The Mysterious Bell – Chapter 962
ऐसा सन्नाटा कि मुझे अपने ही कदमों की आवाज़ बड़ी लगने लगी। मैंने पत्थर के पुल पर चलकर उस्ताद की बंद दुकान के सामने से गुज़रना चाहा, पर वहाँ पहुँचकर मैं रुक गया, क्योंकि उनका शटर देखकर कुछ अंदर से टूट गया।
मैं गुमटी की तरफ़ गया। शबनम आपा चूल्हे के पास बैठी थीं, छोटा चूल्हा जल रहा था, सामने पानी के छोटे बर्तन में उबल रहा था। कोई चाय माँगने वाला नहीं।
“आपा,” मैंने कहा।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया। उन्होंने चाय दी। कोई शब्द नहीं बोला।
फिर रज़िया आई, दो प्लेटों में दो रोटियाँ और सब्ज़ी लिए, और बिना पूछे मेरे सामने रख दिया।
“खा ले,” वो बोली। “माँ की कसम, खा ले। बस यही कहूँगी।”
मैंने खाया। नहीं भूख थी, पर मैंने खाया, क्योंकि खाना शुक्र अदा करने का सबसे छोटा तरीका है।
मैंने आख़िरी टुकड़ा मुँह में रखा और पानी का गिलास उठाया।
शबनम आपा मेरे सामने बैठी थीं। चिमटी उनके हाथ में थी, चूल्हे की लौ उनके चेहरे पर पीली रोशनी डाल रही थी, और उस पीली रोशनी में उनका चेहरा उम्र से ज़्यादा थका हुआ लग रहा था।
"आपा, आज कितने ग्राहक आए?" मैंने पूछा।
"दो," उन्होंने कहा।
मैंने गिलास रख दिया।
"एक ने रास्ता पूछा," वो बोलीं, "और एक ने पानी। दोनों ने चाय नहीं पी।"
रज़िया बगल में बैठी थी, और उसने अपनी प्लेट उठाई जिसमें उसकी रोटी बाकी थी। वो उठकर अंदर जाने लगी, फिर रुकी और बिना मुड़े बोली, "आपा, वो काग़ज़ उतार दो ना।"
"कौन सा काग़ज़?" मैंने पूछा।
"जो उसके शटर पर चिपका है," रज़िया ने कहा, और मेरी तरफ़ देखा। "अस्थायी रूप से काम बंद। कोई पढ़ता है तो लगता है हम खुद बंद कर रहे हैं।"
शबनम आपा ने चिमटी चूल्हे पर रखी और उसकी आवाज़ ऐसी हुई जैसे कोई लोहा पत्थर पर रख रहा हो।
"मैंने वो काग़ज़ इसलिए नहीं उतारा कि मैं डर गई हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने इसलिए नहीं उतारा कि जिसने लगाया है, वो आकर देखे कि शबनम का चूल्हा काग़ज़ से बंद नहीं होता।"
रज़िया कुछ कहने लगी, फिर चुप हो गई और अंदर चली गई।
"आपा," मैंने धीरे से कहा। "कल से गुमटी में कोई नहीं आएगा।"
"आएगा," उन्होंने कहा।
"कैसे?"
"क्योंकि मैं चूल्हा जलाऊँगी," उन्होंने कहा, और मेरी तरफ़ देखा। "चूल्हा जलता दिखेगा तो कोई न कोई तो आएगा ही। कोई चाय माँगे या न माँगे, चूल्हा जलना नहीं बंद होगा। और अगर तू कल से ये सोचेगा कि गली में सब खत्म हो गया, तो मैं तेरी चाय में नमक नहीं, गुस्सा डालूँगी।"
मैं हँसा। हँसी निकली नहीं, सिर्फ़ चेहरे पर आई और रुक गई।
"जा," उन्होंने कहा। "सो जा। सुबह जल्दी उठना है।"
घर लौटते वक़्त मैंने पीपल के नीचे से गुज़रना चुना। जान-बूझकर। मुझे देखना था कि वो जगह कैसी लगती है।
चबूतरी वहीं थी। ईंटें वहीं थीं। पर उस जगह पर जहाँ मेरी टूटी मेज़ रखी थी, अब सिर्फ़ धूल में चार गोल निशान बचे थे। उन निशानों को देखकर मुझे लगा कि धूल किसी की याद भी रखती है, बस उसकी शक्ल में नहीं, उसके बोझ में।
पीपल की डाल में वो सफ़ेद काग़ज़ की पतंग अब भी टँगी थी। सानिया और रफ़ीक़ ने बनाई थी, फिर आधी फट गई थी, फिर कोई उसे छोड़ गया। मैंने उसे आज नहीं छुआ।
मैं घर पहुँचा। माँ बुखार में सोई थीं। काजल उनके पैरों के पास बैठी थी और उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी, पर आँखें किताब पर नहीं, माँ के चेहरे पर थीं।
"कुछ खाया?" उसने पूछा।
"खा लिया।"
"क्या खाया?"
"रोटी।"
"किसके घर की?"
"आपा की।"
वो थोड़ा सुकून में आई। "अच्छा।"
मैं दरवाज़े के पास बैठ गया। माँ की साँस धीमी थी और थोड़ी बेआवाज़, जैसे कोई सोते हुए भी गिन रहा हो।
काजल ने किताब बंद की और धीरे से बोली, "भैया, आज माँ ने नींद में एक बात कही।"
"क्या?"
"कहा कि जो घंटी बोलती थी, वो घंटी नहीं थी।"
मैं ठिठका।
"और कुछ?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं।" उसने कंधा उचकाया। "बस इतना। फिर करवट बदल ली।"
मैं माँ के पास गया। उनका हाथ ठंडा था और उनके माथे पर पसीना था। मैंने उनकी चादर सीधी की। वो हिलीं, आँखें खोलीं, और मुझे देखकर पहली बात यह कही —
"घंटी बोली?"
मेरा गला सूख गया।
"नहीं," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "तो वो भी इंतज़ार कर रही है। किसी का।"
मैंने उनके पैर को हाथ लगाया। "आप सोइए।"
"मैं सो रही हूँ," उन्होंने कहा, और आँखें बंद कर लीं। फिर बिना आँखें खोले बोलीं, "बेटा, कल दुकान खोलना। आज की तरह चुपचाप नहीं। आवाज़ करके खोलना।"
सुबह मैंने शटर उठाया।
मैंने जान-बूझकर उसे आवाज़ के साथ उठाया। लोहा चरमराया, नीचे धूल गिरी, और मैंने अपनी पूरी ताक़त से शटर खींचकर ऊपर किया, इतनी तेज़ कि आवाज़ गली के मोड़ तक गई होगी।
कोई नहीं आया।
मैंने पहियों वाले टब को बाहर निकाला और उसमें पानी भरा। मैंने औज़ारों को एक-एक करके पोछा और ट्रंक पर सजाया। मैंने नई रिंच वहीं रखी जहाँ टिंकू उसे देखता था, और फिर उसे उठाकर अंदर रख दिया, क्योंकि उसे देखकर मेरा मन बैठ गया।
सात बजे मैंने बाहर आकर देखा। गली में दो औरतें नल पर पानी भर रही थीं, एक बच्चा दूध लेने जा रहा था, एक बूढ़ा अपनी चारपाई पर बैठा खाँस रहा था।
कोई भी मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था।
यही सबसे अजीब था। कोई गाली नहीं, कोई बहस नहीं, कोई ताना नहीं। बस आँखें कहीं और।
मैं दुकान के बाहर पत्थर की पटिया पर बैठ गया और अपनी कोहनी पर हाथ टिकाकर सड़क देखने लगा।
तभी चिंटू आया।
वो साइकिल पर था। उसकी साइकिल का पहिया मेरी दुकान की ओर मुड़ गया, यानी उसका इरादा था। वो मुड़ा भी, और उसने आधी आवाज़ में कहा, "भैया, मेरी चेन—"
"इधर आ," मैंने कहा।
वो आगे बढ़ा ही था कि पीछे से उसकी अम्मी की आवाज़ आई।
"चिंटू!"
वो जैसे हवा में रुक गया।
उसकी अम्मी दौड़ती हुई आईं, उसका कंधा पकड़ा और उसे साइकिल से उतार दिया। फिर वो मेरी तरफ़ देखे बिना बोलीं, "चिंटू, मैंने कितनी बार कहा है कि उस तरफ़ मत जाना।"
"अम्मी, चेन टूट गई है—"
"चेन मैं ठीक करवा दूँगी," वो बोलीं, और साइकिल उलटी तरफ़ घसीटने लगीं। "चल।"
चिंटू ने पीछे मुड़कर मुझे देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो बच्चों की आँखों में होती है — शर्म और सवाल एक साथ।
मैंने हाथ उठाया और मुस्कुरा दिया। उसे डाँटने की ज़रूरत नहीं थी। उसकी अम्मी को नहीं, उसे नहीं।
वो चला गया। साइकिल की चेन उसकी अम्मी की साड़ी से रगड़ खाती गई और आवाज़ करती गई।
मैं वहीं बैठा रहा। और उस दिन मैंने एक चीज़ सीखी — मुझे कोई सफ़ाई देने आए, उससे पहले मुझे सुनना होगा। बिना सुने सफ़ाई देना भी एक तरह का शोर है।
नौ बजे मैं स्कूल के गेट पर था।
मुझे वहाँ कोई काम नहीं था। मैंने खुद से कहा कि मुझे चिंटू का दस्ताना मिला था, उसे लौटाना है। झूठ था। मैं बस यह देखना चाहता था कि गली में क्या बोला जा रहा है। और गली की सबसे सच्ची खबर हमेशा स्कूल के गेट पर होती है।
मैंने दूर से देखा।
गेट के पास तीन औरतें खड़ी थीं और एक आदमी — मोटा, हाथ में टिफ़िन का थैला। वो बात कर रहे थे और उनकी बात में मेरा नाम नहीं था, पर मेरी दुकान थी।
"वो जो साइकिल वाला है ना," एक औरत बोली, "उसके पास जो जाता है, उसके घर में कोई न कोई पड़ जाता है।"
"मेरी भाभी कह रही थी," दूसरी बोली, "कि उसने अपनी दुकान में कोई तांत्रिक चीज़ रखी है। छोटी सी घंटी है। रात में बजती है।"
"हाँ, मेरे बच्चे ने भी सुना था।"
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