The Token System – Chapter 118
"जिसकी माँ तीसरी मंज़िल पर है," मैंने धीरे से कहा। "चौथा दरवाज़ा। सीढ़ी चढ़कर दाएँ। चिड़िया का स्टिकर लगा है दरवाज़े पर।"
सोनल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। एक पल के लिए वो कुछ कहने को हुई, फिर रुक गई। पीछे से किसी नर्स ने आवाज़ दी — "सोनल, सुमन मैडम बुला रही हैं।" वो पलटी और तेज़ क़दमों से चली गई।
मैंने बोर्ड पर का काग़ज़ देखा। नीचे जो नई लाइन जुड़ी थी, उस पर लिखा था — रात ग्यारह बजे।
नाम नहीं लिखा था। जगह ख़ाली थी। बस क़लम की नोक रखी थी जहाँ नाम आना था।
मैं बोर्ड के पास से हट ही रहा था कि सुमन ने पीछे से आवाज़ दी।
"मन्नू।"
मैं मुड़ा। वो अपने केबिन के दरवाज़े पर खड़ी थी। मैं अंदर गया।
"सोनल ने काग़ज़ क्यों लगाया?" मैंने पूछा।
"मुझे लगता है वो कुछ जानती है। कुछ ऐसा जो हम नहीं जानते।"
"क्या?"
सुमन ने अपनी मेज़ की दराज़ खोली और एक छोटा काग़ज़ निकाला। मेरी तरफ़ बढ़ाया। उस पर एक फ़ोन नंबर था। नीचे एक लाइन — 'भवानी होम, आपके सवालों का जवाब।'
"ये कहाँ से आया?"
"सोनल के डेस्क से। मैंने उसकी गैरहाज़िरी में उठाया।"
"तुमने कॉल किया?"
"किया।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "उस तरफ़ से आवाज़ आई — 'हमें पता है तुम कौन हो। तुम्हारी मरीज़ की जान बचानी है तो रात नौ बजे से पहले होम के गेट पर आ जाओ। वरना सुबह सब साफ़ हो जाएगा।'"
"किसकी आवाज़ थी? मर्द या औरत?"
"औरत। बूढ़ी। काँपती आवाज़, जैसे अंदर से कोई बोल रहा हो।"
मेरा दिमाग़ तेज़ी से चला। "गंगा की आवाज़ हो सकती है। रसोई वाली।"
"कौन गंगा?"
"मैं तुझे बाद में बताता हूँ। मुझे अभी जाना है।"
"मन्नू—"
"सुमन, एक बात और कहूँ?" मैंने काग़ज़ उठाया। "ये नंबर मैं ले जा रहा हूँ। तुम सोनल पर नज़र रखो। अगर वो कहीं फ़ोन करे तो मुझे बताओ।"
"मैं डर रही हूँ।"
"तू डॉक्टर है। तू डरेगी तो वो अस्पताल में सब मरीज़ क्या करेंगे?"
वो कुछ नहीं बोली। मैं बाहर निकला।
वार्ड के गलियारे में जाते वक़्त मेरी नज़र गई — शालिनी की जगह अब सोनल खड़ी थी। उसने ड्रेस बदली थी, सिर पर एक छोटा-सा स्टार पिन लगा दिया था। और वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी।
पर उसके हाथ में वही काग़ज़ था। फिर से। एक ही काग़ज़, एक ही काग़ज़ — जैसे वो उसे छोड़ ही नहीं पा रही।
मैं सीधा बाहर आया। सड़क पर खड़ा होकर सोचा। पाँच बजे। बस पाँच बजे। उसके पहले मुझे गंगा से मिलना है। पर उसके पहले मुझे एक काम और करना है — वही जो मैंने शालिनी से कहा था।
मैंने मोबाइल निकाला और उस पुराने पुलिस वाले का नंबर मिलाया जो विक्रम का जान-पहचान वाला था। दो रिंग बाद आवाज़ आई — "हाँ, कौन?"
"साहब, मैं मन्नू बोल रहा हूँ। विक्रम का दोस्त। एक ज़रूरी बात है।"
"बोल।"
"भवानी होम नाम का जो ठिकाना है, उसके अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है। रात में नौ बजे किसी महिला की जान जाने वाली है। मैं उसे निकालने जा रहा हूँ। अगर मुझे कुछ हो जाए तो आप उस होम की तीसरी मंज़िल पर पहुँचा ज़रूर देखेंगे।"
उस तरफ़ कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर वो बोला, "तू पागल है? पहले पता क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि अब तक मेरे पास सिर्फ़ काग़ज़ था। अब मेरे पास नाम है। और नाम के साथ समय भी।"
"किसका नाम?"
"मैं अभी नहीं बता सकता।"
"मन्नू—"
"साहब, मुझे भरोसा है आप मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे। पर मैं ये कॉल इसलिए कर रहा हूँ ताकि अगर मैं लौटूँ न लौटूँ, तो कम से कम मेरी बात काग़ज़ पर हो।"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "कहाँ मिलते हैं?"
"मैं पाँच बजे भवानी होम के पिछले रास्ते पर रहूँगा। अपने साथ दो आदमी लाइए। सिविल ड्रेस में।"
"पाँच बजे?"
"हाँ।"
"ठीक है। मैं आऊँगा। पर मन्नू — अगर तेरी बात झूठी निकली तो मैं तेरे ख़िलाफ़ केस करूँगा।"
"कर लीजिए। साहब, आप आ जाइए। बाक़ी सब मैं देख लूँगा।"
फ़ोन काटा। फिर मैंने घड़ी देखी। तीन बजे के थे। सिर्फ़ दो घंटे।
मैं वापस सुमन के पास गया। वो अभी भी केबिन में थी। मैंने दरवाज़ा खोला और बिना कुछ कहे उसकी मेज़ पर पड़ा एक स्टेथोस्कोप उठाकर देखा।
"क्या कर रहा है?" उसने पूछा।
"अगर रात में मुझे आपकी ज़रूरत पड़े तो फ़ोन करूँगा। बस एक बात पूछनी है। वो सरोज — उसकी तबीयत कैसी है?"
"मुझे कैसे पता? वो तो होम में है न।"
"नहीं। मैं पूछ रहा हूँ कि होम में रखने वालों की तबीयत किस हद तक खराब होती है? मतलब — अगर मैं किसी को वहाँ से निकालकर ले आऊँ, तो क्या वो चल सकती है? दौड़ सकती है?"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम क्या करने जा रहे हो?"
"कुछ नहीं। बस एक इंतज़ाम।"
"मन्नू, अगर तुम होम के अंदर घुसे और पकड़े गए तो—"
"तो मैं बच जाऊँगा। तुम मेरी नर्स हो, डर मत।"
"मैं तुम्हारी नर्स नहीं हूँ।"
"तो क्या हो?"
वो रुक गई। "मैं तुम्हारी… सुमन हूँ।"
मैं मुस्कुराया। "बस इतना ही?"
वो फ़ाइल में आँखें गड़ाए रही। पर उसके चेहरे पर लाली आ गई थी। मैंने और नहीं चिढ़ाया।
"मैं जा रहा हूँ। रात में फ़ोन आएगा। उठाना।"
मैं बाहर आया। अब सिर्फ़ दो घंटे।
मैं सीधा भवानी होम के पिछले रास्ते की तरफ़ चला। बंसी मुझे वहाँ मिला। वो मेरी तरफ़ देखकर उठ खड़ा हुआ।
"तू डरा हुआ लग रहा है," उसने कहा।
"मैं डरा नहीं हूँ। पर मुझे एक बात पता चली — लिस्ट पर मेरे एक जान-पहचान व
॥
"लिस्ट पर मेरे एक जान-पहचान वाला नाम है," मैंने कहा, "और उसके आगे आज की तारीख़ और रात नौ बजे का समय लिखा है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने उसके खोखे का हिसाब गड़बड़ कर दिया हो।
"कौन?"
"किशन लाल। सुमन का पहला मरीज़। पाँच साल पहले वाला।"
बंसी ने होंठ भींचे। फिर बोला, "तो तेरा मतलब वो लिस्ट मौत का हिसाब है।"
"लगता तो यही है।"
"और सरोज का नाम भी उसी पर है।"
मैंने सिर हिलाया। बंसी ने अपनी जेब से गुड़ की एक डली निकाली, मुँह में डाली, और बोला, "अब बता, तेरे पास पुलिस वाले का क्या जवाब आया?"
"पाँच बजे आ रहा है। दो आदमी संग।"
"अच्छा। तो अब हमें तीन काम करने हैं। एक — गंगा से मिलना। दो — शालिनी को ढूँढना। तीन — होम के अंदर का रास्ता तय करना।"
"शालिनी क्यों?"
"क्योंकि वो अंदर थी। उसे पता है कौन सा दरवाज़ा कब खुलता है, चौकीदार कब सोता है, रसोई किस वक़्त खाली होती है। और सबसे बड़ी बात — उसे पता है कि सोनल क्या कर रही है।"
मैं कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला, "पर शालिनी ने इस्तीफ़ा दे दिया। वो गाँव जा रही थी।"
"गई नहीं होगी अभी। इस्तीफ़ा दिया है तो सुबह दफ़्तर में काग़ज़ी कार्रवाई होगी। तब तक वो शहर में ही होगी।"
बंसी ठीक कह रहा था। मैंने मोबाइल निकाला। शालिनी का नंबर था मेरे पास, उसने कल रात ही दिया था जब वो रो रही थी। मैंने मिलाया। बेल बजती रही। कोई जवाब नहीं।
"नहीं उठा रही," मैंने कहा।
"तो चल। उसके घर चलते हैं।"
"तू कैसे जानता है उसका घर?"
बंसी मुस्कुराया। "मैं चाय बेचता हूँ। मेरे खोखे पर हर मोहल्ले की ख़बर आती है। शालिनी की माँ पहले मेरे यहाँ चाय पीती थी। वो झुग्गी में रहती थीं, नाले के पास। अब शालिनी अलग किराए के कमरे में रहती है। पीछे की गली, पीली दीवार वाला मकान।"
"तो चल।"
हम बंसी की गाड़ी से निकले। सड़क पर सुबह की भीड़ जुट रही थी। सब्ज़ी वाले बोरे लाद रहे थे। एक मंदिर के बाहर घंटी बज रही थी। मेरे हाथ जेब में थे, पोटली पर, और पोटली ठंडी थी। कोई कोना गरम नहीं।
पीली दीवार वाला मकान मिला, पर दरवाज़े पर ताला लगा था।
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