The Token System – Chapter 1109
"ये अदालत के लिए कमज़ोर सबूत है," उन्होंने कहा। "पर —"
उन्होंने पर्ची को उलट-पुलट कर देखा।
"इसमें ये भी लिखा है कि नींव में गाड़ा हुआ काग़ज़ कम्मो का ही दफ़न होगा। जिसका मतलब है कि लिखने वाले को पता था कि काग़ज़ कहाँ गाड़ा गया है।"
उन्होंने चश्मे के ऊपर से मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे बाप की लिखाई है — क्या तुम साबित कर सकते हो?"
"मेरी माँ कहती है," मैंने कहा। "और हमारे घर में उनके पुराने काग़ज़ात हैं। मिलान हो सकता है।"
जज ने पर्ची मेज़ पर रख दी। कुर्सी पर पीछे झुके।
"आज की सुनवाई में ये पर्ची पेश करने की इजाज़त होगी," उन्होंने कहा। "और अगर कम्मो ख़ुद आकर गवाही देती है, तो ये मामला ही बदल जाएगा।"
वो उठे।
"पर एक बात," उन्होंने कहा। "अगर कम्मो आज नहीं आई, तो ये पर्ची तुम्हारे ही ख़िलाफ़ जाएगी। लोग कहेंगे — बेटे ने अपने बाप की चिट्ठी इस्तेमाल की, क्योंकि उसके पास और कुछ नहीं था।"
बाहर गलियारे में बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
"चार घंटे में कम्मो को आना है," उसने कहा। "और वो कहीं नहीं है। हमें पता नहीं वो कहाँ रहती है।"
"हमें पता है," मैंने कहा। "बाप की पर्ची में लिखा है — 'तेरा बेटा तुझसे पूछेगा।' मतलब कम्मो का भी कोई बेटा है।"
बंसी रुका। "अदालत के बाहर वो सफ़ेद गाड़ी। कल रात। जिसने पर्ची छोड़ी।"
"वही," मैंने कहा। "कम्मो का बेटा।"
बंसी ने चाबी निकाली। "तो अब वो हमारे पास आएगा। क्योंकि उसने ख़ुद कहा है — कम्मो ख़ुद आएगी।"
हम बाहर निकले। सीढ़ियों पर वो खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता। तीस के आस-पास। चेहरा वैसा ही जैसा कल गाड़ी में दिखा था — पर इस बार हाथ खाली थे। पर्ची नहीं थी।
"मैं रघु हूँ," उसने कहा। "कम्मो का बेटा।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
"माँ नहीं आएगी," रघु ने कहा।
मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए।
"कल रात तुम्हारी गली में जो पर्ची रखी गई थी — वो मेरी थी," रघु ने कहा। "मैंने तुम्हें रोकने के लिए नहीं लिखा था। मैंने तुम्हें बताने के लिए लिखा था कि माँ ख़ुद आएगी। पर सुबह उसने मना कर दिया।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
रघु ने जेब से एक और पर्ची निकाली। कम्मो की लिखाई।
"ये उसने सुबह लिखी। पढ़ो।"
मैंने पढ़ा —
"मैं अदालत में नहीं आऊँगी। मैंने बीस साल तक चुप रहकर जो किया, वो मेरी सज़ा है। पर झूठ नहीं बोलूँगी। जो काग़ज़ नींव में हैं, वो मेरे हैं। भवानी ने सच कहा। मैं उससे मिलना चाहती हूँ — पर अदालत के बाहर। अंदर नहीं।"
बंसी ने पर्ची पढ़ी। उसने पलट कर मेरी तरफ़ देखा।
"तो अदालत में गवाह कौन बनेगा?" उसने पूछा।
रघु ने अपनी तरफ़ इशारा किया।
"मैं," उसने कहा। "माँ ने कहा — जो मैं बोल नहीं सकी, तू बोल देगा। और वो ये भी कहती हैं कि भवानी को एक बात बताना मत भूलना।"
"क्या?"
रघु ने मेरी आँखों में देखा।
"कि उसके बाप ने माफ़ी की कीमत चुकाई थी। और वो कीमत ये थी — बीस साल का ख़ामोशी।"
अदालत कच्ची देर तक भरती रही। मैं पीछे बैठा। बंसी बगल में। सामने भवानी आया। एक बार फिर वही हाथ, वही धीमी चाल। पर इस बार आँखें अलग थीं — जैसे किसी ने उसके अंदर से चीख़ निकाल दी हो।
जज आए। कार्रवाई शुरू हुई। रघु को गवाह के तौर पर बुलाया गया।
रघु खड़ा हुआ। हलफ़नामा पढ़ा। जज ने पूछा —
"तुम्हारी माँ कहाँ है?"
"घर पर, जज साहब," रघु ने कहा। "वो नहीं आ सकीं। पर उन्होंने मुझे भेजा। और उन्नीस साल पहले जो नींव में गाड़ा गया, वो उन्होंने मुझे बताया है — जगह, गहराई, सब।"
अदालत में सन्नाटा। मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसे किसी ने ज़मीन से उठाकर खड़ा कर दिया हो।
घर लौटे। दोपहर ढल रही थी। माँ आँगन में बैठी थीं। पीली पर्ची उनके सामने रखी थी। चौथी लकीर के नीचे बिंदु अब भी था।
"कम्मो नहीं आई," मैंने कहा। "उसके बेटे ने गवाही दी।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस दीये की लौ देखी।
तभी गली से आवाज़ आई — कोई बाहर खड़ा था।
मैं दरवाज़े तक गया। खोला।
भवानी खड़ा था। हाथ जोड़े। इस बार पीछे कोई गाड़ी नहीं थी। कोई पर्ची नहीं थी। सिर्फ़ वो।
मैं कुछ बोलता, उससे पहले माँ आगे आ गईं।
"अंदर आइए," माँ ने कहा।
भवानी अंदर आया। कुर्सी पर नहीं बैठा। ज़मीन पर बैठ गया। रीना चाय रखकर चली गई।
भवानी ने कहा,"मैं माफ़ी माँगने नहीं आया। माफ़ी का वक़्त नहीं बचा। मैं वो नाम बताने आया हूँ जो लिफ़ाफ़े में है।"
मन्नू कहता है, "जज ने नाम गुप्त रखा है।"
भवानी ने कहा,"वो औरत मेरी माँ नहीं, मेरे बाप की बहन थी — कम्मो।"
माँ के हाथ से चाय का गिलास छूट गया।
भवानी आगे बोला,"कम्मो ने नींव में काग़ज़ गाड़वाए थे, ताकि हवेली मेरे बाप के नाम से कट जाए। मैंने बीस साल उसे छिपाया, क्योंकि वो मेरा खून थी।"
मन्नू ने पूछा,"अब क्यों खोल रहे हो?"
भवानी ने सीधा मुँह उठाकर कहा,"क्योंकि मेरा बेटा कल अदालत में बैठा था, और उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।"
माँ उठीं। वोभवानी के सामने आकर खड़ी हुईं। आँचल ठीक किया। और बोलीं —
"कम्मो आज भी ज़िंदा है — और वो कल की सुनवाई में आ रही है।"
॥
अस्पताल की सुबह की गंध हमेशा अलग होती है — डेटॉल, गरम पानी और बासी पट्टियों की। मैं, बंसी और जगदीश सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। जगदीश की लाठी हर पौड़ी पर एक आवाज़ करती और मुझे लगता कि वक़्त हमारे पीछे-पीछे साँस ले रहा है।
जमुना दूसरी मंज़िल के कोने वाले बेड पर थी। सिर पर पट्टी, आँखें खुली और साफ़। उसने हमें देखा, बैठने का इशारा किया।
"तीन मिनट," उसने कहा। "मुझे नर्स ने बोला है बोलने में ज़्यादा ज़ोर न लगाऊँ।"
"दो काफ़ी हैं," बंसी ने कहा और पास की स्टूल खींच ली।
मैंने सीधा पूछा, "कम्मो कौन है?"
जमुना ने आँख बंद की। फिर खोली।
"तीन बहनें थीं — कौशल्या, मैं, और कम्मो। कम्मो सबसे बड़ी। सबसे बड़ी और सबसे चालाक।" उसने आवाज़ धीमी की। "हवेली में हिस्सा बाँटने की बात चली तो कम्मो ने कहा — बहनें हैं, बाहर की औरतें हैं, इनका हिस्सा क्यों? पर काग़ज़ कुछ और कहता था। काग़ज़ में तीनों के नाम थे।"
"और सुखिया?" जगदीश ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो पुराना दर्द था जो बीस साल से सड़ रहा था।
जमुना ने उसकी तरफ़ देखा।
"सुखिया के पास काग़ज़ थे — हवेली के बँटवारे के, मुहर लगे, तहसील दर्ज। अगर वो काग़ज़ अदालत तक पहुँच जाते तो कम्मो का चौथा हिस्सा जाता रहता।" जमुना ने कंबल मुट्ठी में पकड़ा। "कुएँ की रात… मैं वहाँ थी। मैंने देखा कम्मो ने दो आदमियों को इशारा किया। मैंने सोचा बस डरा देंगे। पर सुखिया नीचे गया और…"
वो रुकी। जगदीश ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"और वो उठा नहीं," जगदीश ने कहा। "मैं जानता हूँ। मैं वहीं था। छिपा हुआ था, कमज़ोर था, कुछ नहीं कर सका।"
जमुना ने एक गहरी साँस ली।
"कम्मो आज भी शहर में है," जगदीश ने कहा। "बस नाम बदलकर। बीस साल से मैंने उसकी आवाज़ कानों में रखी है। और अब… अब वो नींव के काग़ज़ों पर अपना हक़ जता रही है।"
बंसी अचानक उठ खड़ा हुआ। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।
"अरे राम," उसने कहा। "सुबह… सुबह छह बजे मेरी दुकान पर एक बूढ़ी औरत आई थी। सफ़ेद बाल, सफ़ेद साड़ी, हाथ में लाठी। उसने चाय नहीं पी। उसने सिर्फ़ पूछा — 'अदालत कितने बजे खुलेगी?' और मैंने कहा — दस बजे। वो मुस्कुराई और चली गई।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने उसे पहचाना नहीं। पर अब… अब याद आ रहा है। वो आवाज़।"
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