे हाथ काँपे। मैंने बही नहीं खोली।
"इसे वापस उसी जगह रख दो," मैंने कहा। "किसी को न बताओ। कल सुबह दस बजे मैं और दो आदमी आएंगे। उन्हें यह बही देनी है। तब तक ये तुम्हारे पास है।"
"आप इसे क्यों नहीं ले जाते?" लड़की ने पूछा।
"क्योंकि अगर भवानी के आदमी कल रात मुझे उठा ले गए," मैंने कहा, "तो यह बही तुम्हारे पास रहे तो वो ज़िंदा रहेगी। मेरे पास रहे तो ख़त्म।"
मैं बाहर निकला। गली के मोड़ पर बंसी खड़ा था, सिगरेट जलाए हुए — जो उसने दस साल से नहीं पी थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno