The Token System – Chapter 1132
दो बजे मैंने सुमन को कमरा सौंपा और बाहर निकला। धूप तेज़ थी। बंसी की दुकान तक पैदल गया। वो बेंच पर बैठा था, हाथ में चाय, और सामने एक आदमी खड़ा था जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा।
आदमी लंबा था, पचास के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, कंधे पर झोला। बंसी जैसे ही मुझे देखा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"मन्नू," वो उठा। "ये… ये कह रहा है कि उसे हवेली का काग़ज़ मिला है।"
আদमी ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम मन्नू हो?"
"हाँ। तुम कौन हो?"
"मेरा नाम शंकर है। मैं उस हवेली में पच्चीस साल माली था।" उसने झोले से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। "बीस साल पहले मुझे ये दिया गया था। कहा गया था — जब हवेली का हिसाब बराबर हो जाए, तब ये किसी को देना। जिसके नाम पर हो, उसे।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। उस पर मेरा नाम नहीं था। उस पर एक नाम लिखा था — रामकिशन। मेरे पापा का नाम।
मैंने बंसी को देखा। बंसी ने धीरे से कहा, "मैंने इसे नहीं बुलाया। ये ख़ुद आया।"
"अंदर आओ," मैंने शंकर से कहा। "बैठो।"
हम तीनों दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठे। शंकर ने चाय का प्याला दोनों हाथों से पकड़ा और कहा, "तेरे पापा उस हवेली में आते थे। उस वक़्त भवानी के पिता राज करते थे। तेरे पापा कुछ काग़ज़ लाते, कुछ ले जाते। मैं माली था, मुझे कुछ समझ नहीं आता था। पर एक दिन तेरे पापा ने मुझे ये लिफ़ाफ़ा दिया और कहा — शंकर, अगर मैं न रहूँ, तो इसे उसी दिन खोलना जिस दिन हवेली का हिसाब बराबर हो।"
"तुमने अब तक क्यों नहीं खोला?" मैंने पूछा।
"क्योंकि हिसाब बराबर अब हुआ है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अख़बार में पढ़ा। फिर सोचा — अब वक़्त आ गया।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर पापा की लिखाई थी। बस चार लाइनें थीं। "जो टोकन मेरे पास है, वो मेरा नहीं। वो मेरे बेटे का है। मैंने उसे गिरवी रखा था, क्योंकि मुझे पैसे चाहिए थे — मन्नू की पढ़ाई के लिए। अगर ये काग़ज़ किसी को मिले, तो बता देना कि उसका बाप कर्ज़दार नहीं रहा। उसकी फ़ीस उसी टोकन से चुकी है।"
मेरे हाथ काँपे। बंसी ने काग़ज़ पढ़ा और कुछ नहीं बोला। शंकर ने चाय ख़त्म की और उठा। "बस इतना ही कहना था। मुझे अब जाना है।"
"रुको," मैंने कहा। "तुम हवेली में पच्चीस साल रहे। वहाँ अब कौन आता-जाता है?"
शंकर रुका। "ताला लगा है। पर कल रात मैं वहाँ से गुज़रा था। दीया जल रहा था।" उसने मेरी आँखों में देखा। "और आँगन में एक आदमी बैठा था। सफ़ेद बाल, पुरानी शर्ट। मैंने उसे पहचाना नहीं। पर वो तेरा नाम बोल रहा था।"
"मेरा नाम?"
"हाँ। बार-बार। जैसे कोई पुकार रहा हो।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। "मैं तुझे सलाह दूँगा — अकेले मत जाना।"
वो चला गया। बंसी ने कुर्सी पीछे की और बोला, "मैं चलूँगा तेरे साथ।"
"नहीं।"
"मन्नू—"
"बंसी, ये मेरे पापा का हिसाब है। मैं अकेले जाऊँगा।" मैंने काग़ज़ जेब में रखा। "पर तू एक काम कर। राजेंद्र को बता दे। वो गेट पर बैठता है। उसे पता होना चाहिए कि आज रात कोई हवेली में घुसा है।"
शाम छह बजे मैं हवेली के गेट पर खड़ा था। राजेंद्र वहीं था, चाय का प्याला हाथ में, पर आज उसकी आँखें लाल थीं।
"तुझे पता था?" मैंने पूछा।
"क्या?"
"कि भीतर कोई है।"
राजेंद्र ने प्याला रखा। "कल रात से आवाज़ें हैं। मैंने झाँका था। पर दरवाज़ा नहीं खुला। ताले में चाबी घूमी, पर दरवाज़ा जैसे किसी ने भीतर से पकड़ रखा हो।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये हवेली का खेल नहीं है। ये कुछ और है।"
"तुम मेरे साथ चलोगे?"
"मैं तेरे पीछे-पीछे आऊँगा। भीतर मैं नहीं जाऊँगा।"
मैंने ताला खोला। दरवाज़ा खुला तो हवा का एक झोंका निकला — ठंडी, जैसे किसी पुराने तहखाने से। आँगन में दीया जल रहा था। उसके पास एक कुर्सी रखी थी, और कुर्सी पर एक चादर थी जो अभी-अभी उतरी हो जैसे।
मैं आँगन में गया। दीये के पास एक काग़ज़ रखा था। उठाया। उस पर लिखा था — "तेरे पापा ने मेरा हिसाब रोका था। अब तू आया है, तो पूरा कर। भीतर आ।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं था। पर दीवार पर एक कोठरी थी, जिसका दरवाज़ा थोड़ा खुला था। मैंने उसे धक्का दिया।
भीतर अंधेरा था। मैंने मोबाइल का टॉर्च जलाया। कोठरी में एक बक्सा रखा था, और बक्से पर एक टोकन — वैसा ही जैसा मेरे पास था। पर ये किसी और नाम का था।
मैंने बक्सा खोला। अंदर काग़ज़ों का ढेर था। ऊपर वाले काग़ज़ पर लिखा था — "ये हिसाब उस आदमी का है जिसने मेरे बाप को धोखा दिया।"
मैंने काग़ज़ पलटे। एक नाम उभरा — भवानी के पिता। और उसके नीचे — मेरे पापा का नाम, गवाही में।
पीछे से आवाज़ आई। "अब समझा?"
मैं मुड़ा। दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था — सत्तर के आसपास, सफ़ेद बाल, पुरानी शर्ट। वही जिसका ज़िक्र शंकर ने किया था।
"तुम कौन हो?"
"मैं वो हूँ जिसका हिसाब तेरे पापा ने अधूरा छोड़ दिया।" वो आगे आया। "तेरे पापा ने मेरे बाप की ज़मीन बचाई थी, पर काग़ज़ ऐसे लिखवाए कि मेरा बाप कर्ज़दार बन गया। मैं चालीस साल से इस हवेली में इंतज़ार कर रहा हूँ कि कोई आए और सच बोले।"
"तुम झूठ बोल रहे हो।" मैंने काग़ज़ उठाया। "यहाँ पापा की लिखाई है — उन्होंने कहा है कि उन्होंने किसी को धोखा नहीं दिया।"
आदमी हँसा। "काग़ज़ पढ़ना आता है? नीचे वाली लाइन पढ़।"
मैंने पढ़ा। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था — "अगर मैं न रहूँ, तो ये काग़ज़ उसी को देना जो हवेली में सच लेकर आए।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने आदमी की तरफ़ देखा। "तुम मुझे फँसाना चाहते हो।"
"नहीं।" वो कुर्सी पर बैठा। "मैं चाहता हूँ कि तू अपने बाप की ग़लती सुधारे। जो ज़मीन मेरे बाप से छिनी, वो उसके बेटे को लौटा। बस इतना।"
"मेरे पास ज़मीन नहीं है।"
"तेरे पास टोकन है।" उसने दीये की तरफ़ देखा। "वही टोकन जो तूने खाँचे में रखा। वो मेरे बाप का था। उसी से हिसाब चुका।"
मैंने सोचा। कुछ देर सोचा। फिर बोला, "अगर मैं टोकन लौटा दूँ, तो तुम क्या करोगे?"
"तुझे कुछ नहीं होगा। बस मेरा हिसाब पूरा हो जाएगा।"
मैंने दीवार की तरफ़ देखा। खाँचा अब भी वहीं था। मैंने हाथ बढ़ाया और अंदर से दोनों टोकन निकाले — मेरा और भवानी का। फिर आदमी की तरफ़ बढ़ाया।
वो उठा। उसने टोकन लिए और दीये के पास रख दिए। "अब हिसाब बराबर।" वो मुड़ा और कोठरी की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर रुका। "तेरे पापा बुरे आदमी नहीं थे। बस फँस गए थे। तू उनसे बेहतर है — तूने सच सुना।"
वो गया। आँगन में सिर्फ़ दीया जल रहा था।
बाहर निकला तो राजेंद्र दौड़कर आया। "क्या हुआ?"
"हिसाब पूरा हो गया," मैंने कहा। "अब कोई नहीं आएगा।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा, फिर हवेली की तरफ़। "तू अंदर गया और ज़िंदा बाहर आया। ये ख़ुद एक खबर है।"
मैं हँसा। "खबर नहीं, चाय दे।"
रात आठ बजे मैं घर पहुँचा। माँ ने दरवाज़ा खोला। उसके हाथ में चाय का गिलास था।
"अब बता," उसने कहा, "कल सुबह अस्पताल की शिफ़्ट है या शादी की तैयारी?"
मैंने गिलास लिया और मुस्कुराया। "दोनों।"
"तो सो जा।" वो मुड़ी। "और हाँ — टोकन वाले खाँचे में कुछ और रखना हो तो पहले मुझे बताना।"
"कुछ नहीं रखना," मैंने कहा। "अब बस चाय रखनी है।"
माँ हँसी। वो हँसी जो बहुत दिनों बाद सुनी थी।
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