The Token System106 / 1154

The Token System – Chapter 106

7 min read November 6, 2026

मैंने चिट्ठी जेब में रखी। थोड़ी देर चुप बैठा रहा। रीना ने अपने बैग से कॉपियाँ निकालीं और मेज़ पर रखीं, पर कोई काम नहीं किया। माँ चाय पी रही थी, धीरे-धीरे, जैसे समय काट रही हो।

"माँ," मैंने कहा, "भवानी का कोना मेरे पास नहीं है। मेरे पास खुद का कोना है — जो कम्मो ने उठाया था। वो कोना भवानी के टोकन में जाता है।"

माँ ने प्याली रखी।

"यानी?"

"यानी जब मैं भवानी का टोकन उस दीवार में मिलाऊँगा, तब उसका कोना भी मिलेगा। और उसका हिसाब बराबर होगा।"

माँ ने कुछ सोचा, फिर बोली, "तेरे पापा कहते थे — हिसाब बराबर तभी होता है जब दोनों तरफ़ से कुछ जाए। तेरे कोने से उसका कोना, उसके कोने से तेरा।"

रीना बीच में बोली, "माँ, ये सब क्या बातें कर रही है? अगर भवानी का कोना है, तो उसे लाना क्यों है? उसे अपना हिसाब ख़ुद चुकाने दो।"

माँ ने रीना की तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोली, "क्योंकि हिसाब किसी एक का नहीं होता। तेरे भाई का हिसाब भी उसी में है।"

रीना मेरी तरफ़ देखने लगी। मैंने अपनी चाय उठाई और लंबा घूँट लिया।

"रीना, मैं जानता हूँ तू क्या कह रही है। पर भवानी के टोकन के बिना मेरा हिसाब पूरा नहीं होगा। मैं उसे मिलाऊँगा।"

"तो उससे माँगना पड़ेगा," रीना ने कहा। "और वो बदले में कुछ माँगेगा।"

"तो माँगे," माँ ने कहा, और यह पहली बार था जब उसकी आवाज़ में गुस्सा था। "जो माँगेगा, हम उसकी कीमत चुकाएँगे। पर इस बार हम तय करेंगे कि क्या देना है, क्या नहीं।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। साठ साल की औरत, जिसने पूरी ज़िंदगी चुप रहकर काम किया, अब पहली बार मेज़ पर हाथ रखकर बैठी थी — बिल्कुल किसी पंचायत के मुखिया की तरह।

"माँ, आप बता दें कि क्या देना है।"

"जो काग़ज़ भवानी माँग रहा है — वो मत देना।"

"पर वो काग़ज़…"

"वो काग़ज़ तेरे दादा का है, और अब तेरा है। उस पर हक़ तेरा है, किसी और का नहीं। भवानी उसे माँगे तो कह देना — पहले हिसाब, फिर काग़ज़।"

रीना ने अपनी कॉपी उठाई, फिर रख दी।

"माँ, एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"तूने ये चिट्ठी इतने साल क्यों छिपाई?"

माँ ने अपनी साड़ी की गाँठ फिर बाँधी, धीरे-धीरे।

"क्योंकि मुझे डर था," माँ ने कहा। "तेरे पापा मरे। फिर भवानी ने मुझे बुलाया — कहा, तुझे कुछ चाहिए तो बता। मैंने कहा, कुछ नहीं चाहिए। उसने कहा — अच्छा, तो अपने बेटे को संभाल के रख। मैंने उस दिन से कुछ नहीं कहा। तूने अपनी जेब में पैसा देखा, पर मैंने पूछा नहीं। तूने रात में बाहर जाना शुरू किया, पर मैंने पूछा नहीं। क्योंकि मुझे लगा — जितना कम पूछूँगी, उतना तू सुरक्षित रहेगा।"

मेरा हाथ मेज़ पर रखा था। माँ ने उसे छुआ।

"अब मैं पूछ रही हूँ," उसने कहा। "क्या तेरे पास ये चीज़ भवानी के जाल में ले जाएगी?"

मैंने टोकन जेब से निकाला। ठंडा था, पर खाली नहीं — जैसे सो रहा हो। मैंने उसे माँ की हथेली पर रखा।

"ये मेरी जान है, माँ। और ये उस दीवार की है जहाँ से आई है। मैं इसे वहीं लौटाऊँगा। पर जब लौटाऊँगा, तब सबका हिसाब बराबर होगा — भवानी का भी, मेरा भी।"

माँ ने टोकन को हथेली में उलटा-पलटा, देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला — डर नहीं, पहचान।

"ये वही है," माँ ने कहा, "जो तेरे दादा ने दीवार में छिपाया था।"

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि तेरे दादा ने इसे मेरी हथेली पर रखा था, एक बार, जब मैं नई बहू थी। और कहा था — बहू, ये देख ले। जिस दिन ये तेरे बेटे के हाथ में हो, उस दिन जान लेना कि हिसाब शुरू हो गया।"

मैंने टोकन वापस लिया। उसमें कोई हरकत नहीं थी, कोई आवाज़ नहीं।

"तो अब शुरू हो गया," मैंने कहा।

रात में रीना ने मेरे कमरे की दहलीज़ पर खड़े होकर कहा, "मन्नू, एक बात कहूँ?"

"कह।"

"मैं शादी के लिए तैयार हूँ। पर भवानी के पैसे से नहीं।"

"पैसा मेरा है।"

"वो भी नहीं। जो पैसा भवानी के जाल से आया है।"

मैं बैठ गया। उसने मेरी तरफ़ देखा, बाल सँभाले, फिर बोली, "मुझे पता है तू क्या कर रहा है। पर मैं उस मंडप में खड़ी नहीं होऊँगी जिसकी डोर भवानी के हाथ में हो। चाहे शादी टूट जाए।"

"और अगर मैं कहूँ कि मेरे पास खुद का पैसा है? जो मैंने अपने हाथ से कमाया?"

रीना ने देखा, फिर बोली, "तो तू उसे दिखा। काग़ज़ पर, हिसाब में, सबके सामने। मंडप में सिर्फ़ वही पैसा जाएगा जो साफ़ हो।"

वो चली गई। दरवाज़ा खुला छोड़ गई।

मैंने चिट्ठी फिर निकाली। पापा की लिखाई में तीन लाइनें। "भवानी का कोना मेरे पास है। दीवार में मिलाओ, हिसाब बराबर।" और नीचे, बहुत छोटे अक्षर में, एक लाइन — "पर पहले भवानी को उसके बेटे के सामने लाना। वरना हिसाब किसी और पर बैठेगा।"

यह पापा ने कब लिखा? मौत से पहले? और किसे पता था? भवानी को नहीं — भवानी ने सिर्फ़ चिट्ठी दी थी, उसने नीचे की लाइन नहीं पढ़ी थी, वरना वो मुझे कभी न देता।

मैंने चिट्ठी जेब में रखी। बाहर आँगन में आया। माँ चूल्हे के पास बैठी थी, और बगल में — दीवार से टिकाकर — एक जर्जर बही रखी थी, जो बंसी ने दी थी।

"माँ, आप जाग रही हैं?"

"तेरे लिए चाय रखी है," माँ ने कहा।

मैंने चाय उठाई।

"माँ, पापा ने चिट्ठी में एक लाइन और लिखी है — पहले भवानी को उसके बेटे के सामने लाना।"

माँ रुकी। फिर बोली, "तो ले आना। मैं भी देखूँगी उस दिन।"

"आप क्या करेंगी?"

"तेरे पापा का हाथ पकड़ने वाले को मैं अपने बेटे के सामने खड़ा देखूँगी। बस।"

वो उठी, चूल्हा बुझाया, और अंदर चली गई। दरवाज़े पर रुकी, बिना मुड़े बोली, "भवानी के बेटे को लाना। अकेले मत जाना। बंसी को साथ ले जाना।"

"क्यों?"

"क्योंकि बंसी ने उस रात देखा था," माँ ने कहा। "और जो देखा है, वही गवाही दे सकता है।"

दरवाज़ा बंद हुआ। मैं आँगन में अकेला रह गया।

मैंने टोकन जेब से निकाला। ठंडा था। मैंने उसे हथेली पर रखा और दीवार की तरफ़ देखा — जहाँ बबूल की छाँव थी, जहाँ मेरा बचपन था, जहाँ से ये सब शुरू हुआ था।

"अब बताओ," मैंने धीरे से कहा, "अगला काम क्या है?"

टोकन चुप रहा।

मैंने उसे जेब में रखा और घर के पीछे की तरफ़ चला — जहाँ छिपी सीढ़ी थी, जिसका ज़िक्र पापा की डायरी में था, और जिसे मैंने आज तक नहीं ढूँढा था।

॥

मैंने पीछे की दीवार को छुआ, और मेरी उँगलियाँ रुक गईं। ईंट जैसी दिखती थी, पर हिल रही थी। सातवीं ईंट — जैसा पापा की डायरी में लिखा था। मैंने दोनों हाथ लगाए और खींचा। ईंट बाहर आई, और उसके पीछे एक टूटा हुआ सा खाँचा दिखा, जिसमें कपड़े की छोटी पोटली बँधी पड़ी थी। लाल कपड़ा, ज़मीन से लगा हुआ, उँगली जितना बड़ा।

मैंने वो पोटली खोली। अंदर पीतल का एक कोना था — टूटा हुआ, घिसा हुआ, किसी सिक्के का कोना। मैंने अपनी जेब से वो टोकन निकाला जो दीवार से मिला था और उसका कोना उस टुकड़े के पास रखा।

दोनों चिपक गए। बिल्कुल चिपक गए, जैसे चुम्बक। और उस जुड़े हुए कोने पर एक लकीर उभरी, बहुत महीन, बहुत पुरानी, पर पढ़ी जा सकती थी — "आधा हिसाब भवानी का, आधा तेरा।"

मैं वहीं बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। पापा के पास भवानी के टोकन का कोना था। मतलब — भवानी जो टुकड़ा लिए घूम रहा है, वो पूरा नहीं है। और जो मेरे पास है, वो भी नहीं।

माँ आँगन में आई और मुझे ज़मीन पर बैठा देखकर रुक गई।

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