The Mysterious Bell – Chapter 991
"काग़ज़ पर नहीं," उसने कहा। "पर नीचे तुम्हारी दुकान का नंबर है। और ये काफ़ी है।"
मैंने काग़ज़ देखा। बिना मुहर। बिना तारीख़। सिर्फ़ एक टाइप किया हुआ काग़ज़।
"ये बिना मुहर है," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा।
"तो फिर आप इसे लागू कैसे कर रहे हैं?"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
और इस बार उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे वो अपनी ही बात बता रहा हो।
"बेटा," उसने कहा, "मेरे पास सिर्फ़ मुहर पूछने का हक़ है। सच का नहीं। जिस दिन मैं सच पूछना शुरू कर दूँगा, उस दिन ये वर्दी मेरी नहीं रहेगी।"
वो मुड़ा। दो सिपाहियों ने पीपल के नीचे कोई चीज़ नहीं मिली, क्योंकि सब हट चुका था। पर उन्होंने वहाँ की ज़मीन पर एक और पीला काग़ज़ चिपका दिया।
फिर जीप चली गई।
मैंने वो चिपका काग़ज़ पढ़ा। बिना मुहर वाला था।
"तीन दिन के लिए।"
मैं उसे फाड़ नहींा।
मैं उस काग़ज़ को देखता रहा और सोचता रहा — कि मैंने कब से गली से कुछ छुपाना शुरू किया। मैंने कभी सभा का बोर्ड नहीं लगाया था। मैंने मेज़ नहीं रखी थी। वो चबूतरी पर थी।
पर जब काग़ज़ पर तेरा नाम लिखने का इशारा हो जाए, तो सच से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
सात बजे शाम को गली में वो सन्नाटा छा गया जो पहले कभी नहीं था।
नल की टप-टप। किसी दरवाज़े की कुंडी। किसी बर्तन की आवाज़।
पर बच्चों की आवाज़ नहीं।
न ठेला। न पतंग। न क्रिकेट की लकड़ी। न कोई हँसी।
मैं दुकान के बाहर खड़ा सुनता रहा। सात बजे स्कूल की छुट्टी होती है। गली में चालीस बच्चे निकलते हैं।
आज किसी ने नहीं निकला।
मैंने कहा, "काजल, गली में कोई बच्चा क्यों नहीं?"
काजल दुकान के अंदर बैठी थी, नर्सिंग की किताब लिए, पन्ना पलटती हुई रुक गई।
"अंकुश," उसने कहा, "तुझे नहीं लगता कि ये सब ज़्यादा हो गया?"
"क्या?"
"ये सब।" उसने किताब बंद कर दी। "ये घंटी, ये जोड़ देने की बात, ये उस्ताद, ये डॉक्टर, ये काग़ज़। चार महीने पहले हम सिर्फ़ साइकिल ठीक करते थे।"
"और अब?"
"और अब माँ की दवा दस दिन की है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सपाट थी, "और अस्पताल में नई खेप रुकी है। और मुझे रोज़ लगता है कि मैं स्कूल जाने के बजाय अस्पताल जा रही हूँ, क्योंकि वहाँ कोई मरीज़ नहीं आ रहा।"
मैं चुप रहा।
"तू इसे समझ," वो बोली, "मैं तुझे दोष नहीं दे रही। पर मुझे ये भी नहीं चाहिए कि मेरा भाई गली के मुँह पर अकेला खड़ा रहे और सारी गली उससे आँख चुराए।"
वो अंदर चली गई।
मैं बाहर खड़ा रहा।
फिर मैंने जेब से घंटी निकाली।
सुबह जितनी ठंडी नहीं थी। मैंने महसूस किया।
मैंने उसे बजाया।
टन।
बस। पीतल की आवाज़। कोई शब्द नहीं।
मैंने फिर बजाया।
टन।
"सुन," मैंने कहा।
टन।
"सुन न।"
टन। टन।
मैंने उसे ज़ोर से बजाया। इतनी ज़ोर से कि हाथ दुखा। गली में आवाज़ गई और लौट आई।
कुछ नहीं।
कोई आवाज़ नहीं। कोई फुसफुसाहट नहीं। कोई "ठीक है" नहीं। कोई "नाम" नहीं।
सिर्फ़ मैं, और मेरी हथेली, और पीतल।
मैंने उसे रगड़ा। माथे से लगाया। कान से लगाया। मुँह के पास लाया। मैंने हिलाया। मैंने झटका दिया। मैंने कहा — "बोल, बोल न, तूने कल रात बोला था, तूने कहा था कि आज पानी पिलाने वाली…"
चुप।
पूरी चुप।
मेरा गला सूखने लगा।
मैंने बार-बार बजाया। फिर दुकान के अंदर गया। ट्रंक खोला। पेचकस निकाला। घंटी को खोलने की कोशिश की — नहीं खुली।
मैं बैठ गया। फ़र्श पर।
और मुझे पहली बार लगा कि मैं अकेला हूँ। सच में अकेला। कि ये जो चीज़ मेरे साथ थी, ये चली गई।
कुछ देर बाद कदमों की आवाज़ आई।
डॉक्टर इसरानी।
वो अंदर आए। फ़र्श पर बैठा देखा। मेरे हाथ में घंटी देखी। और कुछ कहने से पहले, वो मेरे पास बैठ गए।
"बजाई?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"क्या निकला?"
"टन।"
उन्होंने सिर हिलाया।
"जानता था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "आपको पता था?"
"मुझे नहीं पता था," उन्होंने कहा। "पर डर रहा था।"
वो उठे। बोतल से पानी लाए। मुझे दिया।
"सुन," उन्होंने कहा, "जब मैं जवान था, इस अस्पताल में एक कंपाउंडर था। सलीम। तुमने उसका नाम सुना?"
"हाँ।"
"वो मर गया," उन्होंने कहा। "और उसके जाने के बाद मैंने यहाँ काम करना बंद कर देना चाहा। अस्पताल बंद कर देना चाहा। पर मैं नहीं बंद कर पाया, क्योंकि सुबह आठ बजे दरवाज़े पर तीन मरीज़ खड़े होते थे।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारी घंटी का ईंधन जादू नहीं है, अंकुश। लोगों का भरोसा है। जब तक मोहल्ले में कोई एक आदमी किसी दूसरे आदमी पर भरोसा करता है, घंटी काम करती है। जिस दिन मोहल्ला चुप हो जाए — वो अपनी ज़ुबान बंद कर ले — घंटी भी चुप हो जाती है।"
"तो आज गली चुप हो गई," मैंने कहा। "इसीलिए?"
"हाँ," उन्होंने कहा। "आज गली ने तुझसे बात करना बंद किया। बच्चे नहीं आए। शबनम के यहाँ चाय कम बिकी। उस्ताद ने शटर पर कपड़ा डाल दिया। और सबसे बड़ी बात — आज किसी ने किसी को कुछ नहीं कहा। सुबह नल पर दो आदमी लड़े, पर किसी ने सच नहीं पूछा। भरोसा वहीं टूटा।"
मैंने घंटी मेज़ पर रख दी।
"फिर ये वापस आएगी?"
"नहीं।"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"नहीं, यह चीज़ वापस नहीं आएगी," उन्होंने कहा। "तू इसे वापस लाएगा।"
वो खड़े हुए।
"मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने चालीस साल में सीखी," उन्होंने कहा। "जब कोई काग़ज़ कहता है कि ये तुम्हारा नहीं है, तुम काग़ज़ नहीं बदलते। तुम वो चीज़ बदलते हो जो काग़ज़ के पीछे बैठी है। और वो चीज़ है लोगों का डर।"
"और डर कैसे जाता है?"
"डर नहीं जाता," उन्होंने कहा। "डर की जगह कोई और चीज़ लेती है। और वो चीज़ है एक इंसान का दूसरे इंसान पर भरोसा। एक छोटा सा भरोसा भी काफ़ी है।"
वो जाने लगे। दरवाज़े पर रुके।
"कल सुबह नौ बजे," उन्होंने कहा, "मैं वो रजिस्टर खोलूँगा। जिसमें चालीस साल पहले एक नाम काटा गया था। उस्ताद को भी बुला लेना।"
"डॉक्टर साहब।"
"हाँ।"
"आज सुबह सानिया के यहाँ से बारह साल पुराना नाम मिला था। मैंने उन्हें उनका नाम से बुलाया। और उन्होंने मुझे पानी पिलाया।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और घंटी ने क्या कहा?"
"एक छोटी आवाज़ की। जैसे ठीक है।"
डॉक्टर इसरानी मुस्कुराए। पहली बार, पूरे दिन में।
"तो घंटी मरी नहीं है," उन्होंने कहा। "वो सिर्फ़ सो रही है। तू इसे जगाने की जगह पीट रहा था।"
वो चले गए।
मैंने घंटी उठाई। और उसे मेज़ पर नहीं रखा। जेब में रखा।
फिर मैंने कॉपी खोली और लिखा —
"आज गली चुप हुई। काग़ज़ आए — बिना मुहर। स्कूल ने बच्चों को रोका। शबनम के यहाँ तीन ग्राहक। उस्ताद ने शटर पर कपड़ा डाल दिया। नल पर दो आदमी लड़े और दोनों ने मुझे डाँटा। पुलिस ने पीपल खाली करा दिया। आज गली में एक भी बच्चा नहीं बोला।
घंटी चुप हो गई। पूरी चुप। सिर्फ़ टन। मैंने उसे पीटा, रगड़ा, झटका दिया। कुछ नहीं।
डॉक्टर साहब ने कहा — घंटी मरी नहीं, सोई है।
सो, तो सुबह जगेगी। पर सूरज से नहीं। किसी एक भरोसे से।
आज रात एक बात तय है — मैं कल घंटी से सवाल नहीं पूछूँगा। मैं अपने हाथ से एक-एक दरवाज़े पर जाऊँगा और सिर्फ़ इतना पूछूँगा — चाय पिएगा?
अगर कोई एक भी हाँ कहे, तो काफ़ी है।"
मैंने कॉपी बंद की।
नौ बजकर कुछ मिनट।
गली के मुँह पर रोशनी आई। फिर आवाज़।
सफ़ेद गाड़ी।
इंजन चालू रहा। खिड़की उतरी।
मैं दुकान के बाहर था। खड़ा था।
खिड़की के किनारे हाथ टिका। काली अंगूठी।
और इस बार मैंने इंतज़ार नहीं किया।
"बोल," मैंने कहा।
अंदर से हल्की हँसी आई।
"तू आज थका लगता है," रणवीर ने कहा।
"बोल।"
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