The Token System – Chapter 1085
शेखर बाबू पीछे से बोले, “गेंदा की बात सच है। मुझे याद है। भवानी के बाप के ज़माने में एक औरत स्कूल से लौटते वक़्त गायब हुई थी। बस एक बार सुना था। किसी ने नाम नहीं लिया।”
मैंने पीतल की चाबी उठाई। जंग में लिपटी थी, पर तीन दाँत साफ़ दिख रहे थे। तीन दाँत — वो चाबी जो भवानी बीस साल से ढूँढ रहा था। मैंने उसे जेब में रखा।
माँ अब भी वहीं खड़ी थी। मैं उसके पास गया। “तू जानती थी?”
“कुछ-कुछ।” उसकी आवाज़ टूटी। “पापा ने एक बार कहा था कि दीवार में ख़ज़ाना नहीं, सच है। पर उसने नाम नहीं बताया। मैंने सोचा धमकी होगी, काग़ज़ होगा। गेंदा का नाम नहीं जानती थी।”
“अब जानती है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा। “अब जानती हूँ।”
गली में सन्नाटा थोड़ा छटा। लोग खिसकने लगे। कोई अख़बार वाला फोटो खींच रहा था। मैंने उसे रोका — “अभी मत छापो।” उसने कहा, “अब क्या रोकेंगे साहब, दीवार खुल गई।”
मैंने बंसी को अलग बुलाया। “आज रात कुआँ।”
“पर राजेंद्र ने सील करवा दिया।”
“सील में हुक्म लिखा होता है। मैं हुक्म पढ़ूँगा। और माँ से पूछूँगा कि गेंदा के बारे में उसे और क्या याद है।”
बंसी ने हथौड़ा उठाया। “बीस साल पहले मैं इस दीवार से डर गया था। आज नहीं डरूँगा।”
शाम छह बजे मैं घर पहुँचा। माँ चूल्हे पर चाय बना रही थी। रीना स्कूल से लौट आई थी, दरवाज़े पर खड़ी थी। “दीवार खुली?”
“खुली।”
“क्या मिला?”
“तेरे पापा की आवाज़।” मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने पढ़ा और फिर माँ के पास जाकर बैठ गई। कुछ नहीं बोली।
रात आठ बजे सक्सेना का फ़ोन आया। “मन्नू, भवानी के वकील ने जमानत की अर्ज़ी डाली है। हमने काग़ज़ पेश कर दिया। कल सुबह नौ बजे सुनवाई। पर एक बात सुन। अभी दस मिनट पहले एक आदमी आया था। सफ़ेद कुर्ता। उसने कहा कि अपनी दीवार में से जो चीज़ निकली, वो उसकी है। कह रहा था — वो भवानी का बेटा है।”
मेरा हाथ चाय के गिलास पर जम गया। “भवानी का बेटा? वो तो…”
“मुझे भी वही लगा। पर उसके पास एक चाबी थी। जंग लगी। तीन दाँत। बिल्कुल वैसी जैसी हमने आज निकाली। और दूसरी?”
मैंने जेब टटोली। पीतल की चाबी वहीं थी। “मेरे पास है।”
“तो वो नक़ली थी। मैंने उसे लौटा दिया। पर वो हार नहीं मानेगा। मन्नू, कल सुबह नौ बजे। अकेले मत आना।”
रात ग्यारह बजे टोकन मेरे हाथ में था। मैंने उसे उलटा किया। सोलहवीं लकीर के नीचे जो ख़ालीपन था, वो अब भर गया था। सत्रहवीं लकीर उभर आई थी। और उसके नीचे एक नाम।
गेंदा।
मैंने टोकन माँ को दिखाया। वो टोकन को देखकर एक पल रुकी, फिर कहा, “गेंदा को तू ही ढूँढ सकते।”
“कैसे? बीस साल हो गए।”
“टोकन ने नाम लिया है। मतलब वो ज़िंदा है, कहीं है। और अब वो तुझे बुला रहा है।” उसने मेरा हाथ पकड़ा। “मन्नू, अगर भवानी का बेटा उस चाबी के पीछे पड़ा है, तो वो भी गेंदा को ढूँढ रहा है। मतलब गेंदा के पास कुछ है जो भवानी को चाहिए।”
“या फिर गेंदा के पास कुछ है जो भवानी को डराता है।”
माँ ने सिर हिलाया। “कल सुबह पता चलेगा।”
मैं बाहर आँगन में आया। आसमान में बादल थे। टोकन जेब में हल्का गरम हो रहा था, जैसे कोई पास आ रहा हो।
दूर, गली के मोड़ पर, एक आदमी खड़ा था। छोटा क़द, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे-धीरे मुड़कर चल दिया। लाठी की ठक-ठक गली में गूँजती रही।
मैंने बंसी को फ़ोन किया। “कल सुबह जल्दी आ।”
“कितनी जल्दी?”
“सूरज से पहले। दीवार के नीचे हड्डियाँ हैं, बंसी। और मुझे लगता है कि उन्हें ढूँढने वाला मैं अकेला नहीं हूँ।”
फ़ोन कटा। आँगन में झींगुर फिर बजने लगे थे। पर इस बार उनकी आवाज़ में एक सवाल था।
गेंदा कौन है, कहाँ है, और भवानी का बेटा उससे क्या चाहता है — ये सब कल की सुबह में दबा था।
सुबह सात बजे बंसी आँगन में खड़ा था। हाथ में हथौड़ा और एक टॉर्च। मैंने चाय पी और जूते पहने। माँ ने दरवाज़े पर आकर सिर्फ़ इतना कहा, “सुनकर आ।” रीना ने मेरी जेब में मिठाई की एक पुड़िया डाल दी। “अगर कुछ अच्छा मिले तो खा लेना।”
हम कुएँ तक पहुँचे। राजेंद्र की सील लगी थी। मैंने हुक्मनामा जेब से निकाला और बंसी को दिखाया। “इसमें लिखा है कि सील सिर्फ़ तब तक रहेगी जब तक अदालत का अगला हुक्म न आए। आज नौ बजे सुनवाई है, उससे पहले कुआँ खोलना है।”
बंसी ने भारी पत्थर उठाया। सील टूटी और कुएँ से बदबू नहीं, ठंडी हवा निकली। मैंने टॉर्च जलाई। नीचे पानी दिख रहा था, पर पानी के किनारे एक सूखा चबूतरा था। चबूतरे पर एक टिन का बक्सा रखा था। मैंने रस्सी पकड़ी और नीचे उतरा। बंसी ऊपर रहा, रस्सी थामे।
बक्सा खोला। अंदर एक स्कूल की कॉपी थी, सीलन से भीगी, पर पन्ने सलामत थे। कॉपी के पहले पन्ने पर बच्चों जैसी लिखाई में लिखा था — गेंदा की डायरी। मैंने पन्ने पलटे। ज़्यादातर पन्नों पर फूल बने थे, नाम लिखे थे। कुछ नाम मेरे गाँव के थे। कुछ नहीं। पीछे के पन्नों पर एक लिस्ट थी। रसीदें। किसानों के नाम, ज़मीन के किस्से, रकमें।
आख़िरी पन्ने पर शेखर बाबू का नाम था। उसके आगे लिखा था — बकाया। सिर्फ़ एक लफ़्ज़। पर उसके नीचे एक तारीख़ थी, उन्नीस सौ चौरानवे की।
मैंने कॉपी सीने से चिपकाई और ऊपर चढ़ा। बंसी ने पूछा, “क्या मिला?”
“गेंदा की डायरी। और एक लिस्ट। जिसमें शेखर बाबू का नाम भी है।”
बंसी का मुँह खुला रह गया। “शेखर बाबू? जो हवेली के बाहर सबसे पीछे खड़े थे?”
“वही।”
हम जल्दी चले। घर पहुँचकर माँ को दिखाया। माँ ने कॉपी को हाथ में लिया और पहले पन्ने पर उँगली रखी। “ये गेंदा की लिखाई है। मैंने इसे स्कूल में देखा था। ये औरत गाँव की सबसे साफ़ लिखने वाली थी।” फिर उसने आख़िरी पन्ना देखा और उसका चेहरा पीला पड़ गया।
“क्या हुआ?”
“शेखर बाबू तेरे पापा के दोस्त थे। रोज़ आते थे। मैंने कभी नहीं सोचा कि…”
“कि क्या?”
“कि उनका भी हिसाब बाकी है।”
आठ बजे हम हवेली की गली में पहुँचे। भीड़ पहले से जमा थी। सक्सेना अपनी फ़ाइलें लिए खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखकर कहा, “चाबी अपने पास रखो। कोर्ट में छुपाना मत।”
डॉक्टर सुमन बनी हुई थीं और मेरी तरफ़ आईं। “मन्नू, कल रात मुझे एक तार मिला। मेरी बहन ने बताया कि अस्पताल में एक औरत दाख़िल हुई थी, बीस साल पहले — सिर पर चोट, और कोई नाम नहीं। उसे लोग फूलों वाली बाई कहते थे। वो गेंदा हो सकती है।”
मेरा दिल एक पल को रुका। “कहाँ है वो बहन?”
“यहाँ से चालीस किलोमीटर दूर, एक छोटे अस्पताल में। मैंने उसका नाम-पता लिखवा लिया है।”
शेखर बाबू सबसे पीछे खड़े थे। मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो नज़र चुरा रहे थे। कॉपी मेरे हाथ में थी। मैंने जानबूझकर उसे ऊँचा उठाया। उनका चेहरा सफ़ेद हो गया। वो कुछ कहने ही वाले थे कि भवानी की गाड़ी आ गई।
गाड़ी रुकी। शीशा नीचे हुआ। भवानी बाहर नहीं उतरा। उसने मन्नू को देखा और कहा —
“दीवार तोड़ने से पहले सोच ले — जो निकलेगा, वो तेरे बाप की इज़्ज़त भी तोड़ेगा।”
मैंने सीधे गाड़ी की तरफ़ देखा। “मेरे बाप की इज़्ज़त दीवार में नहीं, उनकी चुप्पी में दबी है। आज मैं वो चुप्पी खोलूँगा।”
भवानी हँसा। हँसी सूखी थी, जैसे कोई पुराना बक्सा खुल गया हो। “तेरे बाप चुप इसलिए थे क्योंकि उन्हें पता था — जो सच है, वो चार दिन में दफ़न हो जाता है। बीस साल में तो कुछ नहीं होता।”
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