The Token System – Chapter 1116
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने लिफ़ाफ़ा पढ़ा और उसकी आँखों में कुछ चमका।
"बावड़ी का सफ़ाई करने वाला," माँ ने धीरे कहा। "वो चौकीदार। जो बीस साल से तहखाने के बाहर झाड़ू लगाता था।"
"और उसी ने राजेंद्र के हाथ में वो काग़ज़ दिया था," मैंने कहा। "वो मकान मालिक ने मुझे बताया था कि बावड़ी वाले रास्ते में कोई रहता है।"
"आकाश," माँ ने कहा, "गाड़ी निकाल। हम हवेली।"
"माँ, जज ने एक घंटा दिया है।"
"तो एक घंटे में हो जाएगा। चल।"
गाड़ी में बैठते वक़्त मेरा टोकन गरम हुआ — तेज़, एक साथ। पहली बार मैंने उसे निकाला और देखा। उस पर एक नई लकीर उभरी थी। और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, दो शब्द — "पहले बोल।"
बंसी ने देखा। "क्या कह रहा है?"
"कह रहा है — बोलने से पहले बोल। बंसी, मुझे अदालत जाना है, और उससे पहले उस सफ़ाई करने वाले से बात करनी है। अगर मैं उससे बात करूँ बिना जज के, तो हम बोल नहीं पाएँगे। और अगर बोलने में देर हुई…" मैंने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। "तो फ़ैसला शायद भवानी के हक़ में चला जाए।"
"तो?"
"तो बावड़ी जाओ। वहाँ से उसे उठाओ और अदालत ले आओ। मैं अदालत में जज को बताऊँगा — गवाह रास्ते में है। एक घंटे के अंदर आएगा।" मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "बस मुझे एक चीज़ चाहिए — भरोसा कि वो आएगा।"
बंसी ने गाड़ी रोकी। "मन्नू, वो आदमी बीस साल से उसी बावड़ी में है। उसे कोई नहीं बुलाता। अगर मैं जाऊँगा और वो ख़ुद को बचाने के लिए दौड़ेगा?" वो कुल्हड़ में बची चाय पी गया। "पर बुलाने वाला तो मैं भी नहीं हूँ — वो तेरे पापा का काग़ज़ है। मुझे दे। मैं उसे दिखाऊँगा।"
मैंने उसे पापा का काग़ज़ दिया। बंसी ने उसे अपनी जेब में रखा। "एक घंटा," उसने कहा। "पर मन्नू — अगर मैं उसे लेकर पहुँचा और जज ने पूछा कि उसका नाम क्या है, तो मैं क्या कहूँगा?"
"उसका नाम नहीं।" मैंने कहा। "उसका काम कहना — वो जो हवेली की बावड़ी में बीस साल से पानी भरता है। और हाँ, एक चीज़ और।" मैंने गाड़ी से उतरते हुए कहा। "अगर वो साफ़ न बोले, तो उससे मत पूछना कि बोलो। उससे पूछना — तुम्हारे झाड़ू के दाँते कितने हैं? वो गिनने लगेगा। और गिनते-गिनते बताएगा कि बीस साल के झाड़ू में क्या-क्या देखा।"
बंसी गाड़ी लेकर चला गया।
मैं माँ के साथ अदालत की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर राजेंद्र खड़ा था।
"जज साहब चौथे गवाह का इंतज़ार कर रहे हैं," राजेंद्र ने कहा। "और एक बात, मन्नू — भवानी के सारे काग़ज़ आ गए हैं। तीन ट्रक भरे हैं। जज साहब ने कहा है कि वो सब अंदर नहीं आएँगे — सिर्फ़ उनके हिसाब वाले तीन पन्ने चाहिए।" वो मेरी तरफ़ झुका। "पर भवानी ने ख़ुद तीन पन्नों की जगह एक फाइल माँगी है — उसने कहा कि वो फाइल उसने ख़ुद पिछले बीस साल में बनाई है, और उसे उसी के सामने अदालत खोले।"
"वो फाइल कहाँ है?"
"वो उसने अपने वकील को दी है। शुक्ला जी के पास।" राजेंद्र ने आगे देखा। "और शुक्ला जी वो फाइल अदालत में खोलेंगे — पर भवानी ने कहा है कि फाइल खुलने के वक़्त शुक्ला जी की जगह कोई और होगा।"
"कौन?"
"वो नहीं बताया।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने धीरे से कहा, "मन्नू, भवानी आज अपनी जगह किसी और को खड़ा कर रहा है। इसका मतलब — वो अदालत से डरता नहीं, वो अपने बचाव से डरता है। वो चाहता है कि जो लोग उसके साथ थे, वो सामने आएँ।"
"माँ, वो तुमसे क्या कहना चाहता है?"
"वो नहीं।" माँ सीढ़ी की तरफ़ बढ़ी। "जज साहब कुछ कहते हैं। और उससे पहले मुझे कम्मो से मिलना है। एक मिनट।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया और एक सिपाही को इशारा किया।
"एक मिनट," राजेंद्र ने कहा। "माँ जी, सिर्फ़ एक मिनट।"
माँ हिरासत वाले कमरे की तरफ़ चली। मैं पीछे रहा। दरवाज़ा खुला और माँ अंदर गई। मैं दरवाज़े के पास खड़ा रहा — सुन नहीं रहा था, पर माँ की आवाज़ आ रही थी।
"बुआ," माँ ने कहा। "एक सवाल।"
"पूछ।"
"जब तुमने सुखिया को धक्का दिया था, उस वक़्त मैं वहाँ खड़ी थी। मुझे याद है। मैं तेरे पीछे थी।" रुकावट। "तूने एक बार भी ऊपर देखा था? आसमान की तरफ़?"
कमरे में चुप्पी थी। फिर कम्मो की आवाज़ आई — बहुत धीमी।
"नहीं।"
"तो जब तू उसे नीचे गिरा रही थी, तो क्या तूने मेरी तरफ़ देखा था?"
"नहीं।"
"मैं जानती हूँ।" माँ की आवाज़ में वो चीज़ नहीं थी जो मैंने सोची थी — कोई रोना नहीं, कोई चीख़ नहीं। "बस यही पूछना था। तेरा हिस्सा मैंने नहीं छीना। तेरा हिसाब भी मैंने नहीं लिखा। पर जो तूने किया, उसका गवाह मैं हूँ। और आज मैं अदालत में यही कहूँगी।"
माँ बाहर आई। उसका चेहरा सूखा था। उसने मेरी तरफ़ देखा। "चल।"
अदालत का दरवाज़ा खुला। जज साहब अपनी जगह पर बैठ चुके थे। उन्होंने माँ को देखा और कहा, "आइए, बैठिए।"
माँ ने अपना शॉल खींचा और गवाह के सामने खड़ी हुई।
"आपका नाम?"
"कौशल्या।"
अदालत में सन्नाटा। जज ने पेन उठाया। "पूरा नाम?"
"सिर्फ़ कौशल्या। मेरे पापा ने मेरा नाम कभी पूरा नहीं लिखा। वो कहते थे — नाम ज़्यादा लिखोगे तो लोग नाम से बुलाएँगे, और हक़ भूल जाएँगे।"
जज ने पेन रख दिया। "कौशल्या जी, अदालत जानती है कि हवेली के काग़ज़ों में ये नाम है। पर ये साबित करने के लिए कि आप ही वो कौशल्या हैं जिसका हिस्सा हवेली में है, अदालत को…"
तभी दरवाज़ा खुला। राजेंद्र ने अंदर झाँका और जज की तरफ़ देखा। "माई लॉर्ड, चौथा गवाह आ गया है।"
जज ने हथौड़ा मारा। "भेजिए।"
बंसी पहले आया। उसके पीछे एक बूढ़ा आया — साठ से ऊपर, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में झाड़ू। झाड़ू के दाँते घिसे हुए थे, और उसने झाड़ू को इस तरह पकड़ा हुआ था जैसे कोई तलवार पकड़ता है — सीधा, दोनों हाथों से।
वो रुका। उसने कमरे को देखा। फिर उसने माँ को देखा।
"कौशल्या?" उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे बीस साल से इस्तेमाल न हुई हो।
"हाँ," माँ ने कहा। "तू मुझे भूल गया, भैरों?"
अदालत फिर सन्नाटे में डूब गई।
वो भैरों था — भैरों ताऊ का बेटा, जिसका नाम पोथी में आधा था और जिसने बीस साल बावड़ी में झाड़ू लगाई थी। जज ने उसकी तरफ़ देखा।
"आपका नाम?"
"भैरों।" उसने झाड़ू सीधी की। "पर माई लॉर्ड, मेरा नाम उतना नहीं है जितना मेरे झाड़ू के दाँत। इन्होंने देखा है। इनके गिनते-गिनते मैंने सब देखा।"
जज ने कहा, "आपको शपथ दिलाई जाती है कि जो आपने देखा, सिर्फ़ वही कहेंगे।"
भैरों ने झाड़ू उठाई और हवा में सीधी की। "माई लॉर्ड, मैंने ये झाड़ू हवेली की बावड़ी में लगाया है। बीस साल। जिस रात किशन बाबू को हवेली लाया गया, वो रात ये झाड़ू वहीं खड़ी थी। मैंने देखा कि जगदीश को गाड़ी में डाला गया, और देखा कि किशन बाबू को हवेली के तहखाने में धकेला गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और माई लॉर्ड, मैंने ये भी देखा कि उस रात भवानी सिंह ख़ुद वहाँ नहीं थे। जो आदमी डंडा लेकर खड़ा था, वो भवानी नहीं था — वो भवानी के बाप थे।"
जज ने कहा, "आपने ये सब देखा और बीस साल चुप रहे?"
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