The Token System – Chapter 1124
"मेरा भाई श्रीपत सिंह ने हड़प लिया," कम्मो ने कहा। "पर श्रीपत भी मेरा भाई था। और मैं उसे ख़ुद भूल नहीं पाई, चाहे वो मुझे भूल गया। अब भवानी को देखती हूँ तो लगता है — ये वही नहीं है जो श्रीपत था। ये श्रीपत का शिष्य है, पर श्रीपत जितना बुरा नहीं। और हिसाब में भाई का हिस्सा भी होता है, जज साहब। भाई का हिस्सा भी।"
भवानी ने कम्मो की तरफ़ देखा। उसकी आँखें कुछ कहती दिखीं, पर मुँह से कुछ नहीं निकला। फिर उसने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।
मैं खड़ा हो गया। मुझे यह जानना था।
"जज साहब," मैंने कहा। "एक सवाल।"
जज ने मेरी तरफ़ देखा। "पूछिए।"
"कम्मो जी," मैंने उनकी तरफ़ मुड़कर कहा, "आप उसकी मदद क्यों कर रही हैं? आपने ख़ुद कहा — उसने आपका हिस्सा खाया। बीस साल। आप उसी आदमी के होम को अपने नाम पर लेकर उसे उसके ही होम में…"
"और तू क्या चाहता है?" कम्मो ने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "कि मैं उसे होम से बाहर फेंक दूँ? कि उसकी हर ईंट पर अपना नाम लिख दूँ और उसके पुराने मरीज़ों के काग़ज़ अपने पास रख लूँ? ये तो वही हिसाब होगा जो उसने मेरे साथ किया था।"
"तो आप…"
"तो मैं ये चाहती हूँ," उसने कहा, "कि होम उसके नाम से मेरे नाम पर आए, पर अंदर काम वही करे। और हर महीने का हिसाब मुझे आए। और जो उसने मेरे हिस्से से बनाया है, वो मेरे नाम पर आकर उन लोगों को दिया जाए जिनसे उसने छीना। भवानी को नहीं — उनको। उसका हिसाब चुके, मेरा हिसाब चुके, और होम के पास जो मरीज़ आते हैं, उनका भी कुछ बचे।"
जज ने मुंशी की तरफ़ देखा। "लिखिए — कम्मो देवी ने नर्सिंग होम अपने नाम करने की शर्त अदालत के सामने रखी है। अदालत इस पर कल सुनवाई करेगी।"
अब कुर्सी की तरफ़ से आवाज़ आई — भवानी की।
"जज साहब," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने बीस साल में अपने बाप की एक बात कभी नहीं मानी थी। आज मैं अपनी बुआ की बात मानूँगा।"
"कौन सी बात?" जज ने पूछा।
"होम उन्हीं के नाम पर हो," भवानी ने कहा। "मैं उसके भले के लिए कुछ नहीं कह रहा। मैं सिर्फ़ ये कह रहा हूँ कि वो जो भी करें, मैं हाथ नहीं बढ़ाऊँगा।" उसने अपनी तरफ़ देखा, जैसे ख़ुद का बयान ख़ुद सुन रहा हो। "मेरा बाप यही करता था — काग़ज़ लिखता था, फिर मुकर जाता था। मैं उसकी तरह नहीं मरूँगा।"
कम्मो ने कुछ नहीं कहा। वो बस बैठ गई — धीरे, लाठी के सहारे, जैसे ये बात भी उसका एक हिस्सा थी जो कहकर रख दिया गया हो।
शुल्का जी खड़े हुए। "जज साहब, ये सब ठीक है, पर काग़ज़ पर ज़मीन का जो हिस्सा भवानी सिंह के नाम पर है, वो अदालत के कब्ज़े में है। मेरा मुवक्किल उस हिस्से को छोड़ने के लिए तैयार है, पर…"
"पर क्या?"
"पर हमें लिखित में चाहिए कि कम्मो देवी होम का कर्ज़ भी साथ लेंगी। होम पर दो गाड़ियों का लोन है, तीन और मरीज़ों के काग़ज़ अदालत में हैं, और…"
कम्मो ने उनकी बात काटी। "लोन का हिसाब कितना है?"
शुक्ला जी ने अपनी फाइल खोली। "कुल — गाड़ियों और मशीनों का — आठ लाख के करीब।"
कम्मो ने अपनी लाठी से ज़मीन टटोली, जैसे हिसाब कर रही हो। फिर उसने कहा, "होम के नाम पर जो पुरानी ज़मीन है, उसका हिस्सा मेरा है। उसका किराया इतना होगा कि लोन का ब्याज़ निकल जाए। और मूलधन…" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मनोहर, तेरे टोकन का अब क्या हाल है?"
मैं चौंका। सबने मेरी तरफ़ देखा। जज ने भी।
"कम्मो जी," जज ने कहा, "ये अदालत है।"
"मुझे मालूम है," कम्मो ने कहा। "मैं बस इतना कह रही हूँ कि जो हिसाब मैंने बीस साल बाहर से देखा है, वो अब भीतर से चुकाना है। और मनोहर वो आदमी है जिसने बीस साल बाद उसे भीतर लाकर खड़ा किया है।"
जज ने एक पल सोचा। "कम्मो देवी, आपकी बात अदालत समझ रही है। पर आज का दिन फ़ैसले का है, नई अर्ज़ी का नहीं। कल सुबह दस बजे — फ़ैसला सुनाया जाएगा। तब तक आप अपनी शर्त लिखित में दे दीजिए। भवानी सिंह, आप भी अपना बयान लिखित में दीजिए — होम छोड़ने का।"
भवानी ने सिर हिलाया। उसने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ नहीं फूटी।
तभी व्हीलचेयर की तरफ़ से आवाज़ आई। धातु की आवाज़ — जैसे चमड़े की पट्टी खींची जा रही हो।
अमर व्हीलचेयर से उठने की कोशिश कर रहा था। उसका एक हाथ पहिये पर, दूसरा मेज़ पर, और उसकी टाँगें नीचे लटकती रह गईं। नर्स ने पकड़ना चाहा, पर उसने हाथ से रोक दिया।
"जज साहब," अमर ने कहा। उसकी आवाज़ में हवा कम थी, पर शब्द साफ़ थे। "मैं अपना हिसाब ख़ुद चुकाऊँगा।"
जज ने उसकी तरफ़ देखा। "अपना हिसाब?"
"पापा का नहीं," अमर ने कहा। "अपना। मैंने दस साल की उम्र में एक डिब्बा छिपाया था। मैंने बीस साल पापा के साथ उनके काग़ज़ों पर दस्तख़त किए — बिना पढ़े। मैंने उनकी गाड़ी चलाई, उनके होम की सीढ़ियाँ चढ़ीं, उनका नाम जिया। मुझे हिसाब तब देना चाहिए था जब मैं जवान था। अब दे रहा हूँ।"
"क्या चुकाएँगे?"
अमर ने कम्मो की तरफ़ देखा। "जो उन्होंने कहा — होम उनके नाम। मैं उस होम में काम करूँगा। मरीज़ों के काग़ज़ रखूँगा, उनकी दवा का हिसाब रखूँगा — पर अपने नाम पर कुछ नहीं।"
"तुम बीमार हो," भवानी ने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ और था — डर नहीं, कुछ और।
"मैं बीमार हूँ," अमर ने अपने पिता की तरफ़ न देखते हुए कहा। "इसलिए जल्दी चुकाऊँगा।"
कम्मो ने अमर की तरफ़ देखा। मैंने देखा कि उसकी आँखों में कुछ पिघला — पर उसने अपना चेहरा नहीं बदला। ये वो औरत नहीं थी जो माफ़ी की तरह मुस्कुरा दे।
"अमर," उसने कहा। "तू अपने बाप से नहीं, अपने हिसाब से आया है। ये अच्छी बात है। पर एक बात याद रख — मेरे हिसाब में तेरा नाम भी कहीं लिखा है। और उसे मिटाने का हक़ सिर्फ़ तेरे पास है, मेरे पास नहीं।"
अमर ने सिर हिलाया। फिर वो फिर व्हीलचेयर पर बैठ गया। नर्स ने कंबल ऊपर खींचा।
जज ने हथौड़ा उठाया।
"आज की सुनवाई बंद," उन्होंने कहा। "काग़ज़ अदालत के कब्ज़े में रहेंगे। कम्मो देवी और भवानी सिंह — दोनों कल सुबह नौ बजे अपनी लिखित शर्तें दाख़िल करें। सुनवाई दस बजे।"
हथौड़ा गिरा। आवाज़ हॉल के कोने तक गई और लौटी।
सभी उठने लगे। बंसी मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"जो अभी हुआ," उसने धीरे से कहा, "वो मैंने ज़िंदगी में नहीं देखा।"
"क्या?"
"कोई काग़ज़ पेश नहीं हो रहा था," बंसी ने कहा। "कोई गवाह नहीं आ रहा था। और फिर भी भवानी हारा।"
"हारा नहीं," मैंने कहा। "उसने हार मानी।"
"यही तो," बंसी ने कहा। "हार से भी बड़ी चीज़ है — हार मानना। और वो आदमी आज पहली बार अपनी मर्ज़ी से माना है।"
माँ मेरे पास आई। उसका हाथ ठंडा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, "टोकन?"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन न गरम था, न ठंडा — पर अब भी चुप। मैंने उसे उँगलियों में हल्का दबाया। कुछ नहीं हुआ। जैसे उसने अपना सारा काम कर दिया हो और अब बस इंतज़ार में बैठा हो।
"चुप है," मैंने कहा।
माँ ने सिर हिलाया। और फिर उसने कुछ कहा जो मैंने पहले कभी उसके मुँह से नहीं सुना था। "कल सुबह जब हम बाहर निकलेंगे, तू मेरे साथ चलना। सबसे आगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज तक तू हमेशा मेरे पीछे चला है," माँ ने कहा। "अब मैं तेरे पीछे चलूँगी।"
बाहर बरामदे में भीड़ थी। मैं रीना को ढूँढ रहा था। वो बेंच पर बैठी थी, हाथ में मेरा पुराना रुमाल। उसके सामने शेखर बाबू की बेटी, दीपा, खड़ी थी — स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में, हाथ में एक छोटा लिफ़ाफ़ा।
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