The Token System – Chapter 1135
"पहले बता," उसने कहा। "हवेली में रात क्या हुआ?"
आँगन में चिड़िया चहचहा रही थी। मैंने जेब में हाथ डाला — पर्ची वहीं थी।
"दीया जल रहा था," मैंने कहा। "अब बुझ गया।"
"बस?"
"बस।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़र में कुछ था — जैसे वो जानती हो कि मैंने कुछ छिपाया है। मगर उसने पूछा नहीं। उसने बस चाय का गिलास मेरी तरफ़ सरका दिया।
"पी," उसने कहा।
मैंने चाय पकड़ी। हाथ अब भी काँप रहा था — कैसे, ये मुझे ख़ुद नहीं पता।
तभी गली से दौड़ते क़दमों की आवाज़ आई। बंसी था — हाँफता हुआ, हाथ में मुड़ा हुआ अख़बार।
"मन्नू!" वो आँगन में घुसा। "अख़बार देख!"
"क्या हुआ?"
"देख पहले!"
मैंने अख़बार खोला। पहला पन्ना — और मेरी फोटो। सरकारी अस्पताल के गेट पर खींची हुई, उस दिन की, जब मैं एक्स-रे मशीन के नीचे सिर झुकाए खड़ा था। साथ में सुर्ख़ी —
"हवेली का हिसाब बराबर: अदालत ने सौंपा हक़, मन्नू ने दिखाया सच।"
मैंने दूसरी पंक्ति पढ़ी — "दो साल में एक सरकारी नौकर ने वो कर दिखाया जो सौ साल में कोई नहीं कर सका।"
मैंने अख़बार मेज़ पर रख दिया।
रीना ने उसे उठाया और ज़ोर से पढ़ना शुरू किया। "हवेली खेत्री नंबर तीन सौ सत्ताईस का मुक़दमा सोमवार सुबह समाप्त हुआ। अदालत ने फ़ैसला सुनाया कि हवेली का आधा हिस्सा मनोहर उर्फ़ मन्नू को और आधा कम्मो देवी को मिलेगा।"
"आगे पढ़," बंसी ने कहा।
रीना ने पन्ना पलटा। "पुलिस ने भवानी सिंह को हिरासत में लिया। ग्यारह परिवारों की ज़मीन उनके नाम पर हो गई। भवानी सिंह के बेटे अमर सिंह ने कहा — मैं अपना हिसाब ख़ुद चुकाऊँगा।"
माँ ने चिड़िया की तरह सिर उठाया। "अख़बार वाले को कैसे पता?"
"मुझे क्या पता," मैंने कहा। "पर नाम ठीक छपा है।"
माँ ने अख़बार मेरी तरफ़ से खींच लिया। उसने उसे चूल्हे के पास रखा — जहाँ पापा के पुराने काग़ज़ रखे थे।
"अब इसे सँभालकर रखना," उसने कहा। "यह भी एक हिसाब है।"
"अख़बार क्या हिसाब है?" रीना हँसी।
"अख़बार नहीं," माँ ने कहा। "ये जो छपा है।" उसने अख़बार की तरफ़ इशारा किया। "जब कोई औरत लड़ती है, तो लोग कहते हैं — ज़िद्दी है। जब कोई मर्द लड़ता है, तो लोग कहते हैं — हिम्मत है। तेरे इस काग़ज़ ने वो बदल दिया। ये बात याद रखना।"
मैंने गिलास उठाया। चाय ठंडी हो रही थी।
"अच्छा," रीना ने उठकर कहा, "मुझे स्कूल जाना है। बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं।"
"ग्यारह तारीख़ की लिस्ट?" मैंने पूछा।
"आज शाम को पूरी करेंगे।" वो दरवाज़े तक गई, फिर रुकी। "और हाँ — लालाजी का आदमी आया था। कह रहा था कि शादी में चावल वो देंगे।"
"मत लेना," मैंने कहा।
"पता है।" वो मुस्कुराई। "बोल दिया — हम अपने दाम से लेंगे।"
वो गई। मैं आँगन में बैठा रहा। माँ कुछ देर चूल्हे के पास बैठी, फिर उठी और अंदर चली गई। बंसी मेरे पास बैठ गया, अख़बार खुद पढ़ने लगा।
"ये अख़बार वाले को किसने भेजा?" उसने पूछा। "ख़बर तो कल रात की है।"
"सक्सेना जी," मैंने कहा। "या फिर शेखर बाबू। या कोई और।"
"अब क्या फ़र्क़ पड़ता है।" बंसी ने अख़बार बंद किया। "अब तो छप गया।"
"हाँ," मैंने कहा। "छप गया।"
थोड़ी देर बाद बंसी उठा।
"मैं दुकान जाता हूँ," उसने कहा। "शाम को ग्यारह तारीख़ वाली बात करेंगे।"
"अच्छा।"
"और सुन," उसने दरवाज़े से पुकारा। "तेरी फोटो अच्छी आई है।"
वो चला गया। मैं अकेला बैठा रहा — आँगन में, चाय के ठंडे गिलास के साथ।
मैंने जेब से पर्ची निकाली। "हिसाब बराबर। अब तेरा हिसाब तेरे हाथ।" मैंने उसे उलटा किया। पीछे कोई लिखाई नहीं थी। सिर्फ़ पुराना पीला काग़ज़ — और उसके कोने पर वो निशान, दो लकीरें और एक बिंदु, जो अब मुझे बिना सोचे पहचान आता था।
मैं उस पर्ची को जेब में डालकर उठा।
अंदर, माँ बैठी थी — पापा की पुरानी तिजोरी के सामने, हाथ में एक भूरा लिफ़ाफ़ा।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"बैठ," उसने कहा।
मैं बैठ गया। उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ सरकाया।
"ये तेरे पापा ने छोड़ा था। शेखर बाबू ने दिया था — कल रात, जब तुझे नहीं देख रहा था कोई।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर पापा की लिखाई — हरी स्याही में, छोटे-छोटे अक्षरों में।
"मनोहर," मैंने पढ़ा। "तू जब ये पढ़े, तो मैं नहीं रहूँगा। पर एक बात कह गया था — तू मेरी शक्ल का है, पापा की आदतों का नहीं। इसे याद रखना।"
मैंने आगे पढ़ा। "हवेली का हिसाब बराबर हो गया। मगर मेरा हिसाब — मेरा और तेरे बीच का — वो अब भी बाक़ी है। क्योंकि मैंने तुझे हवेली के हिसाब से दूर रखा। मैंने सोचा — बेटा दूर रहेगा तो सुरक्षित रहेगा। पर वो ग़लत था। सुरक्षित रहने के लिए सच से दूर नहीं, सच के साथ खड़ा होना पड़ता है।"
मैंने पन्ना नीचे रखा। माँ मेरी तरफ़ देख रही थी।
"बाक़ी पढ़," उसने कहा।
"माँ," मैंने कहा।
"पढ़।"
मैंने फिर पढ़ा। "अब जब हिसाब बराबर है, तो एक ही काम छोड़कर जाता हूँ — तेरे हाथ में। हवेली के नीचे वो पुराना कमरा है, जो कभी मैंने बंद किया था। उसकी चाबी शेखर बाबू के पास है। उसे खोलना। वहाँ जो मिलेगा, वो मेरा नहीं, तेरा है।"
मैंने पन्ना नीचे रख दिया।
"आज नहीं," माँ ने कहा। "कल। पहले अदालत। फिर वो कमरा।"
मैंने लिफ़ाफ़ा मोड़ा। "क्या है उस कमरे में?"
"मुझे नहीं पता," माँ ने कहा। "पर तेरे पापा कुछ भी बिना वजह नहीं करते थे।"
मैं उठा। "चाय बनाऊँ?"
"बना।"
मैं रसोई में गया। चूल्हे के पास अख़बार रखा था। मैंने उसे फिर पढ़ा — इस बार धीरे। "ग्यारह परिवारों की ज़मीन लौटेगी।" मैंने सोचा — ग्यारह। पता नहीं कौन-कौन हैं। पर अब इंतज़ार नहीं करना। ख़ुद जाना होगा, ख़ुद मिलना होगा।
चाय बनी। मैंने दो गिलास भरे और बाहर लाया।
तभी गली से साइकिल की घंटी बजी। मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
एक डाकिया था — खाकी कपड़ों में, सिर पर गमछा, साइकिल पर झोला टँगा हुआ।
"मनोहर?" उसने पूछा।
"हाँ।"
उसने झोले से एक लिफ़ाफ़ा निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया। सफ़ेद लिफ़ाफ़ा — ऊपर सिर्फ़ "मनोहर" लिखा था। कोई पता नहीं। कोई डाक-टिकट नहीं। बस नाम — और उसके नीचे वही निशान, दो लकीरें और एक बिंदु।
मैंने लिफ़ाफ़ा पकड़ा। वो भारी नहीं था, पर हाथ में आते ही मुझे लगा — कुछ है अंदर।
"किसने दिया?" मैंने पूछा।
डाकिया वापस मुड़ने लगा।
"एक औरत थी," उसने कहा। "गली के मोड़ पर खड़ी थी। बोली — मनोहर को देना। बस इतना कहकर चली गई।"
"कैसी औरत?"
वो रुका। सोचता रहा।
"सफ़ेद दुपट्टा," उसने कहा। "और हाथ में एक डिबिया थी — पीतल की।"
मेरा हाथ लिफ़ाफ़े पर जम गया।
"कहाँ गई?"
"पता नहीं।" डाकिया साइकिल पर बैठा। "बस लिफ़ाफ़ा देना था, दे दिया।"
वो चला गया। घंटी बजती गई, दूर तक।
मैं आँगन में खड़ा रहा। अँगूठे से लिफ़ाफ़े का किनारा सहलाता रहा।
माँ ने पीछे से कहा, "क्या है?"
मैंने लिफ़ाफ़ा पलटा। पीछे भी कुछ नहीं लिखा था।
"पता नहीं," मैंने कहा। "अभी देखता हूँ।"
पर मैंने खोला नहीं। मैंने उसे जेब में रखा — पर्ची के ऊपर — और चाय का गिलास उठाया।
"पहले चाय," मैंने कहा। "लिफ़ाफ़ा बाद में।"
माँ मुस्कुराई।
"यही सही रास्ता है," उसने कहा।
मैंने चाय पी। सुबह की धूप अब पूरे आँगन में फैल गई थी। रीना की लिस्ट मेज़ पर पड़ी थी — ग्यारह तारीख़, मंडप, चावल, घी।
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