The Token System116 / 1154

The Token System – Chapter 116

7 min read November 6, 2026

"उस आदमी ने कहा था कि अगर मैं नहीं बताऊँगी तो मेरे पापा की दवा बंद हो जाएगी। और मैंने… मैंने डर के मारे…" वो फूट-फूटकर रोने लगी। "अब वो विक्रम को भी ढूँढेंगे। मैंने सब बिगाड़ दिया।"

मैंने उसका कंधा पकड़ा। "रुक। साँस ले।"

"मुझे माफ़ नहीं करना, भैया। मैं जानती हूँ मैंने गलती की। मैं इस्तीफ़ा दे दूँगी।"

"इस्तीफ़ा क्यों?"

"क्योंकि मैं इस लायक़ नहीं हूँ।"

मैंने उसे सीढ़ी की तरफ़ खींचा, जहाँ पीली बत्ती जल रही थी और कोई नहीं था। "सुन। तूने गलती की। पर तूने कबूल की। भवानी के आदमी से डरने में कोई बुराई नहीं। बुराई ये है कि तू अकेली डरी। अब तू अकेली नहीं है।"

उसने मेरी तरफ़ देखा, आँखें भरी हुई।

"अब आगे कुछ मत भेजना," मैंने कहा। "एक भी नाम, एक भी कमरा, एक भी तारीख़। समझी?"

"समझी।"

"और इस्तीफ़े की बात मत करना। तेरे पापा की दवा की फ़िक्र मत कर। वो मेरा काम है।"

उसने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठा दिया। "अभी जा। सुबह तक सो जा। और सुन — अगर कोई तुझे कुछ पूछे, तो कह देना कि सरोज का कमरा तीस नंबर वार्ड के पीछे वाला था। जो भेजा था, वही दोहरा देना।"

वो सिर हिलाकर चली गई। मैं वहीं सीढ़ी पर बैठ गया और घड़ी देखी। तीन बजने में पंद्रह मिनट थे।

मैंने जेब से पोटली निकाली। टोकन ठंडा था। न कोई आवाज़, न कोई शब्द। बस एक कोना, जो हल्का गरम था। मैंने उसे वापस रखा और सीढ़ी पर सिर टिका दिया।

सुबह सात बजे मैंने विक्रम को फ़ोन किया। वो बंसी की दुकान के पीछे वाले कमरे में सो रहा था — मैंने उसे वहीं रखा था, अपने घर नहीं भेजा, क्योंकि भवानी के आदमी मेरे घर की निगरानी कर रहे थे।

"उठ," मैंने कहा। "दुकान पर आ।"

वो दस मिनट में आ गया। बाल बिखरे, आँखें सूजी हुई। बंसी चाय बना रहा था और गिलास पोंछ रहा था।

"क्या बात है?" विक्रम ने पूछा। "इतनी सुबह?"

मैंने उसे काग़ज़ दिया। वो लिस्ट जो सफ़ेद कोट वाले आदमी से छीनी थी। तीन नाम थे — शकुंतला देवी, गेंदा देवी, किशन लाल। और नीचे एक चौथा नाम, जो आज सुबह जोड़ा गया था, स्याही अभी सूखी नहीं थी।

सरोज।

विक्रम का हाथ काँपने लगा। "ये… ये मेरी माँ का नाम क्यों है?"

"क्योंकि शालिनी ने डर के मारे तेरी माँ का कमरा भवानी के आदमी को भेज दिया था।"

वो उठने लगा। "मैं अभी होम जाता हूँ—"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। "बैठ। तेरी माँ वहाँ नहीं है।"

"क्या?"

"रात ही उसे निकाल लिया। वो सुमन के घर के पीछे वाले कमरे में है। सुरक्षित।"

विक्रम फिर से बैठ गया। उसने दोनों हाथ मुँह पर रख लिए। कुछ देर कुछ नहीं बोला। फिर धीरे से बोला, "फिर ये नाम क्यों जोड़ा है उन्होंने?"

"क्योंकि उन्हें लगता है कि वो वहाँ है। और वो उसे ढूँढने आएँगे।"

विक्रम ने मेरी तरफ़ देखा। "तो क्या फ़ायदा? वो उसे ढूँढ लेंगे।"

"नहीं," मैंने कहा। "क्योंकि वो उसे एहसान से नहीं ढूँढेंगे। वो उसे डर से ढूँढेंगे। और जो डर से ढूँढता है, वो गलत जगह ढूँढता है।"

बंसी ने चाय रख दी। "अब बता," उसने कहा, "हम क्या करने वाले हैं?"

"तेरी दुकान आज खुलेगी?"

"खुलेगी। क्यों?"

"क्योंकि आज तेरी दुकान पर कुछ सब्ज़ी वाली औरतें आएँगी। भवानी के होम की रसोई में काम करने वाली। मुझे उनसे बात करनी है।"

बंसी ने भौंहें चढ़ाईं। "तू उन्हें कैसे पहचानेगा?"

"मैं नहीं पहचानूँगा। तू पहचानेगा। तू उन्हें बोल देगा कि चाय पीने आएँ।"

बंसी हँसा। "पचास साल का आदमी हूँ, मैंने कभी सब्ज़ी वाली औरतों से चाय की बात नहीं की।"

"आज कर लेना।"

वो कुछ बोलने ही वाला था कि मेरा फ़ोन बजा। स्क्रीन पर सुमन का नाम था।

"मन्नू," उसकी आवाज़ तेज़ थी, "तुरंत अस्पताल आ जा।"

"क्या हुआ?"

"शालिनी ने इस्तीफ़ा दे दिया है।"

मैं खड़ा हो गया। "क्या?"

"सुबह छह बजे आई थी। इस्तीफ़े की चिट्ठी मेज़ पर रखी है और वो वार्ड से अपनी चीज़ें उठा रही है। मैंने उसे रोकने की कोशिश की, पर वो नहीं मानी।"

"मैं आ रहा हूँ।"

मैंने फ़ोन रखा और विक्रम को देखा। "तू यहीं रुक। बंसी के साथ। जब तक मैं आऊँ, कहीं मत जाना।"

"मन्नू," विक्रम ने कहा, "मेरी माँ…"

"तेरी माँ सुरक्षित है। मेरी बात मान।"

मैंने ऑटो पकड़ा और अस्पताल की तरफ़ चल पड़ा। आधे रास्ते में एक सफ़ेद जीप मुझे ओवरटेक करके आगे निकली। उसमें दो आदमी बैठे थे। मैंने मुँह नहीं खोला। मैंने बस अपना सिर नीचे रखा और ऑटो वाले से कहा, "भाई, ज़रा तेज़ चलो।"

अस्पताल पहुँचकर मैं सीधा वार्ड की तरफ़ भागा। गलियारे में सफ़ाई की गाड़ी खड़ी थी, दो औरतें पोछा लगा रही थीं।

वार्ड के दरवाज़े पर सुमन खड़ी थी। सफ़ेद कोट, हाथ में फ़ाइल।

"अंदर आ," उसने कहा।

मैं अंदर गया। मेरी नज़र सीधी उस जगह गई जहाँ शालिनी आमतौर पर खड़ी होती थी। वहाँ कोई और खड़ा था।

बीस-पच्चीस की एक लड़की। सफ़ेद नर्स की ड्रेस, हाथ में काग़ज़, आँखें नीची। उसके हाथ में वही काग़ज़ था — वही जिस पर रात भर के नामों की लिस्ट थी।

मैंने सुमन की तरफ़ देखा।

"ये कौन है?" मैंने पूछा।

"नई नर्स," सुमन ने कहा। "सुबह आठ बजे जॉइन की है।"

"किसने भेजा?"

"वही," सुमन ने धीरे से कहा। "ऊपर से।"

मैंने लड़की की तरफ़ देखा। वो काग़ज़ पढ़ रही थी — वही लिस्ट, वही नाम। और उसका हाथ उस काग़ज़ पर इस तरह टिका था जैसे कोई हिसाब देख रही हो।

"ये काग़ज़ कहाँ से आया?" मैंने पूछा।

लड़की ने सिर उठाया। "मुझे सुबह चार्ज़ देते वक़्त मिला। कहा गया कि इन मरीज़ों का हाल देखना है।"

"किसने कहा?"

"मेरे सुपरवाइज़र ने।"

सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे गलियारे में खींच लिया।

"शालिनी कहाँ है?"

"पीछे, स्टोर रूम में। अपनी लॉकर खाली कर रही है। और मन्नू — शालिनी ने इस्तीफ़े में एक बात लिखी है।"

"क्या?"

सुमन ने चिट्ठी मेरे हाथ में दी। मैंने पढ़ी। शालिनी की साफ़ लिखाई थी — "मैंने डर के मारे अपनी ड्यूटी से गद्दारी की। मुझे माफ़ी नहीं चाहिए। मुझे बस ये चाहिए कि मेरी जगह कोई ऐसा न आए जो उनके इशारे पर चले।"

मैंने चिट्ठी सुमन को वापस दी और स्टोर रूम की तरफ़ चला।

शालिनी अपना बैग उठा रही थी। मुझे देखकर रुक गई।

"तू आ गया," उसने कहा।

"इस्तीफ़ा वापस ले।"

"नहीं।"

"शालिनी—"

"मन्नू भैया," उसने बैग कंधे पर टाँगा, "तूने मुझे रात में सही बात कही थी। मैं अकेली डरी थी। अब मैं अकेली नहीं डरना चाहती। और इसके लिए मुझे यहाँ नहीं, बाहर से लड़ना है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू क्या करेगी?"

"मैं अपने गाँव जाऊँगी," उसने कहा। "वहाँ एक स्कूल है। उन्हें एक नर्स चाहिए जो बच्चों को प्राथमिक इलाज सिखा सके। मैंने सोच लिया है।"

"और तेरे पापा?"

"तूने कहा था न — वो तेरा काम है।" उसने मुझे देखा। "मैं तुझ पर भरोसा कर रही हूँ, भैया।"

मैं कुछ नहीं बोला। फिर बोला, "जब मिले, तुझे लिस्ट वाली काग़ज़ नहीं दूँगा। बस एक चीज़ दूँगा — उस लड़की का नाम जो अभी तेरी जगह काग़ज़ लेकर खड़ी है।"

"क्यों?"

"क्योंकि उसका हाथ उस काग़ज़ पर इस तरह टिका था जैसे वो उसे पहले से जानती हो। मुझे लगता है वो भवानी की आदमी है।"

शालिनी ने बैग नीचे रख दिया। "उसका नाम सोनल है। सुबह ही आई थी। दो महीने पहले भी एक बार आई थी, तब मैंने उसे देखा था — भवानी के होम के गेट पर।"

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो गलियारे में खड़ी सब सुन रही थी।

"तो अब क्या?" सुमन ने पूछा।

मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। "तू जा। अपने गाँव जा। और जब तक मैं बुलाऊँ, वापस मत आना।"

वो मुस्कुराई। पहली बार उस चेहरे पर कुछ ऐसा दिखा जो डर नहीं था। वो चली गई।

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