The Token System – Chapter 1111
"उन्नीस साल पहले," कम्मो ने कहा, "जब रामरती मरी, तब भवानी की उम्र बारह साल थी। रामरती के मरने के तीन दिन बाद श्रीपत भाई मुझे हवेली बुलाया। रात थी। दालान में श्रीपत बैठा था, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा। बोला — 'बहन, सुखिया भोर में तहसील जा रही है। भूमि कार्यालय में काग़ज़ जमा करने। उसके पास वो रसीदें हैं जो बाप ने रामरती के नाम लिखवाई थीं। अगर वो जमा हो गईं, तो आधी हवेली जमुना के नाम हो जाएगी।' मैंने पूछा — तो क्या करना है? श्रीपत ने कहा — 'सुखिया आज रात कुएँ पर पानी भरने जाएगी। तू जा। कोई देख न ले।'"
"तुमने हाँ कहा?" शुक्ला जी की आवाज़ नुकीली थी।
"मैंने हाँ कहा।" कम्मो ने उन्हें देखा। "और तुम इसे अजीब मत समझो। उस वक़्त भवानी के हित के सिवा मेरे सामने कुछ नहीं था। जमुना मेरी बहन की बेटी थी, पर हवेली मेरे भाई की थी। हमारे घर में बेटियों की नहीं, बेटों की गिनती होती थी।"
अदालत में एक औरत पीछे से खड़ी हुई और फिर बैठ गई।
"मैं कुएँ पर गई," कम्मो ने कहा। "सुखिया आई। मैंने उससे कहा — 'पानी भर ले, मैं लालटेन पकड़ती हूँ।' वो झुकी। मैंने पीछे से धक्का दिया।" कम्मो ने रुककर साँस ली। "वो गिरी। आवाज़ आई। फिर पानी। मैं लालटेन लेकर भागी।"
जगदीश ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर जैसा था।
"तो काग़ज़ कहाँ गए?" जज ने पूछा।
"मैंने उसी रात सुखिया के कमरे से काग़ज़ निकाले," कम्मो ने कहा। "और भवानी के पिता के कमरे में रख दिए। यही उन्नीस साल मेरे दिल पर बोझ रहा — कि मैंने किसी की जान ली और फिर उसी के काग़ज़ उसके दुश्मन के घर में रखे।"
भवानी खड़ा हो गया। "ये औरत पागल है! उसका दिमाग़ ख़राब है!"
"भवानी सिंह!" जज का हाथ हथौड़े पर गया। "तुम गवाह डिब्बे में नहीं हो। अगर बोलना है तो अपने वकील से कहो।"
शुक्ला जी ने भवानी को बैठाया।
"कम्मो देवी," शुक्ला जी बोले, "तुमने कहा कि काग़ज़ श्रीपत ने रखे। उन्नीस साल में तुमने कभी पुलिस को क्यों नहीं बताया? अब क्यों बता रही हो?"
कम्मो ने उन्हें सीधे देखा। "क्योंकि अब भवानी मेरे सामने खड़ा है और अपनी माँ का हिस्सा जमुना से छीनना चाहता है। जिस हवेली के लिए मैंने जान ली, अब वो ही हवेली भवानी के दामन से फिसल रही है। मैं ये नहीं देख सकती।"
"तो तुम्हारा गुनाह क़बूल है?" जज ने पूछा।
"हाँ।" कम्मो ने लाठी हिलाई। "मैंने सुखिया को धक्का दिया। पर एक बात मैं आज साफ़ कर देना चाहती हूँ। मुझे अकेले नहीं जाना। श्रीपत भी उस रात क़ायदे में था। वो दालान में बैठा सुन रहा था। धक्के के बाद जब मैं भागकर आई, तो उसने पूछा — 'पक्का?' मैंने कहा — 'हाँ।' तब उसने कामवाली को जगाया और रोना शुरू कर दिया, 'बहन, सुखिया कुएँ में गिर गई!'"
जज ने कलम उठाई। "बयान लिखा जा रहा है। कम्मो देवी, तुम इसे पढ़कर सही करना।"
जब बयान लिखा जा रहा था, जगदीश ने मेरा कोहनी मारा। उसने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली। फटी-सी। उसमें तीन औरतें थीं। जगदीश ने फुसफुसाया, "ये मेरे पास सुखिया के सामान से मिली थी। बीच में कौशल्या, दाएँ जमुना। बाएँ ये कम्मो। मैंने आज सुबह फ़ोटो नहीं पहचानी थी। बाल सफ़ेद हो गए थे।"
कम्मो ने तस्वीर की तरफ़ देखा और उसकी आँख झुक गई। "वो चाय की दुकान वाला लड़का," उसने कहा, "आज सुबह मैंने इसे देखा था। मैंने उससे अदालत का वक़्त पूछा। उसने चाय बनाई, पर मैं पी नहीं। मेरे हाथ काँप रहे थे।"
बंसी पीछे बैठा था। वो कुछ बोला नहीं। उसके हाथ में कुल्हड़ था, जो अब ख़ाली था और वो उसे बार-बार घुमा रहा था।
जज ने बयान पूरा किया और कम्मो से दस्तख़त लिए। वो उँगली टेढ़ी थी, पर सीधी लकीर खिंची।
तभी भवानी का वकील, शुक्ला जी, कुछ देर सोचकर खड़े हुए।
"जज साहब, मुझे एक गवाह पेश करना है।"
"कौन?"
"भवानी सिंह ख़ुद।"
मैंने शुक्ला जी की तरफ़ देखा। ये नया दाँव था। अब तक शुक्ला जी भवानी की चोरी छिपा रहे थे, अब उसे ख़ुद कटघरे में ला रहे थे।
भवानी गवाह के डिब्बे में आया। उसकी कमीज़ के नीचे से पसीना टपक रहा था, पर चेहरे पर शांति सजा हुआ था।
"भवानी सिंह," शुक्ला जी ने कहा, "क्या तुमने उन्नीस साल पहले सुखिया को देखा था?"
"मैं बच्चा था," भवानी ने कहा। "मुझे इतना याद है कि रात में शोर था। बुआ रो रही थी। पिता जी कुओं के पास खड़े थे। मैंने पूछा क्या हुआ, तो किसी ने कहा — सुखिया गिर गई। बस इतना।"
"कम्मो ने कहा कि तुम्हारे पिता ने उसे उकसाया। ये सच है?"
"मेरे पिता मरे हुए हैं," भवानी ने कहा, "मरे हुए पर इल्ज़ाम लगाना आसान है।"
कम्मो ने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा — "भवानी, तेरे पिता ने उस रात खाने की मेज़ पर कहा था — 'सुखिया का दिमाग़ ख़राब है, वो काग़ज़ उसकी हैंडबैग से निकालकर मेरी अलमारी में रख दो।' तेरी माँ की मौत के बाद तेरे पिता ने तेरी माँ के गहने तक बेच दिए थे। उस आदमी को साफ़ बोलने की आदत नहीं थी।"
"बस!" भवानी चिल्लाया। "बस करो!"
जज ने हथौड़ा मारा। "भवानी सिंह, अगली बार अदालत से बाहर जाओगे। समझे?"
शुक्ला जी ने वापस पूछताछ शुरू की — यह बदलते रुख़ के साथ। "कम्मो देवी, तुम्हें काग़ज़ मिले थे। तुमने उन्हें नष्ट क्यों नहीं किया?"
"मैंने सोचा," कम्मो ने कहा, "काग़ज़ मिट्टी में गाड़ दूँगी तो सच मिट जाएगा। पर उस रात मैंने सुखिया का नाम लिया था। काग़ज़ जला देती तो उसकी आत्मा मुझे कभी न छोड़ती। इसलिए मैंने उन्हें ताबूत में रखा — जमुना के आने तक।"
"ताबूत?" जज ने सिर उठाया।
"हाँ, जज साहब। हवेली के दालान में जो ताबूत रखा है, जिस पर बंद मोहर है — वो काग़ज़ों का ताबूत नहीं है। वो उन्नीस साल पहले हुई एक ग़लती का ताबूत है। मैंने अपने हाथ से आग लगाकर उसे कभी जलाया नहीं, क्योंकि मैं डरती थी कि जो आग मैंने उस रात कुएँ पर जलाई थी, वो एक दिन मुझे ही जला देगी।"
भवानी ने मुँह फेरा। उसका वकील उसे सम्भाल नहीं पा रहा था।
बरामदे में लंच के समय मैं कम्मो के पास गया। दो सिपाही दोनों तरफ़ खड़े थे। उसने मुझे देखा।
"तुम मन्नू हो?" उसने पूछा। "जमुना की बातों में तुम्हारा नाम आता था।"
"आप जानती हैं जमुना को?"
"मैंने उसे जन्मते देखा है।" कम्मो ने लाठी टिकाई। "मैं उससे मिलना चाहती हूँ। पर मुझे लगता है वो मुझसे नहीं मिलेगी।"
मैंने भीतर जाकर जमुना से कहा। वो बिस्तर पर लेटी थी। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में ग़ुस्सा।
"वो मुझसे न मिले," जमुना ने कहा। "मैं उसकी शक्ल नहीं देखना चाहती। मेरी माँ की क़ातिल है वो।"
"वो सच बताने आई है," मैंने कहा। "अगर आज वो न बोलती, तो भवानी आपकी माँ के काग़ज़ों पर क़ब्ज़ा कर लेता।"
जमुना ने मुँह फेर लिया।
"जाओ," उसने कहा। "मुझे अदालत ले चलो। मैं ख़ुद सुनूँगी।"
शाम चार बजे अदालत फिर बैठी। कम्मो से आख़िरी सवाल जज ने पूछा।
"कम्मो देवी, तुमने उन्नीस साल अपने गुनाह को छिपाया। आज तुमने ख़ुद आकर कबूल किया। तुम क्यों नहीं भाग गई?"
कम्मो ने लाठी हिलाई। "भागकर कहाँ जाती, जज साहब? मैं बहत्तर की हूँ। मेरे पास अपना कोई नहीं है। मरने से पहले मैं चाहती थी कि एक बार अपना सच अपने मुँह से बोलूँ, ताकि जो काग़ज़ मैंने गाड़े थे, वो मेरे साथ मिट्टी में न जाएँ।"
जज ने काग़ज़ों को उठाया और दोनों पक्षों को दिया।
"अदालत आज निर्णय नहीं सुनाएगी। काग़ज़ों को फ़ॉरेंसिक जाँच में भेजा जाता है। कम्मो देवी पुलिस हिरासत में रहेंगी। सुनवाई पंद्रह दिन बाद।"
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