The Token System – Chapter 1148
“तेरे पास रहेगा?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“ठीक है,” उसने कहा, “पर मेरी एक बात है।”
“बोल।”
“जो भी उसमें हो, हम सब बैठकर खोलेंगे। घर में। आज रात।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और सिर हिलाया।
छह बजे हम घर लौटे। रीना जाते वक़्त रुकी और माँ से लिपट गई। आकाश ने मेरा हाथ पकड़ा और कुछ नहीं बोला, बस हिलाया। रामावत जी ने कार का दरवाज़ा खोला, फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
“मन्नू,” उन्होंने कहा, “तेरी बहन ने आज मुझे एक बात कही जो मैं भूलूँगा नहीं।”
“क्या कहा?”
“उसने कहा — मेरे भाई ने जो कमाया, वो सिर्फ़ मेरे लिए नहीं, किसी और की बेटी के लिए भी है।”
मैं कुछ नहीं बोला। गला भर आया था।
कार चली गई।
घर पहुँचकर माँ चाय बनाने लगी। बंसी दुकान से लौटकर आ गया — हालाँकि आज उसने दुकान खोली भी नहीं थी। वो हॉल के बाहर से सीधा हमारे घर आया।
“मैंने सोचा,” उसने कहा, “ये डिब्बा जब खुले, तब मैं भी होऊँ।”
“तू तो हर बात में होता है,” माँ ने कहा।
वो हँसा और चारपाई पर बैठ गया।
रात आठ बजे हम सब बैठे — मैं, माँ, बंसी। रीना अपने घर गई थी, पर उसने कहा था — “वीडियो बना लेना, मैं सुबह देखूँगी।”
मैंने डिब्बा बीच में रखा। पीतल की मोहर ऊपर चमक रही थी। मैंने ढक्कन खोला।
अंदर एक छोटी पीतल की डिबिया थी, जिस पर उल्टा कोना-चिह्न खुदा था। और डिबिया के नीचे एक पुराना पीला काग़ज़ मुड़ा हुआ।
मैंने काग़ज़ खोला। भवानी की लिखाई थी — वो लिखाई जो मैंने अदालत में देखी थी, जिससे उसने रजिस्टर पर दस्तख़त किए थे।
तीन लाइनें थीं।
“मनोहर,
तेरे पापा ने एक बार मुझसे कहा था — भवानी, हिसाब कभी किसी का नहीं होता, हिसाब ख़ुद एक आदमी है। मैंने उस दिन उसकी बात नहीं मानी।
आज मान रहा हूँ। ये डिबिया तेरे दादा की थी। इसे मैंने उस रात अपने पास रख लिया था, जब हवेली में सब कुछ बँट रहा था। इसमें वो चाबी है जो मेरे पास थी — और वो काग़ज़ जो मेरे पास नहीं होना चाहिए था। अब तेरा है। मेरा हिसाब साफ़ कर दे।”
काग़ज़ के नीचे एक चौथी लाइन थी, बहुत छोटी —
“माफ़ी नहीं माँगूँगा। पर इतना कहूँगा — तेरी तरह कभी न हिसाब लिखना।”
मैंने काग़ज़ माँ को दिया। उसने पढ़ा। लंबी साँस ली।
“क्या है डिबिया में?” बंसी ने पूछा।
मैंने पीतल की डिबिया खोली। अंदर एक चाबी थी — पुरानी, ज़ंग लगी, तीन दाँते वाली — और एक छोटा मुड़ा काग़ज़, जिस पर मेरा ही नाम लिखा था।
“मनोहर के लिए।”
मैंने काग़ज़ खोला। अंदर एक लाइन —
“जो तेरे पास है, वो तेरा ही है। मीना से मिल लेना। वो तेरे दादा की ही तरह हवेली में पली है — जानती है कि दीवार किस तरफ़ से बोलती है।”
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।
माँ ने कहा — “भवानी ने कभी अपने हाथ से कुछ नहीं लौटाया। ये पहली बार है।”
“ना,” बंसी ने कहा, “ये पहली बार नहीं। ये आख़िरी बार है।”
रात नौ बजे मैं आँगन में आया। टोकन जेब में था, ठंडा। पर्ची तकिये के नीचे रखी थी। माँ चूल्हे के पास बैठी थी। बंसी चारपाई पर पसर गया था।
तभी फोन बजा। सुमन का नंबर था।
“मन्नू,” उसने कहा, “रघुवीर का भेजा लिफ़ाफ़ा मैंने खोल लिया है।”
“क्या लिखा है?”
“मीना का पता। और एक लाइन — ‘तू उससे कल सुबह मिल लेना। वो तेरे पास ही है।’”
“मेरे पास?”
“हाँ। वो कहता है — मीना उस शहर में नहीं है जहाँ तू उसे ढूँढ रहा है। वो तेरे ही घर के पीछे वाली गली में रहती है।”
मैंने फोन रख दिया। हाथ काँप रहे थे।
माँ ने पूछा — “क्या बात है?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “कल सुबह थोड़ा काम है।”
“काम — शादी के बाद भी?”
“हाँ,” मैंने कहा। “आख़िरी काम।”
मैं वापस आँगन में आया, टोकन हाथ में लिया। ठंडा था। और तभी — मैंने देखा — उस पर एक नई लकीर उभर रही थी। धीरे-धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई पुराना काग़ज़ रोशनी में खुल रहा हो।
लकीर के नीचे एक शब्द बना —
मीना।
मैंने टोकन जेब में रख दिया, और आसमान की तरफ़ देखा। कहीं चाँद नहीं था, पर तारे थे — और आज उनमें से किसी ने मेरी तरफ़ देखा।
सुबह जब मैं उठा, माँ चाय बना रही थी और बंसी दरवाज़े पर खड़ा था। उसके हाथ में कोई पुरानी चीज़ थी।
“क्या है?” मैंने पूछा।
“पीली गली में एक औरत मिली,” उसने कहा। “कहती है — मीना उसके साथ रहती है। और वो तुझसे मिलना चाहती है।”
मैंने चाय का प्याला रख दिया।
“कब?”
“अभी,” बंसी ने कहा। “जितनी देर होगी, उतना हिसाब भारी होगा।”
और मैं जानता था — आज टोकन दीवार में रखने का दिन नहीं। आज वो हिसाब का आख़िरी पन्ना है — और उस पन्ने पर मीना का नाम लिखा है।
बंसी के पीछे-पीछे मैं पीली गली में पहुँचा। गली इतनी सँकरी थी कि दो आदमी कंधे से कंधा मिलाकर भी नहीं चल सकते थे। दोनों तरफ़ दीवारें, ऊपर मोटरों के तार, और नीचे एक पत्थर की नाली जिसमें आज पानी नहीं बह रहा था।
बंसी ने एक दरवाज़े पर दस्तक दी। तीन बार। फिर दो बार।
दरवाज़ा एक औरत ने खोला — साठ के आस-पास, सिर पर सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में लोहे की कड़छी।
"तू मन्नू है?" उसने मुझसे पूछा, बंसी को देखकर भी नहीं।
"हाँ।"
"अंदर आ। जूते बाहर।"
अंदर एक छोटा कमरा था, जिसमें तीन चीज़ें थीं — एक चारपाई, एक चूल्हा, और दीवार पर टँगी एक पुरानी तस्वीर। तस्वीर में एक हवेली थी, बरामदे में लोग खड़े थे। मैंने ध्यान से देखा — बीच में एक आदमी, मोटी मूँछ, सफ़ेद कुर्ता। भवानी सिंह। और उसके पीछे, एक कोने में, एक लड़की खड़ी थी, जिसका चेहरा धुँधला था।
"वो मैं हूँ," औरत ने कहा। "उस वक़्त मैं चौदह की थी। हवेली में बर्तन माँजती थी।"
"आप मीना की…"
"मीना मेरी बेटी है।" उसने चूल्हे से कड़ाही उतारी। "चाय पी।"
"मीना कहाँ है?"
"बाज़ार गई है। सब्ज़ी लेने।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर तू उससे मिलने नहीं आया। तू उस चीज़ के बारे में पूछने आया है जो भवानी ने तेरे नाम की है।"
मैं चारपाई पर बैठ गया।
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि भवानी ने मुझे भी एक काग़ज़ दिया था। उसी रात। जिस रात हवेली बँटी।" उसने चाय मेरे आगे रखी। "उसने कहा था — जिस दिन मनोहर का बेटा इस गली में आए, समझ लेना हिसाब का आख़िरी पन्ना खुल गया।"
बंसी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "और वो काग़ज़?"
औरत उठी, चूल्हे के पीछे से एक मिट्टी का घड़ा निकाला। घड़े में से कपड़े में लिपटा एक लिफ़ाफ़ा निकाला।
"ये," उसने कहा। "भवानी ने दिया था। कहा था — खोलना तब, जब मन्नू आए।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। खोला।
अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर भवानी की वही लिखाई थी। और साथ में एक फोटो — पुरानी, फटी हुई, जिसमें दो आदमी खड़े थे। एक भवानी सिंह। दूसरा… मेरे दादा। मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था, पर माँ के चेहरे से पहचाना — वही आँखें।
काग़ज़ पर लिखा था —
"मनोहर,
तेरे दादा ने मुझे ये फोटो दी थी, उस दिन, जब हम दोनों ने हवेली की नींव में पहला पत्थर रखा था। कहा था — भवानी, ये हवेली हम दोनों की है।
फिर सब बदल गया। तेरे दादा चले गए, और मैंने हवेली अपने नाम कर ली। उस दिन मैंने सोचा था — हिसाब चुक गया। पर हिसाब चुकता नहीं, वो सिर्फ़ दबता है।
ये फोटो रख। इसे देखकर याद रखना — हवेली की दीवारों के नीचे एक और नींव है, उस पहले पत्थर की, जिस पर दो नाम खुदे हैं। वो पत्थर आज भी है। तेरे हाथ में चाबी है, और दीवार में एक खिड़की है जो बोलती है।
मीना की माँ से माफ़ी माँग लेना। वो मेरी गलती की गवाह है।"
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