The Token System – Chapter 1094
बूढ़ी औरत थी। आँखों के नीचे काला गड्ढा, होंठ सूखे। मैंने उसे पहले कहीं देखा था — पर कहाँ, याद नहीं आ रहा था।
"तू दादा का पोता है," उसने कहा। आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे किसी पुराने ज़ख़्म से हवा निकल रही हो। "तेरे दादा ने मेरे बाप के हाथ से काग़ज़ छीने थे। मैं वो काग़ज़ लेने आई हूँ, बदला नहीं।"
"आप कौन हैं?"
"सुखिया की बहन।"
सुमन ने मेरी कलाई दबाई। मैं समझ गया — यही वो नाम था जो बही के पन्नों में बार-बार आ रहा था, और जिसके नीचे दादा ने लिखा था — "इस केस में जो हुआ, वो मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झूठ है।"
"सुखिया की बहन तो मर चुकी," मैंने कहा। "गाँव के काग़ज़ में दर्ज है।"
"मरने का काग़ज़ भवानी के बाप ने भेजा था," औरत ने कहा। "मैं उस रात बच गई थी। उस दिन से दूसरे नाम से जी रही हूँ।"
वो एक कुर्सी खींचकर बैठ गई, जैसे ये अस्पताल उसका घर हो। "तेरे दादा ने मुझे शहर से बाहर भेज दिया था। कहा — 'पढ़ाई कर, नाम बदल ले, और कभी गाँव मत लौटना।' मैं लौटी नहीं। फिर सुना कि हवेली में दीवार गिरी, और तेरे पापा पागल हो गए।"
"आपको किसने बताया कि दीवार में काग़ज़ हैं?"
उसने सफ़ेद कुर्ते वाले की तरफ़ सिर हिलाया। "इसका बाप भवानी के बाप का नौकर था। उसने मरने से पहले नींव की बात बताई।"
"और आप यहाँ पैसा लेने आई हैं?"
"मैं यहाँ उस काग़ज़ को जलाने आई हूँ," उसने कहा। आवाज़ पहली बार तेज़ हुई। "जिस दिन वो काग़ज़ जलेगा, उस दिन भवानी का बाप जेल के अंदर सड़ेगा। मेरी बहन को इंसाफ़ मिलेगा।"
"तो जलाने में हमारी दस्तख़त क्यों चाहिए?"
औरत ने कुछ नहीं कहा।
सुमन ने धीरे से कहा, "क्योंकि काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने वाला ही हवेली का वारिस कहलाएगा। अगर काग़ज़ जल गया और हवेली हमारी रही, तो मुक़दमा हम पर आएगा। वो चाहती है कि इल्ज़ाम हमारे सिर।"
औरत ने सुमन को देखा। एक लंबी नज़र।
"तेरे नाना ने मेरे बाप को बर्बाद किया था," उसने कहा। "तू उसी का खून है।"
"मेरे नाना पर जो इल्ज़ाम लगा," सुमन ने कहा, "वो एक औरत ने लगाया था — दीवार में मिले काग़ज़ में उसका नाम है।"
औरत हँसी। सूखी हँसी, जैसे किसी पुराने कुएँ से आवाज़ आई हो। "वो काग़ज़ सत्तर साल पुराने हैं। उन्हें आज कोई नहीं मानेगा।"
"आज नहीं मानेगा," मैंने कहा, "तो कल मानेगा। अदालत में मानेगा।"
मैंने सुमन से कहा, "उसके पास क्या है, देख।"
सुमन ने अपना फ़ोन उठाया — ये दूसरा फ़ोन था, जेब में रखा हुआ — और स्क्रीन चालू की। तस्वीरें पहुँच चुकी थीं।
"देखिए," सुमन ने फ़ोन औरत की तरफ़ बढ़ाया। "ये वही पन्ना है। यहाँ तारीख है, यहाँ आपकी बहन का नाम है, और यहाँ वो आदमी का नाम है जिसने झूठा काग़ज़ बनाया था — आपके बाप के सामने."
औरत ने फ़ोन देखा। उसका हाथ काँपा। चेहरा बदला — पहली बार कुछ और दिखा, गुस्सा नहीं, थकान।
"इस पर…" उसने उँगली रखी। "यहाँ मेरे बाप का नाम है?"
"हाँ," सुमन ने कहा। "और यहाँ दादा का लिखा हुआ है कि आपके बाप ने कोई गुनाह नहीं किया।"
उसने फ़ोन वापस किया और आँखें बंद कर लीं।
तभी दरवाज़े पर शोर बढ़ा। माँ अंदर आई — साड़ी सिमटी हुई, साँस फूली हुई — और उसके पीछे रीना।
रीना के हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था। वो सीधी मेरे पास आई और बोली, "मन्नू, घर पहुँचते ही ये लिफ़ाफ़ा दरवाज़े के नीचे से मिला। अंदर बस एक लाइन है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर किसी ने लाल स्याही से लिखा था — "नींव खोदने वाला कल सुबह तक ज़िंदा नहीं रहेगा।"
माँ ने वो पढ़ा और उसका चेहरा सफ़ेद हो गया।
"नींव?" माँ ने धीरे से कहा। "मतलब उसे पता है?"
"किसे पता है?" मैंने पूछा।
"भवानी का बाप," औरत बोली। वो उठ खड़ी थी। "मुझे उसने ही भेजा था यहाँ। कहा था — 'काग़ज़ ले आओ, बाक़ी मैं देख लूँगा।' मैंने सोचा वो सिर्फ़ काग़ज़ चाहता है। उसे तो सब पता है — नींव, बही, तेरा नाम।"
"तो वो तुम्हें भेजकर हमें बाँधना चाहता था?" मैंने पूछा।
"वो मुझे भी बाँध रहा था," उसने कहा। "मेरी बहन का बदला लेने के नाम पर। मैं सत्तर साल से उसके हाथ की कठपुतली रही।"
वो सफ़ेद कुर्ते वालों की तरफ़ देखा। "जाओ। बाहर खड़े रहो।" और वो चले गए।
"अब सुनो," औरत ने कहा, आवाज़ बदली हुई थी — साफ़, बिना डर। "वो आदमी रात ग्यारह बजे हवेली पहुँचेगा। अपने तीन आदमियों के साथ। नींव में उतरेगा। लेकिन अंदर का रास्ता वो नहीं जानता।"
"आप जानती हैं?" सुमन ने पूछा।
"मैं वहाँ पली हूँ," उसने कहा। "हवेली की नींव में एक रास्ता है जो बावड़ी से जुड़ता है। मेरे बाप उससे पानी भरते थे। नींव के पत्थर के पीछे एक छोटा कमरा है — असली बही वहीं है, जिसमें सुखिया का पूरा केस है। दीवार में जो मिला, वो उसकी कॉपी है। असली वहाँ है — और अगर वो उसे जला दे, तो कुछ नहीं बचेगा।"
"कॉपी?" मैंने कहा। "पापा ने कहा कि काग़ज़ दीवार की नींव में हैं।"
"काग़ज़ दीवार में थे," औरत ने कहा। "पर बही नीचे है। तेरे दादा ने दो जगह रखा था।"
माँ ने कुर्सी पकड़ ली। "मुझे पता होता तो…"
"तुझे क्या पता होता," औरत ने कहा, बिना कड़वाहट के। "तेरे दादा ने तुझे भी नहीं बताया था। वो अकेले मर गए, ये बोझ लेकर।"
मैंने घड़ी देखी। नौ बजे थे। दो घंटे थे।
"मैं हवेली जाऊँगा," मैंने कहा। "पर पहले।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। "माँ, रीना को अस्पताल में रखो। तुम भी यहीं रहो।"
"मैं चलूँगी," माँ ने कहा। आवाज़ काँप रही थी, पर फ़ैसला पक्का था। "वो असली बही वाला कमरा मैं जानती हूँ। एक बार दादा मुझे ले गए थे, जब मैं छोटी थी। उन्होंने पत्थर पर हाथ रखकर कहा था — 'ये हमारी ज़मीन का दिल है।'"
"तो तुम बाहर रहोगी," मैंने कहा।
"मैं रास्ता दिखाऊँगी और बाहर निकल आऊँगी," माँ ने कहा। "तू और सुमन अंदर जाओगे।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं तैयार हूँ।"
"नहीं," मैंने कहा। "पापा ने कहा था — अकेले मत जाना। तुम साथ हो, तो जाऊँगा।"
रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, मैं डर रही हूँ।"
"डरना ठीक है," मैंने कहा। "पर तू यहाँ पापा के पास रहेगी। और ये फ़ोन तेरे पास।" मैंने अपना फ़ोन उसे दिया। "अगर मैं एक घंटे में न आऊँ, पुलिस को फ़ोन करना। और पापा से कहना कि टोकन उनके पास है।"
"टोकन?" रीना ने पूछा।
मैंने जेब से टोकन निकाला और पापा के हाथ में रख दिया। वो ठंडा हो चुका था।
पापा को छूते ही उनकी आँखें खुलीं। उन्होंने टोकन देखा और होंठ बड़बड़ाए। "ये…" उनकी आवाज़ सूखी थी। "ये मेरे बाप का था।"
"पता है, पापा।"
"इसे अपने पास रख," उन्होंने कहा। "जब भी ये गरम हो — मतलब तेरी जान ख़तरे में है।"
"और आपके अलमारी में वाला?"
"वो दूसरा है," पापा ने कहा। "वो नक्शे वाला है। ये…" उन्होंने टोकन मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये दादा का मन था।"
मैंने टोकन वापस जेब में रखा।
दस बजे।
हम अस्पताल के फाटक पर पहुँचे। औरत — जिसका नाम मैंने पूछा नहीं, और उसने खुद नहीं बताया — अपनी गाड़ी में बैठी, और माँ उसके साथ।
सुमन मेरे पास बैठी और बोली, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"जब टोकन गरम हुआ, तो उस पर लिखा था — सुमन, अंदर। तुझे क्या लगता है, इसका मतलब क्या है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मतलब ये कि तुम जिस कमरे में जाओगी, वो कमरा मेरे लिए ख़तरनाक है।"
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