The Token System – Chapter 1050
सक्सेना ने काग़ज़ पलटा। “कल के काग़ज़ों में एक नाम बार-बार आ रहा है। हरि सिंह के घर का पुराना चौकीदार — जिसे हमने तीन दिन पहले छोड़ दिया था।”
“कौन?”
“रघुवीर।” उन्होंने कहा। “वही जिसे तुमने पहले भी हवेली के पीछे देखा था।”
मुझे रघुवीर याद आया — साठ के ऊपर, सफ़ेद कुर्ता, चमड़े का बैग, चमकीले जूते। बीस साल पहले भवानी के पापा का दाहिना हाथ। वही जिसने रीना की फोटो दिखाकर मुझे धमकाया था।
“वो कहाँ है?”
“वही तो।” सक्सेना ने कहा। “कल रात से ग़ायब है।”
जमुना ने कराहते हुए हाथ उठाया। मैं उसके पास गया।
“मन्नू।” उसने धीरे से कहा। “मेरी जेब… जेब देख।”
मैंने उसकी साड़ी की जेब में हाथ डाला। अंदर कुछ था — छोटा, काग़ज़ का मुड़ा हुआ टुकड़ा। मैंने खोला। उस पर दो लाइनें थीं, बहुत छोटी और बहुत साफ़ लिखाई में।
“अब भी वक़्त है। तीसरा हिस्सा मेरा है। चुप रहो।”
मैंने काग़ज़ राजेंद्र को दिया।
“ये उसने कहा होगा जमुना से?” राजेंद्र ने पूछा।
“ये लिखकर गया है।” मैंने कहा। “लिख-पढ़ वाला है।”
बंसी ने वो काग़ज़ अपने हाथ में लिया। “रघुवीर पढ़ा-लिखा है। दफ़्तार में काम करता था।”
राजेंद्र ने काग़ज़ वापस लिया और सीलबंद लिफ़ाफ़े में रख दिया। “ये सबूत है। मैं इसे अदालत में दूँगा।”
“अदालत में?” मैंने कहा। “क्या अब भी अदालत बाकी है? जमुना मरी-मरी सी पड़ी है, सरस्वती ग़ायब हैं, और…”
“मन्नू।” सुमन ने मेरा कंधा पकड़ा। “अपनी साँस देख। तू काँप रहा है।”
मैं रुका। मेरी साँस तेज़ थी। मैंने आँखें बंद कीं और दस तक गिना।
तब जमुना ने फिर आवाज़ दी। बहुत धीमी।
“मन्नू।” उसने कहा। “मेरे पास आ।”
मैं उसके पास घुटनों पर बैठ गया।
“ये टोकन मत लौटाना।” उसने धीरे से कहा। “अभी एक गड्ढा और भरना बाकी है।”
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया। टोकन वहीं था — गरम।
“कौन सा गड्ढा?” मैंने पूछा।
पर जमुना की आँखें फिर बंद हो गई थीं।
सुमन ने नाड़ी देखी। “बेहोश हो गई है। पर ख़तरा नहीं। स्ट्रेचर पर डालो। अस्पताल ले चलो।”
जब जमुना को स्ट्रेचर पर डाला जा रहा था, तभी बाहर से पैरों की आवाज़ आई। सक्सेना ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। उनका चेहरा फिर बदला।
“रुको।” उन्होंने कहा।
सरस्वती दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में पानी की बाल्टी थी और उनके चेहरे पर घबराहट।
“मैं पानी लेने गई थी…” उन्होंने कहा। “गली के नल पर। पाँच मिनट। क्या हुआ?”
उन्होंने जमुना को स्ट्रेचर पर पड़ा देखा और बाल्टी उनके हाथ से छूट गई। पानी फ़र्श पर फैल गया और उसमें सक्सेना के जूते भीग गए।
“जमुना!” सरस्वती ने आवाज़ दी।
“ख़तरे से बाहर है।” सुमन ने कहा। “पर अस्पताल चलना होगा।”
सरस्वती मेरे पास आईं। वो बहुत बूढ़ी हैं — अस्सी से ऊपर। उनकी आँखें चमक रही थीं।
“मैंने देखा।” उन्होंने कहा। “नल पर जाते वक़्त देखा।”
मैं ठिठक गया। “क्या देखा?”
“एक आदमी।” उन्होंने कहा। “सफ़ेद कुर्ता। कोई पचास-साठ का। हाथ में कुछ था। वो हवेली की तरफ़ नहीं, पीछे की गली की तरफ़ जा रहा था।”
“बाल कैसे थे?” राजेंद्र ने पूछा।
“सिर पर टोपी थी।” सरस्वती ने कहा। “पर टोपी के नीचे से… सफ़ेद बाल दिख रहे थे।”
रघुवीर।
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। उन्होंने तुरंत अपना रेडियो निकाला।
“पीछे की गली की तरफ़ नाका लगाओ।” उन्होंने कहा। “साठ के आसपास का आदमी, सफ़ेद कुर्ता, टोपी, पीछे की गली से निकला है। सिर्फ़ पकड़ो — बात मत करना।”
रेडियो पर आवाज़ आई। राजेंद्र ने वो वापस जेब में रखा।
“रघुवीर को क्या चाहिए?” मैंने पूछा। “क्या वो भी हिस्सेदार है?”
सक्सेना ने अपना बैग उठाया। “कल रात के काग़ज़ों में एक लाइन मिली थी।” उन्होंने कहा। “भवानी के दस्तख़त वाले काग़ज़ के नीचे पुरानी स्याही में एक नाम है — रघुवीर। ये नाम हवेली के एक हिस्से के काग़ज़ पर है, जो कभी पूरा नहीं हुआ।”
“मतलब वो दावा कर सकता है?”
“वो दावा करता ही रहा है।” सक्सेना ने कहा। “बीस साल से। पर उसका काग़ज़ कभी पूरा नहीं बना। और जब तक हिसाब पूरा नहीं, कोई दावा नहीं टिकता।”
“तो वो हिसाब पूरा नहीं होने देना चाहता।” मैंने कहा।
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो तब आती है जब कोई सवाल का जवाब ख़ुद ही दे देता है।
“हाँ।” उन्होंने कहा। “और वो जानता है कि टोकन तुम्हारे पास है।”
स्ट्रेचर बाहर जा रहा था। सुमन साथ चल रही थी। मैं आँगन में खड़ा था। मेरे हाथ में टोकन था — गरम, जैसे किसी की थाह ले रहा हो।
फिर मेरी नज़र आँगन के कोने पर पड़ी — जहाँ सीढ़ी के नीचे जमुना पड़ी थी, वहाँ से थोड़ा आगे, फ़र्श पर कोयले से कुछ लिखा था।
मैं वहाँ गया और झुका।
दो लकीरें थीं — आड़ी और खड़ी। और बीच में एक बिंदु।
कोना-चिह्न।
पर ये उल्टा था।
मैंने उसे देखा और मेरा हाथ अपने आप टोकन की तरफ़ गया। मैंने टोकन निकाला और उसके कोने को देखा। सीधा कोना-चिह्न। फिर मैंने ज़मीन पर देखा। उल्टा।
बंसी मेरे पीछे आया।
“क्या है?”
“भवानी के आदमी ये नहीं लिखते।” मैंने कहा। “ये उनका नहीं है।”
“तो किसका?”
मैंने कोयले को मिटाया। उँगली काली हो गई।
“पता नहीं।” मैंने कहा। “पर ये टोकन से जुड़ा है। मैं उल्टा चिह्न पहले भी देख चुका हूँ।”
राजेंद्र आँगन में आए। उन्होंने चारों तरफ़ देखा।
“मैं अभी थाने जा रहा हूँ।” उन्होंने कहा। “जमुना के बयान का इंतज़ार करूँगा। पर एक बात साफ़ है — हरि सिंह के पास अब भी वो कोयला था जब उसे पकड़ा गया था।”
“और उसका चेला ग़ायब है।” बंसी ने कहा।
“तो हमारे पास सिर्फ़ हरि सिंह नहीं।” राजेंद्र ने कहा। “हमारे पास उसका पूरा हाथ है।”
राजेंद्र चले गए। सक्सेना ने अपना बैग उठाया और कहा कि वो जमुना का बयान लेने अस्पताल जाएँगी।
मैं आँगन में खड़ा रहा।
बंसी मेरे पास आया। “मन्नू। तू दो दिन से सोया नहीं है।”
“मुझे नींद नहीं आ रही।”
“मुझे पता है।” उसने कहा। “पर तू अगर गिर पड़ा तो ये सारा हिसाब रुक जाएगा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में मज़ाक नहीं था।
“तेरी दुकान का क्या होगा?” मैंने कहा।
“दुकान चलेगी।” उसने कहा। “पहले तू चल। दुकान बाद में।”
मैं हँसा। छोटी हँसी थी, पर असली थी।
फिर मैंने अपनी जेब से टोकन निकाला और उसे हथेली पर रखा। जो नया निशान उभर रहा था — वो अब भी वहीं था। अधूरा। धुँधला। जैसे किसी नाम का पहला अक्षर बन रहा हो।
मैंने उसे जेब में रखा और हवेली के बाहर निकला।
बाहर सड़क पर सूरज ढल रहा था। मैंने अस्पताल जाने का मन बनाया — पापा से एक बात पूछनी थी।
पर जैसे ही मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला, मेरे फ़ोन पर एक मैसेज आया। अनजान नंबर।
“जमुना अब ठीक है। पर तू मेरी चेतावनी नहीं सुनेगा। सोमवार से पहले सब जानेंगे — कौन तीसरा है।”
मैं स्क्रीन देखता रहा।
“कौन?” बंसी ने पूछा।
“रघुवीर।” मैंने कहा।
“तो जवाब दे।”
“क्या जवाब दूँ? वो कह रहा है कौन तीसरा है, मैं तो उसका नाम भी नहीं जानता।”
“तो उससे यही पूछ।” बंसी ने कहा। “कौन तीसरा है?”
मैंने वही लिखा।
“कौन तीसरा है?”
जवाब दो मिनट बाद आया।
“वही जो तेरी जेब में है।”
मैंने टोकन को जेब में महसूस किया। गरम चीज़। मेरे अंदर कुछ हिला।
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