The Token System – Chapter 1113
"क्योंकि बीच में कुछ हुआ था," कम्मो ने कहा।
जज ने उसकी तरफ़ देखा। "क्या हुआ था, कम्मो देवी?"
कम्मो ने लाठी को दोनों हाथों से पकड़ा। "बीच में दोनों मुहरें बदली गईं। हरि सिंह ने उन्नीस सौ अट्ठानवे वाला काग़ज़ जलाकर अपना नया काग़ज़ बनवाया था, जिस पर बहनों का नाम ही नहीं था। मुझे पता चला क्योंकि मैं उस रात उसके कमरे में थी।"
"आपने उसे रोका क्यों नहीं?"
"मैं उस वक़्त आठ महीने की थी, जज साहब।" कम्मो ने कहा। "वो रात मेरी माँ की ज़िन्दगी का आख़िरी हफ़्ता था।"
अदालत में फिर खुसफुसाहट। जज ने हथौड़ा मारा।
"सक्सेना जी, आपके पास इस पर्ची को साबित करने का कोई और सबूत है?"
"हाँ।" सक्सेना ने अपनी फ़ाइल खोली। "तीन मुहरों पर नाम हैं। पहली हरि सिंह, दूसरी श्रीपत सिंह, और तीसरी मुहर का नाम मिटा हुआ है। पर मिटी हुई स्याही के नीचे, ऊपर से पढ़ने पर एक नाम उभरता है — बद्री उमराव। बद्री उमराव हवेली के पहले मालिक थे, और उनका नाम आज इस अदालत में पहले भी आ चुका है।"
शुक्ला फिर खड़े हुए, इस बार धीमे। "जज साहब, इस पर्ची की साख पर सवाल है। मेरे दफ़्तर से ये कल रात ग़ायब हुई — इसका मतलब ये किसी ने मेरे ताले से निकाली…"
"तो आप ये कह रहे हैं," सक्सेना ने कहा, "कि गवाह के हाथ में ये पर्ची आपके दफ़्तर से आई? ये तो और भी बड़ी बात है, शुक्ला जी। अगर ये पर्ची आपके पास सुरक्षित थी, तो आपने इसे अदालत में पेश क्यों नहीं किया?"
शुक्ला जी के माथे पर पसीना था। "ये पर्ची… मेरे पास ये शुक्ला एंड कंपनी के पुराने काग़ज़ों के साथ थी। मुझे नहीं पता था कि ये इस केस से जुड़ी है।"
"तो अब पता चल गया," जज ने कहा। "बैठिए।"
शुक्ला बैठ गए।
कम्मो ने जमुना की तरफ़ देखा। "जमुना," उसने कहा, "मैं जानती हूँ तू मुझसे नफ़रत करती है। कर। मैंने तेरी माँ को धक्का दिया, ये सच है। पर आज मैं ये इसलिए बोल रही हूँ कि तेरा हिस्सा तेरे नाम पर हो। वो मेरा हिस्सा नहीं है, जमुना। वो तेरी माँ का है।"
जमुना ने मुँह नहीं फेरा। उसने स्ट्रेचर पर हाथ रखा और धीरे से सिर हिलाया।
"मेरी माँ का हिस्सा," उसने कहा, "उसके काग़ज़ पर लिखा हो, ये मैं नहीं देखना चाहती। मुझे बस ये देखना है कि उसकी क़ातिल सज़ा पाए।"
कम्मो ने आँखें बंद कर लीं।
तभी दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई। सिपाही हटे और एक आदमी अंदर आया — साठ के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में एक मोटा लिफ़ाफ़ा।
"जज साहब," उसने कहा, "मैं बद्री उमराव का बेटा हूँ। मेरे पास वो मुहर है जो इस पर्ची पर तीसरी है।"
अदालत में एक और लहर दौड़ी।
"आपने इतनी देर क्यों लगाई?" जज ने पूछा।
"क्योंकि मुझे डर था, जज साहब।" उसने भवानी की तरफ़ देखा। "मेरे पिता ने मरने से पहले मुझसे कहा था — जिस दिन कोई हवेली का असली हिसाब खोदे, उस दिन तू अपनी मुहर लेकर अदालत जाना। आज सुबह मुझे पता चला कि हवेली से काग़ज़ निकले हैं।"
"आपकी मुहर कहाँ है?"
"यहाँ।" उसने लिफ़ाफ़ा खोला और एक छोटी पीतल की मुहर निकाली। वो मुहर पर चढ़ी स्याही कई साल पुरानी थी, पर उभरी हुई लकीरें साफ़ थीं। "जज साहब, अगर आप इस मुहर को उस पर्ची के तीसरे निशान पर रखें, तो तीनों लकीरें मिल जाएँगी।"
जज ने मुहर मंगाई। सिपाही ने मुहर पर्ची पर रखी। कमरे में कोई नहीं बोला।
"मिल गई," जज ने कहा। "तीनों मुहरें मिल गईं।"
शुक्ला जी उठे, फिर बैठ गए, फिर फिर उठे। "जज साहब, मुझे इस बात की इजाज़त चाहिए कि मैं अपने मुवक्किल से बात करूँ…"
"आप अपने मुवक्किल से पहले भी बात कर चुके हैं," जज ने कहा। "अदालत ये पर्ची अपने पास रखेगी। और अब मैं एक और चीज़ देखना चाहता हूँ।"
उन्होंने सक्सेना की तरफ़ देखा। "सक्सेना जी, आपने कहा था कि आपके पास चौथा गवाह हो सकता है।"
"जी, जज साहब। पर वो अभी नहीं आया।"
"तो अदालत उसका इंतज़ार नहीं करेगी।" जज ने काग़ज़ संभाले। "मैं सुनवाई की अगली तारीख़ तय करता हूँ…"
"जज साहब।" भवानी खड़ा हो गया। इस बार उसकी आवाज़ में तेज़ी नहीं थी। "एक बात कह सकता हूँ?"
जज रुके। "कहिए।"
"मुझे नहीं पता था कि मेरे बाप ने किसी का हिस्सा छीना।" उसने कम्मो की तरफ़ देखा। "बुआ, मैं सच कह रहा हूँ। मुझे नहीं पता था।"
कम्मो ने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "अब पता चल गया।"
"अब पता चल गया," भवानी ने दोहराया। "और मैं ये कहना चाहता हूँ — मेरा हिस्सा जो भी है, मैं उसे अदालत के हवाले करता हूँ। जो काग़ज़ मेरे बाप ने बनवाए, वो झूठे हैं। मैं उन्हें नहीं मानता।"
शुक्ला जी ने पीछे से कहा, "मेरे मुवक्किल…"
"शुक्ला जी, चुप रहिए," भवानी ने कहा। उसने कम्मो की तरफ़ देखा। "बुआ, मैं आपसे माफ़ी नहीं माँगूँगा। माफ़ी शब्द बहुत छोटा है। पर मैं ये कहूँगा कि मेरे होम में जो भी हुआ, उसका हिसाब मैं दूँगा। जितना मैंने कमाया है, वो सब उन परिवारों का है जिनका मैंने हक़ छीना।"
अदालत में सन्नाटा गहरा था।
जज ने हथौड़ा मारा। "ठाकुर भवानी सिंह, आपका ये बयान रिकॉर्ड किया जाता है। अदालत आपको निर्देश देती है कि आप अपने सारे काग़ज़ और सम्पत्ति के दस्तावेज़ कल दस बजे तक अदालत में पेश करें। अगर आपके ख़िलाफ़ फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट आती है, तो आपको गिरफ़्तार किया जाएगा। कम्मो देवी, आप पुलिस हिरासत में रहेंगी। सुनवाई पंद्रह दिन बाद।"
हम बाहर निकले। सूरज ढल रहा था। बंसी ने कुल्हड़ उठाया और फिर रख दिया।
"कम्मो ने भवानी को सीधे मुँह पर बोला," उसने कहा। "और भवानी चुप रहा। मैंने सोचा था वो चिल्लाएगा।"
"उसने अपना बचाव नहीं किया," मैंने कहा। "उसने हिस्सा छोड़ दिया।"
"उसने सिर्फ़ तब छोड़ा जब कम्मो ने कहा कि उसका होम उसी के हिस्से से बना," बंसी ने कहा। "ये माफ़ी नहीं है, मन्नू। ये हिसाब है।"
"हिसाब ही तो चल रहा है।" मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था।
रात को घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"कम्मो ने भवानी को बुआ कहलवा दिया," मैंने कहा। "सबके सामने।"
माँ ने चूल्हे में लकड़ी डाली। "भवानी का दुख ये नहीं है कि उसका हिस्सा गया।" उसने आग देखी। "उसका दुख ये है कि उसे बुआ ने बताया — न किसी वकील ने, न किसी काग़ज़ ने। जो औरत उसे गोद में खिलाती थी, उसी ने उसका पूरा खाता खोलकर रख दिया।"
"माँ, आप कम्मो से मिलना चाहोगी?"
माँ ने लकड़ी रखी। "वो मेरी बुआ नहीं है। वो भवानी की बुआ है। पर…" वो रुकी। "पर कल जेल में मुझे बुलाना अगर तेरा मन हो। मैं उससे एक सवाल पूछना चाहती हूँ।"
"कौन सा?"
"कि जब उसने सुखिया को धक्का दिया, तो क्या उसने एक बार भी ऊपर देखा था?" माँ ने आग में कुछ डाला। "नहीं देखा होगा। जो आदमी किसी को गिराता है, वो ऊपर नहीं देखता।"
मैं बाहर आया। छत पर बंसी खड़ी थी। रोशनी की चादर बिछी थी।
"कल सुबह," मैंने कहा, "भवानी को अपने सारे काग़ज़ लाने हैं। अगर उसने सच में छोड़ा, तो हवेली का हिसाब पूरा होने से पहले ही पूरा हो जाएगा।"
"और अगर उसने झूठ बोला," बंसी ने कहा, "तो सुबह के सूरज को कुछ और देखना पड़ेगा।"
उसने हवेली की तरफ़ इशारा किया। वहाँ अब भी दीया जल रहा था। उस रोशनी में कुछ और था — एक साया, जो दीये के पास खड़ा था, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
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